ए मधेशी तोहर पहिचान का ?

ज्योति तिवारी

हिचान आखिर चिज का हटे ? काहे केहू आपन संस्कृति के मजाक उडावेला त पारा आसमान पर चढ़ जाला, काहे कवनों आपन पर्व -त्योहार के हसेला त अपने संयमता परसे बश हट जाला आ मन करेला पिठी के बल गिरा के, हुम्चा के तिन-चार झापड लगाई कि केकरो रिति-संस्कृति पर हसल छोड देवे, एहु से ज्यादा खिस त तब उठेला जब केहू केकरो पहिचान, केहूके पहिरन आ सभ्यता से खेलवाड करेला । सारा सहेके सीमा जवाब दे देवेला ओ बेरा ।

अईसे देखल जाला की आदमी आपन रोज के काम मे एतना ब्यस्त हो गइल बा कि आपन संस्कृति, भाषा आ पहिचान के कइसे जगेर्णा कइल जाओ ई सबके लाए समय ना निकाल पावेला। बहुत लोग मे ई बात के होश नइखे कि आपन संस्कृति लाए अपने से सजग ना भइल जाइ त दोसर समुदाय के लोग नइखे आवेवाला एकर उत्थान करे लाए ।  दोसर समुदाय के कुछ नेक लोग भले हि अच्छा सोच रखले होखस बाक़िर अधिक लोग राउर संस्कृति, भाषा कुली लोप भइला पर खुशी ही होखेले । परिणाम अपने के आख के सामने बा ।

अपना-आपके रास्ट्रिय चैनल बतावेवाला मिडिया मे रोज के १-२ घण्टा लाए भी देश के दोसर सबसे जादे बोलेवाला भाषा मैथिली (११.७%) आ तेसर सबसे जादे बोलेवाला भाषा भोजपुरी (९%) के कवनों किसिम के कार्यक्रम देखेके ना मिलेला । अगर भुलचुक से  देखे के मिल भी जाइ त ओमे स्थानीय कलाकार के मौका ना देके ई देशके पहुचवाला समुदाय के लोगन के हि बिगबिगी रहेला । आ बडा हि अपहेलित किसिम से प्रस्त्रुती कइल जाला मधेशी सभ्यता, पहिरन आ भाषा के । समय मे हि आपन दायित्व के बोध होखो हमार इहे आशा बा मधेशी भाइ-बन्धु से ।

आम-जनता भले हि राजनीति के एगो गन्दा खेल बुझत होखे, बाक़िर ई बात के महत्व तब समझ मे आवेला जब सवाल आदमी के पहिचान पर उठेला, तब आदमी सोचेला कि हमनी के समुदाय के भी राजनीतिक पहुच रहित, त कास ई अपहेलना के बिरुद्ध लड सकत रहनी सन् । एहिसे राजनीति मे आवल भी जरुरि बा मधेसी जनता के, एसे दुर कबो ना भागि । एगो महान दार्शनिक चाणक्य कह गइल बाडन कि अगर कवनों युवा कहेला कि राजनीति किचड हटे, त उ किचड के साफ करेके जिम्मा भी उहे युवा जमात के ह । राजनीति मे प्रवेश ना कइला के सबसे बुरा नतिजा इहे ह कि एगो नालायक व्यक्ति रउआ उपर राज करी आ लायक व्यक्ति के गुलाम बनके रहेके परी । बाकिर फैसला अपने के बा , गुलामी करेके बा की कुशल नेतृत्वकर्ता बनेके ।

मधेश के हर गाव, हर घर मे राजनीतिक चेतना फैलावल जरुरि बा आ पिछ्ला एक दशक से एमे काफी कुछ निखार भी आइल बा बाकिर एतना काफि नइखे । हर गाव मे युवा सचेतना केन्द्र खोल्के मधेश मे युवा जागरण अभियान चलावे के निरन्तर कोसिस करे के चाही । मधेश के प्रतिनिधित्व करेवाला दल के ई दायित्व त बढ़ले बा एकरा साथ् हि मधेश के हर एक पढल-लिखल वर्ग के आपन गाव-टोल आ समुदाय के पिछ्डल समुदाय के जनता के उत्थान मे आवश्यक पहल कइल आ स्थानीय जनता के उचित रास्ता देखावल जरुरि भी बा आ मधेश के उपर दायित्व भी । मधेश के हर एक जनता के भावना के कदर कर के हर समुदाय मे समानता लियावे के कोसिस करल जाओ ।

हमनी के देश नेपाल त पहिलहि एगो अलगे रोग से ग्रसित बा, मधेशी के हिन भावना से देखेके । मधेशी के वर्ण करिया होते मे कोइ भी आदमी इन्डियन ना हो जाला । अवश्य हि इन्डियन से हमनी के भेषभुसा, रिति-संस्कृति, पहिरन आ भाषा मिलेला । ई त भूगोल हटे नु , एगो भूगोल मे रहेवाला आदमी से कुछ चिज मिलते मातर ओकर राष्ट्रियता  पर हि प्रश्न उठादेवल कहा के इन्साफ हटे ? बाकिर सिमाना के जब भी बात आवेला मधेशी आपन सिमाना लाए ओतने सजग बा जेतना कि एगो रास्ट्रप्रेमि जनता मे होखेके चाही । पहाडी समुदाय के लोग भी जवन मधेश मे जाके रह गइल बा लोग उहो त आपन वास्तविक रंग से करिया हो गइल बा लोग । केकरो वर्ण पर चाहे  केहू के रंग पर हसे के ई मानव सभ्यता ना ह, आ ई सब चिज मानव जाति के हित मे भी नइखे।

देखल जाओ त मधेशी आखिर दमित भइल कहाँ नइखे, देश के प्रसाशनिक निकाय होखो त, सरकारी कार्यालय होखो त ,चाहे पुलिस प्रशाशन होखो कि मिडिया, जगह जगह पर मधेशी जनता बस अपहेलना के शिकार भइल बा ।  भुल्चुक से दू-चार गो हाकिम मधेसी मिल भी जाइ त ओकर हैसियत एगो पिउन के भाति भी ना होखेला । उहे कार्यालय मे पहाडी समुदाय के एगो पिउन भी बा त ओकरा के दुत्कारेला ।

हमनि मे आखिर कमि कहा रह गइल बा ? की कही कमि रहे त हमनी के पुर्खन सब के, जे अपना अधिकार लाए सजग ना भइल लोग, ना त लडाई लड़त-लड़त सहादत हो गइल लोग । अब उहे पुर्खन के कसम खाके प्रण लेवल जाओ कि शान्त, समृद्ध आ सुशोभित मधेश हमनी के कालखण्ड मे हि बनावे के बा ।  राज्य के हर निकाय मे आपन पहिचान स्थापित करेके बा । ताकि आवेवाला सन्तति हमनी के ना सरापो बल्कि सम्मान के दृष्टिकोण से देखो।

ईहा  के मिडिया भी विभेदीकरण मे अब्बल दर्जा मे आवेला । हमरा बिचार मे मिडिया के राष्ट्रवादी ना हो के निष्पक्क्ष होखे के चाही । काहेकी ईहा के राष्ट्रवादी भावना जवन बा उ नश्लवादि धारणा से ग्रसित बा। दिन के उजियारा मे तारा आ चांद सुरज से प्रतिस्पर्धा ना कर सकेले ओहिसे चुपचाप कहिँ छिपछिपा के बैठल रहेला आ जइसे हि रात परेला त सारा आकाश भर छ जाला । नेपाल के खस समुदाय इहे चिज के अनुसरण कइले बा लोग । दुर पहाड पहाड मे जा-जाके पहाडी जनता के शीक्षित करेवाला सबसे सम्मानित पेशा शिक्षक मे सबसे ज्यादा लोग मधेशी, सबसे ज्यादा डाक्टर, इन्जिनियर मधेशी, बड्का बड्का बुद्धिजीवी मधेशी, फिर भी प्रशाशनिक आ राजनीतिक पहुच मे सबसे कम मधेशी , ई काहे ?  का ई कहल जरुरि बा कि ई व्यवहार सौतेला ना हटे ??

आज भी मधेशी जनता के छाती भितर पुलिस प्रशाशन के लेके एगो डर समाहित बा । मधेश के गाव मे रहेवाला जनमानुष के मनोविज्ञान पर बहुते गहरा प्रवाह परल बा । अज भी मधेश के लइकन सन् जब कवनों पुलिस के देखेला त झट से अपन घर मे जा के छिपजाला लोग ।  लइकन के बात छोडी शयान आदमी भी थरथर कापेला पुलिस के डर से, आ ई हाल मधेश के हर गाव के बा । ई महज एगो संयोग ना हो के मधेशी जनता के उपर सदियन से पुलिस प्रशाशन के द्वारा कइल गइल व्यापक दमन के नतिजा हटे । मधेशी जनता के प्रशाशन से दुर काहे राखल गइल बा ? अगर प्रशाशन मे बराबरी पहुच रहित त ई सब विभेद के सामना हि ना करेके परित । ई सब बात अवश्य हमनी के सोचे पर मजबुर करेला । आखिर समानुपातिक समावेशिता के जरुरत का हटे ? आपन पहिचान पुलिस प्रशाशन मे स्थापित कइल सबसे महत्वपुर्ण काम मे से एक हटे । आ ई बात सब के सम्पुर्ण मधेशी जनताके मधेश प्रति पूर्ण निष्ठा राख के मनन करे के जरुरत आ गइल बा ।

ई बात नइखे कि ई शहर-बजार मे रहेवाला मधेशी लोग दमन से अछुत बा लोग । ना उहो लोग ओतने दमन झेलले बा लोग जेतना गाव मे रहेवाला मधेशी लोग । बस फरक बा त दमन के प्रकार मे ।

हमरा त सबसे बेसी दुख ई बात के लागेला जब बोर्डर पर रहेवाला केतना मधेशीजन दिनरात आपन सिमाना के खातिर केतना भारतीय लोग से लडभिड जाला लोग, केतना लोगन के पास त नागरिकता भी ना होला माकिर फेरु आपन सिमाना के बचाव मे कवनों कसर बाकि ना राखेला  लोग । तेपरो ई देश के परम्परा कहल जाओ या शाशक व्यवस्था कहल जाओ, जवन राष्ट्रियता  के परिचय नागरिकता मे खोजेला लोग, ई शाशक लोग ई बात कहिया सम्झी कि राष्ट्रियता के परिचय इमानदारिता आ नैतिकता से होला नाकी नागरिकता से।

अगर मधेश के किसान के हि बात कइल जाओ त किसान सब के जिविका मे स्तरोन्नति करे मे नेपाल सरकार कहिया का कदम बढइले बा ? मधेश बा त नेपाल बा, मधेश के खेति के बिना नेपाल के आधा से ज्यादा लोग भोकमरी से मरी इ बात जानला के बादो कृषि मे आधुनिकता लियावे के कवनों खास काम आजले नइखे भइल । पुरा दुनिया मे धिन्डोरा पिटेला लॊग कि नेपाल कृषिप्रधान देश हटे, बाक़िर ईहा  के  कृषक आ कृषि के का स्तर बा सरकार कहियो ध्यान देवे के कोसिस कइले बा ? ना कबो ना ।।

जब तक ले हमनी दोसरा के पहिचान मे आपन पहिचान खोजत रहल जाइ, हमनी तब तक ले ना त आपना पहिचान के उजागर कर सकत बानि सन् ना हि उत्थान, ना हि उचित सम्मान । ठेहुना घिसत रह जायेम सन् बाक़िर हात आइ कुछो ना । दोसर मे ना आपन पहिचान अपने मे खोजि आ ओकर विकास मे निरन्तरता दि।

बस मधेसी जनता अपने मे लडल छोड्देओ, एक दुसरा के उपर दुर्भाव राखल छोड्देओ, आ जात-पात से उपर उठ के सम्पूर्ण मधेश के भलाइ लाए एकजुट होखिके आगे बढी त मधेश के समृद्ध बने मे ५-६ साल के हि देरी बा, ओकर बाद कवनों मधेशि के गुलामी करे के ना परि ।

अभिन के शाशक वर्ग के मनशाय का देखल गइल बा कि ओकनि हमनी के एगो कमजोरी के फाइदा उठावे मे लागल बा लोग । भाषा आ जातियता के द्वन्द फैलावे के, भोजपुरियन आ मैथिली भाइ मे फुट डालके शाशन करेके । बाकिर ओकनि के ई देखावल जरुरि बा कि मधेश बुद्ध के भुमि हटे, शान्ति राखल हमनी के सभ्यता हटे । मधेश के धरति हि माँ बैदेही (आदर्श नारि सीता) के जनम से पवित्र भइल बा । अगर ई धरति के केहू  लाल करेके खोजिहे त याद रहो मधेश दुर्गानन्द झा जइसन वीर योद्धा के भी भुमि हटे ।

पहाडी समुदाय के मधेश प्रति के सोच मे रुपान्तरण कइला  के जरुरि बा । मधेशी जनता के आपन अधिकार लाए सजग होखे के जरुरि बा । आपसी एकता के जरुरि बा । मधेश के भित्तर रहल कु-संस्कृति लाए अपने से हि आवाज उठाके, निराकरण कइल जरुरी बा । मधेश के सबसे बढिया पक्ष स्त्री के देवी मानल जाला, एगो सुसज्जित मानसिकता के साथ् उहे देविके अधिकार लाए लडल जरुरि बा । राजनैतिक सचेतना के जरुरि बा । जातियता के आधार पर आपन नेतृत्व चुनल छोडके एगो कुशल व्यक्ति के नेतृत्व के धार मे लेयाइल जरुरि बा । आ सबसे जरुरि बात की हर एक मधेशी के समृद्ध, सुन्दर आ समुन्नत मधेश के परिकल्पना कइल नैतिक आ वैचारिक रुपसे नितान्त जरुरि बा ।

आपन पहिचान खुद बनाई, आपन भाषा के जगेर्णा स्वयम् करी, एकरा लाए आपसी एकता के छोड दोसर कवनों विकल्प नइखे । शाशक वर्ग से लडाई करेके नईखी कहत, हक लेवे के कहतानी । उहे हक जवन एगो जनता के आपन राष्ट्र से होला, उहे हक जवन एगो जनता के जन्मसिद्ध हक होला । आ उ हक मे कवनों किसिम के बेइमानी मे चुप ना रहेके आग्रह भी ।

जय मधेश ।। जय नेपाल ।

साभार :-भोजपुरी अध्धयन तथा अनुसंधान केन्द्र (बिधान )

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