ई ह होरी ! (कविता )

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होली

ई ह होरी !

 

गोपाल ठाकुर

 – गोपाल ठाकुर

बाप कोहनाइल बेटासे 
लोग कोहनाइल नेता से
कनिया अपना बर से
भउजी देवर से 
काहे कइलऽ बलजोरी ?
कोहनाईं मत ई ह होरी !  

 

लड़िका पर खिसिआईं मत
भूलाइओ के ओके पढ़ाईं मत
कुश्ती छोड़ीं, तेक्वांदो सिखाईं
लमर भइल निमन त नेता बनाईं
देखत रहीं सुखशांति तब सब ओरी
कोहनाईं मत ई ह होरी !





राउर जिनगी में त होरी
लिखाइलहीं नइखे
आ लिखाएके आसो मत करीं
बाँकिर इहाँ त रोज होरिए बा
इयाद करीं,
एतहाँ देखल ना लिखल मिलेला
हिसके मत बढ़ाईं झोरी
कोहनाईं मत ई ह होरी !
ब्यर्थे अनकर तरक्की से जरतानी
केकरो कार से गर्दे पर गइल त का भइल ?
दोष त बेयारे के नु बा !
देह पर पाँके पर गइल त का भइल ?
दोष त रस्ते के नु बा !
बलात्कारे भइल त का भइल ?
दोष त खुबसुरतिए के नु बा !
कहबो मत करीं भइल बलजोरी
कोहनाईं मत ई ह होरी !
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