इ इयाद के का करी हम ?

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अगर आदमी रहित तs समझा दिहती ।
ना समझीत तs मार के भगा दिहती।
घाम रहित तs छाता ओढ लिहती।
लउकेवाला रहित तs आँख फोड लिहती।
हावा रहित तs केंवारी बन्द कर दिहती।
अन्हार कोठरी मे जाके बइठ जइती।
दिया जे रहित तs मुझा देती।
इ तs अदृश्य बा इ इयाद के का करी हम ?
पेंड रहित तs काट दिहती।
मिठाई रहित तs बाँट दिहती।
कलम रहित तs तोड दिहती।
आ पढल लिखल छोड दिहती।
बाकी इ तs अदृश्य बा इ इयाद के का करी हम ?
फोटो रहित तs फार दिहती।
चिता सजाके आगी बार दिहती।
आ बइठ के तनका रो लिहती।
आ लोर के गंगा में अस्ति बहा दिहती।।
बाकी इ तs अदृश्य बा इ इयाद के का करी हम ?
जब भी नियरा से गुजर जाला।
दिल के दर्द आउर बढ जाला।।
हम रोक ना पाइले तोहरा याद के।
आ आँख तs आँसु से भर जाला।।
अब तुही बताव इ इयाद के का करी हम ?
– दिपेन्द्र सहनी “दीपू” धोबिनी गाउँपालिका -५ जगरनाथपुर पर्सा नेपाल
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