अब चिपरी ना पाथी मुनिया ! (महिला सशक्तिकरण )

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अब चिपरी ना पाथी मुनिया !

माई, काल्ह से हमार इम्तिहान शुरू होता, हमार गत्ता एकदम फाट गइल बा नया कीन द। भइया त हर बेर परीक्षा खतम होत होत गत्ता चबा जाला आ तूं ओकरा के नया कीन देलू, अबकिर हमरो नया गत्ता चाहीं ना त हम स्कूल ना जायेम। एतना सुनत मुनिया के माई कसाइन जइसन मुंह बनवले मुनिया के झोंटा पकड़ली आ ढकेलत कहली की हर बात में भइये के पटीदारी करेलू, ओकर पटीदार जनमल बाडू का, उ त लडि़का ह पढ़ लिख के कमाई आ तूं का करबू कान्हा पर के हर उतरबू। जा सबेरे के गोबर धइल बा चिपरी जल्दी पाथऽ ना त झुरा जाई, बाद में वकालत करीह। मुनिया रोवत एक बाल्टी पानी लेके गोबर साने आ चिपरी पाथे चल दिहलस।

“एगो पुरान कहावत बा की औरत ही औरत के सबसे बड़ दुश्मन चाहे दोस्त होली । अब ई महिला लोग पर निर्भर करता की दोस्ती निभावे के बा की दुश्मनी । आज भी महिलन के सामने एगो ना बल्कि हजारो चुनौती बा लेकिन अइसन विश्वास बा की महिला ओह सभ बाधा के पार करिहन काहे की नारी अब अबला नईखी बल्कि सबला बाड़ी । “ 

हम रोकत पूछनी की आरे भउजी, तोहार रकटूआ का करऽता आजकल… बीचहिं में बात काटत भउजी कहली की सात गो झाड़ू से बहारीं अइसन बेटा के, दिन भर पी के हेने होने मुंह मरावत फिरेला, लोग कहल की बियाह क द सुधर जाइ, आज जान जाई की बियाहो क दिहनी आ तबो ना सुधरल। सुरेशवा के संगे अब जनता बाजार पर आरकेस्टा में रहऽता। पहिले खाली ओकरे टेंसन रहल ह अब ओकरा मेहर आ दुगो लडि़कन के भी टेंसन हमरे बा। रउरा ठीके कहत रहनी की मुनिया के पढ़ावऽ भउजी, लेकिन हमार मति मराइल रहे, आज हमार मुनी जवन बाड़ी उ अपना दिनरात के मेहनत से बाड़ी। हम सभका से इहे कहब की लइका लइकी में भेद मत करीं राउर लइकी भी राउर सहारा हो सकेली आ लइका भी कुलबोरन हो सकेलन, हमरा रकटू नियर। सांझ होत रहे अब मुनिया के आवे के बेरा हो गइल रहे, हम भउजी से कहनी की गोबर ढेरियवले बाडू नु, मुनिया के आवे के बेरा हो गइल बा, चिपरी पाथ दी, भौजी के आँख भर आइल आ कहली ए बाबू अब मुनिया चिपरी ना पाथी अभी त हम सोरे आना जियऽतानी …..

आज लगभग 15 बरीस बाद हम गांवे गइनी आ मुनिया के माई से मिलनी, जब लडि़कन के समाचार पूछनी त मुनिया के माई मुनिया के नाम पर रोवे लगली आ अंचरा से लोर पोंछत कहली, ए बबुआ आज हमार मुनी ना रहती त हमनी के रोड पर आ गइल रहतीं सन, रउरा भइया के एक्सीडेंट भइला में बहुत रूपिया लागल आ काम भी छूट गइल। मुनिया पढ़ लिख के सिवान जिला स्कूल में कलर्क हो गइल उहे आज घर के सभ खर्चा चलावत बिया।

इ एगो मुनिया के कहानी नइखे बल्कि देश के सामने एगो चुनौती बा की एक तरफ चाँद पर जाये के बात होता आ दोसरा तरफ महिला आज भी अपना हक खातिर लड़त बाड़ी। बेटा बेटी में भेद भाव घर से शुरू होता, बहरी से ना, दुखद इ बा की अईसन करे वाला भी एगो बेटी ही बाड़ी, बेटा के चाह में पतोह के सतावे वाला भी एगो बेटी बाड़ी, चाहे उ सास के रूप में ही काहे ना होखस।

आज टेलीविजन के दुनिया में रोज एगो नया सीरियल शुरू होता आ सभ में औरत के निगेटिव चरित्र के पेश कइल जाता, सीरियल रोवत शुरू होता आ रोवते खतम हो जाता। अइसन सीरियल में महिला ही मुख्य किरदार बाड़ी आ ज्यादातर निगेटिव बाड़ी। एकरा बारे में महिला वर्ग के भी सोचे के जरुरत बा, की आखिर अपना ईज्जत के धज्जी कहिया ले खुद महिला उड़ावत रहिहन। प्राचीन काल से लेके आज तक अईसन कवनो युग नइखे जहाँ नव निर्माण में पुरुष के संगे नारी के सहयोग ना होखे। वैदिक युग से लेके आज तक गार्गी, मैत्रयी, अरुंधती, झांसी के रानी, सरोजनी नायडु, इदिरा गाँधी, सानिया मिर्जा, किरण बेदी जइसन नारी के हमेशा योगदान रहल बा।

आज जरुरत बा बेटियन के पढ़ावे के ताकि आवे वाली स्थिति बदल सके, बेटा बेटी में फर्क मिटे आ जाती धर्म के बंधन से मुक्ति मिले। एह मिशन के पूरा करे खातिर महिला लोग के ही आगे आवे के पड़ी। एगो पूरान कहावत बा की औरत ही औरत के सबसे बड़ दुश्मन चाहे दोस्त होली। अब ई महिला लोग पर निर्भर करऽता की दोस्ती निभावे के बा की दुश्मनी। आज भी महिलन के सामने एगो ना बल्कि हजारो चुनौती बा लेकिन अइसन विश्वास बा की महिला ओह सभ बाधा के पार करिहन काहे की नारी अब अबला नइखी बल्कि सबला बाड़ी।

आखिर उ दिन कहिया आई जब कवनो मुनिया चिपरी ना पाथी बल्कि चान पर जाके झंडा फहराई आ जब निचे आइ त मिडिया के सामने आपन नाम डॉ. एम. देवी ना बल्कि मुनिया बताई।

अंत में इहे कहब की भोजपुरी पढ़ीं, भोजपुरी लिखीं आ भोजपुरी बोलीं। प्रणाम।

राज कुमार अनुरागी
लेख – हलो भोजपूरी  पत्रिका
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