अइसन बाड़ें मधेशी हाकिम !

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– ऋषभदेव ठाकुर

धेश में कवनो अफिस में कवनो काम करेवाला हाकिम ! जे खेती बनिजी ना करे से हाकिम ! अधिकृत भा उपर स्तर के त बाते छोड़ीं, खरदार, मुखिया, बहिदार, पियन सब हाकिम ! जाहिर बा हाकिम भइला पर दोसरा से साहेब सुने के चहबे करिहें लोग ।

हाकिम लोग अपना घर–परिवार में ना मिझरइहें । गाँव–समाज से अलगे हो जइहें । अफिस से घरे अइला पर घरधंधा में ए लोग के मन ना लागी । केतनो फुर्सत काहे ना होखो सामाजिक कामधाम ई लोग ना करिहें । ओकरा खातिर जाना–मजुरा के लगइहें । काहे कि घरायसी धंधा आ सामाजिक धंधा हाकिम लोग करिहें त ए लोग के शान घट जाई । ई लोग अपना के उपर आ बाँकी लोग के अपना से नीचा बुझिहें । आपन रास्ता पर दोसरा के आवे ना दिहें । आपन रास्ता पर दोसरा के आवे खातिर सलाह ना दिहें । दोसरा के अपना बराबर ना होखे दिहें । जइसे बड़का पेंड़ के नीचा छोटका पेंड़ ना उजिआला ।

अफिस के समय में हाकिम लोग अपना कोठा में ना रहिहें । कभी कभी कुर्सी पर बैठिहें । ना त कभी दोसरा के कोठा में बतिआत रहिहें चाहे कैंटिन में चाय पिअत रहिहें । ओहू से ना भइल त बाजार में पान खाए चल जइहें । फोन करीं त फोन ना उठइहें । भेंट हो गइल त कहिहें मोबाइल साइलेंस में रहल ह ।

मधेशी हाकिम लोग के कार्यशैली में कौनो नैतिकता ना ! कवनो मापदंड भा कवनो मान्यता ना ! अफिस में शुद्ध से बात ना करिहें । सेवाग्राही के बारंबार परेशान करिहें । हमेशा कवनो ना कवनो कागज के कमी देखइहें । दोसरा के परेशान करे के जइसे ई लोग कालेज–विश्वविद्यालय में पढ़ले होखे । परेशान करेके ई लोग जइसे तालीम लेले होखे । ए सब के पछाड़ी दू ढेउआ घुस के आशा करिहें, चाहे दू पैसा कमिशन के । घूस के आशा दे दीं, कुछ कमिशन बना दीं, ए लोग के कवनो कागजात ना चाहीं । झटसे काम कके हाथ में राख दिहें । एगो घटना में कलैया के मालपोत कार्यालय में कवनो दलाल अपना क्लायंट से दावी करत रहलें कि बाद में कुछहू होखी मगर अपने चाहेब त मालपोत अफिस अपने के नाम से रजिष्ट्रेशन करा सकिले ।

अफिस के समय में हाकिम लोग अपना कोठा में ना रहिहें । कभी कभी कुर्सी पर बैठिहें । ना त कभी दोसरा के कोठा में बतिआत रहिहें चाहे कैंटिन में चाय पिअत रहिहें । ओहू से ना भइल त बाजार में पान खाए चल जइहें । फोन करीं त फोन ना उठइहें । भेंट हो गइल त कहिहें मोबाइल साइलेंस में रहल ह । घूस–कमिशन के कवनो सीमा नइखे जइसे बकरी के चरे के कवनो सीमा ना होला । केतनो चरा दीं, केतनो अघा दीं, दिनभर चरते काहे ना रहे, साँझ में घरे लौटत बेरा रास्ता पर हरिअरी देखी कि दहिना–बायाँ मूँह मरबे करी । अभी अख्तियार सगबगाता त हाकिम लोग नया उपाय निकलले बाड़ें । ए लोग के अफिस बाजार, होटल कहीं चलता । अफिस टाइम दस से पहिले चाहे पाँच के बाद । हाकिम से मिले खातिर पहिले एजेंट से मिलीं त ऊ मिलवइहें हाकिम से । बात मतलब पाई मिली त हाकिम जी निनाइलो अवस्था में साइन घँस दिहें, काम हो जाई ।

कवनो–कवनो विभाग में मधेशी हाकिम लोग के संघ–संगठनो बा । मगर जइसन व्यक्ति ओइसने संगठन । समझ ना आवे कि अइसन बेहवार व्यक्ति से संगठन का ओर बढ़ल बा आ कि संगठन से व्यक्ति का ओर । जवन जनता के कर से ए लोग के तलब आवेला ओकरा से निमन से बतिआए के फुर्सत नइखे ए लोग के । बस में कवनो प्रसंग में अइसने एगो हाकिम बतावत रहनी कि अब हकिमई से फायदा नइखे । अफिस का आगे नागरिक बड़ापत्र राखल बा । लोग ओही में देखके मतलब के हाकिम के खोज लेताड़ें । अख्तियार टाइट हो रहल बा, तनका चकलेट, बिस्कुट पर लार चुआईं त फट से कम्बख्त अख्तियार के आदमी पकड़ लेता । अब सुनतानी जे अफिस में सीसी कैमरा लगावेवाला बा । समय में काम ना करी त हर्जाना भरेके परी । बहुत दिक्कत बा । बहुत तकलीफ बा । ए लोग के घूस–कमिशन में बिहारी पुलिस के बेहवार लउकेला जे घूस में एक जुन खैनिओ ना छोड़े । ई लोग अफिस में आवेवाला हरेक आदमी से घूस के आस करिहें । ईमान, धरम, सामाजिक बेहवार, जागीर खाए के बेरा के शपथ, सब से बढ़के घूस आ कमिशन ! राज्य, मुल्क, लोकतंत्र, संविधान, गाँव–समाज सब एक ओर आ अदेव कमाई दोसरा ओर ।

रउआ लोग के जिकिर जायज बा कि पहाडि़ओ कर्मचारी त कम नइखन स । मगर हमरा पहाड़ी हाकिम के सुभाव से बहस नइखे । काहे कि मधेश ओ लोग के नइखे । मधेश मधेशी हाकिम के ह । पहाड़ी हाकिम से मधेश प्रति के सद्भाव आ झुकाव मधेशी हाकिम के बेसी होखेके चाहीं । मधेश के उब्जनी से ए लोग के नस में खुन बहेला । मगर अफशोस ! मधेशी लोग कहेलन कि मधेशी हाकिम पहाडि़ओ से जादा तङ करेला । एकनी से त पहडि़ए हाकिम निमन बा जे कम से कम निमन से बतिआला, जादा ना अड़कावेला आ पैसा लेवेला त कामो झट से कर देवेला ।
जवना जागीर से हाकिम लोग के धाख–धमकी बा, हाबी–दाबी बा, हरेक शहर में घर–घड़ारी बा, बैंक बैलेंस बा, गाड़ी बा, शेयर बा ओ कमाई के सयकड़ा एको रोपेया ई लोग ना ए लोग के संगठन सामाजिक कल्याण में ही खर्च करी । कम से कम अफिस में पिआसल लोग के एक बोतल पानिओ त पिआइत ! गनी–गरीब आवेला, निर्बल कमजोर के एक बेर खनो खिइले रहित ! काम करावते करावते अबेर भइल, घरे ना लवटेवाला खातिर रात में एको आदमी के ठहरे के व्यवस्था कहिओ कइले रहित ! प्रशासन के काम–बेहवार आ सिद्धांत का बारे में स्कूल–कालेज में कहिओ बतकहिओ करवले रहित ! स्कूली विद्यार्थिअन के लोक सेवा, प्रहरी प्रशासन में भागो लेवे के प्रशिक्षण चलइले होखित ! अइसन सृजनात्मक काम एकोगो ना देखल जाला । घर अगाड़ी के सड़क पर दू टोकड़ी माटिओ धरे के सुनी त सोची कि भाई के लेखा दू पैसा ए में से जेबिया में आई !

एकरा विरोध में आवाज अब संचार माध्यम में आ रहल बा । सामाजिक संजाल में देखल जा रहल बा । अब जरूरी बा एकर उपाय खोजे के आ लागू करे के । अइसन बेहवार के घटावल जरूरी हो गइल बा । हटावल जरूरी हो गइल बा । ना त बिहान एही घूस का चल्ते मधेशी समाज के अस्तित्व ना रही ।

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