काँट भरल प्रादेशिक अभ्यास मे, कब खिली गुलाब ? – चन्द्रकिशोर झा

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वीरगंज, जेठ //

काँट भरल प्रादेशिक अभ्यास मे, कब खिली गुलाब ? संघीयता खतिरा आँख मुनउअल के खेल चलत रहल । चीखत बाटे सवाल, मिली कब जबाब ? विगहा पचास भल होले पोखरिया, सरि के खराब कइदे नन्हकी मछरिया । चुटकी भर खुशी खातिर मुठ्ठी भर लोग । खाँची भर जिनगी के ऊपर, चिल्ह अस मारता झपेटा । प्रादेशिक अभ्यास के मधुमासकाल चल रहल बा बाकिर स्थिति ओतेक अनुकूल नइखे । 

पहिला ई कि आज के प्रदेश सभा सदस्य में से अधिकांश अतना जल्दी सम्झौता करत नजर आ रहल बाड़े, जइसे ऊ छोट भइया राजनीतिज्ञ होखस । दोसर ई कि आज के नेतागण में से सार्वभौम प्रदेश सभा के सदस्य कहाए के ना, बल्की आपन क्षेत्र के “खलीफा” कहाए के सबख चरचराय लागल बा । इहे कारण बा कि प्रादेशिक राजनीति में कई तरह के अभाव रहला के बादो जदि कौनो बिडंबना, कौनो अन्तर्विरोध भा अन्तद्र्वन्द्व, कौनो संघर्ष भा कौनो क्राइसिस बा ओकरा के सहज मान लेहल जात बा । कुछ लोग के कहनाम बा जौन तरह के राजनीतिक तौर तरिका बा ओही दिसाई पनपल ई रेवाज बेजाय नइखे ।

ई बात एही खतिरा कहल जा रहल बा कि समझ रहे जीवन जब जंजीर तुरके बागी हो जाला तब सगरो इमरित बरसेला । प्रदेश सभा सदस्य लोग के बेफिकिर चाल बा । कवनो लोभावे वाला वेहवार नइखे । जवना संघीयता खातिर मध्य मधेस क्षेत्र में ऐतिहासिक संघर्ष भइल, उहवाँ आपन प्रदेश बनला के बाद लोग में अपनापन नइखे लउकत । एकर कारण बा प्रदेश सभा के सदस्य लोग काल्हुक दिन से फरक रङढङ नइखे प्रस्तुत करत । प्रादेशिक अभ्यास के बारे में सही सही चित्र उहे खिंच सकेला जे सा“चों ओह चरित्र के नजदिक से जनले आ परखले होखे । अध्ययन से भी अभ्यास में परिपक्वता आवेला, अनुभव से भी आवेला । प्रादेशिक अभ्यास पहिल प्रयोग बा एह से अध्ययन आ दोसरा जगह के प्रयोग से सिखल जा सकता ।

आम लोग के ई सवाल हमे भीतर से हिला देला आ हमार मन उदास हो हो जाला । जानतानी, उदास भइल, ठीक काम नइखे । आन्हर गली में प्रवेश कइल ह, मृत्यु से ज्यादा भयंकर ह । चुपचाप हाथ पर हाथ रखके विवशता के मुग्ध भाव से झेलल अपराध ह, निंदा जोग काम ह । कबो कबो हमरा त्रासदीपूर्ण सपना आवेले स । बड़–बड़ त ना, छोट–छोट लोग सपना में आके हमरा से सवाल करेला । मसलन रमेश महतो, अब्दुल कयुम डँफाली, प्रमोद सदा, भगवती मंडल आ शत्रुधन पटेल आ अइसनके ना जाने कतना लोग । पूछेला लोग – का रे, का अइसनके संघीयता खातिर हमनी आपन जिनगी कुरवान कइनी ? फरारी के जीवन जिअनी ? जेहल में सडनी ? बिना इलाज के तड़पत रहनी ? का हमनी चहती त व्यक्तिगत धन–सम्पति, सुख–सुविधा ना बटोर पवती ? मौज मारे के मौका हमनियो के मिल सकत रहे ।

आज जवना संस्कृति के विकास हो रहल बा ओह में बहुत बढि़याँ डिभी जामे के उमेद नइखे । बाकिर अभी से प्रश्न उठावल जरूरी बा आउर प्रदेश से, प्रदेश २ के सांसद लोग में गम्भीरता आ गुरुत्व अधिक लउके के परल । भटकला से ना होई । निश्चित रूप से अभिनो संघीय सरकार में अधिक अधिकार बा । ओहीतरे स्थानीय सरकार के नवका संविधान मजबूत बनइले बा । अइसन अवस्था में प्रादेशिक पग थाहत ठेङत राह चले के होई । जिनगी के नदिया में बेथाह पानी, प्रादेशिक संघर्ष तूरके किनार, धार चले मनमानी । का एकरा खतिरा प्रदेश सांसद लोग मानसिक रूप से तैयार बा ? सोझे झर–झर केन्द्र से अधिकार ना झरेला । होस ना करेम त छावलो ओरियानी चुए लागी । अ“गनवा सुखले रह जाई ।

प्रदेश सभा में हंसन पर हावी बा बकुलन के टोली । चोर आ चुहाड़ के समाज पर रुआव बा । जे चुनाइल बा ओकर असली मुखड़ा तोपल, आ लागल बाटे नकाब । कारण चुनाव महङ हो गइल । ईमान्दार आ प्रतिबद्ध राजनीतिकर्मी चुनाव नइखे लड़ सकत । आंदोलन करेवाला जमात बिना पइसा लेले भोट नइखे देत । जात, पइसा, धाख, धम्की में भटकेला लोग, स्वारथ के घेरा बा । ऊपर के ऊह सबकर मराइल बा । एह से भइल का  चिराइन गन्ध से घोराइल हावा, देखत देखत पसर रहल बा प्रादेशिक राजनीति में ।

उमेद अबहुओ छोड़े के नइखे । नागरिक खबरदारी चलत रहेके चाहीं । प्रादेशिक अभ्यास पूर्णता में पहुँचे में अब जादे देर ना होई, एकर जागरुक पहरेदारी होखेके चाहीं । ई प्रदेश सभा ऐतिहासिक सिद्ध होखो । प्रादेशिक अभ्यास महत्वपूर्ण भूमिका निभावेवाला उल्लेख होखो । प्रदेश २ ए के ना दोसरो प्रदेश के जे लोग संघीयता के पक्षधर बा उहो लोग के जिम्मेवारी बा प्रादेशिक अभ्यास के मजबूत आ प्रभावकारी बनावल जाए । प्रदेश सभा में जौन अनुपात में उन्नत आ परिपक्व विमर्श होई ओहीतरे प्रादेशिक सरकार गतिशील होई । कमे समय में कइयन जगह में लोग के आक्रोसपूर्ण मुद्रा उभरके सामने आइल । प्रादेशिक अभ्यास में होत विसंगति आ केंद्रीय सरकार के सौतेला व्यवहार के लेके लोग में उत्तेजना बा । गरमागरम बहस शुरू हो गइल बा । कुछ लोग केंद्र से अपेक्षा कइले बा कि अब याचना ना, रण होखे ।

अभी के जे प्रदेश सभा सदस्यगण बाड़न ओह लोग के ऐतिहासिक आ दुरदर्शी भूमिका बा । बसिआइल विकेंद्रीकरण के आ“गन में झाडूÞ देत स्वायत्त आ स्वाभिमानी प्रादेशिक अभ्यास के चिकन खुँड़पंैडि़या बनावेके बा । तबे प्रादेशिक अभ्यास के बाट से का“ट साफ होई आ जन–अपेक्षा अनुकुल के गुलाब खिली । कहल जाला – बसिआ अ“गना में बनिा झाडू देले रोज रोज के कचरा भरके बसाए लागेला – अधिकार के प्रयोग भी ढा“पले–तोपले बजबजाय लागेला, मुखरता के झाडू फेरके चिकन ढुल–ढुल कर देवे के चाहीं । प्रदेश सभा सदस्यगण, इतिहास राउर बाट जोह रहल बा । हमार बात सुनके राउर चेहरा पर केतना आड़ा तिरछा लकिर आपन सवाल जवाब छिपौले हवा में तैरत रहल आ रउवा झनझना उठली, एकर चिंता हमरा नइखे । हम देखेम बलिदानी के तबीयत कइसन बा ।

डाक्टर आ इंजिनिअर के समाज – आनंद ठाकुर

आपन समाज के एगो बात हम कहिओ बुझे ना सकनी । केहू से पुछनी त आपन बेटा–बेटी के कि डाक्टर कि इंजिनिअर बनावे के मन रहल पइनी । आज ९–१० कक्षा के कवनो विद्यार्थी से ‘तू का बनबऽ ?’ पुछेम त जवाब एकेगो आई ‘कि डाक्टर कि इंजिनिअर’ । बुझाला संसार में डाक्टर–इंजिनिअर के अलावा कौनो मर्या्दित पेशे नइखे । सभेकेहू एकरे पाछा दौड़े में लागल बाड़न । सब के साथ शायद हमहू एकरे पाछा लागल बानी । ई काहे हो रहल बा ? का साँचो डाक्टर–इंजिनिअर आउर पेशा से बड़का बा ? शायद ना । त काहे सबकेहू एकरे पाछा भाग रहल बाड़न ? नेपाल के कौनो विद्यालय में अगर पुछताछ कइल जाई त लगभग ६०–७० प्रतिशत विद्यार्थी डाक्टर बनेके चाहेलन ।

एकरा बारे में लिखे से पहिले हम कहेके चाहतानी कि हमरो एह विषय में ओतना ज्ञान नइखे । हम जथी देखनी, सुननी, बुझनी ओकरा आधार पर एह विषय पर थोड़बहुत अँजोर करतानी ।

त शुरूवात करतानी कि एगो विद्यार्थी कइसे डाक्टर–इंजिनिअर बने पहुँचेला । एस. एल. सी. (अभी एस. ई. ई.) परीक्षा के बाद जौन विद्यार्थी के निमन परीक्षाफल आई तौन विज्ञान पढ़े दौड़ी, कि आपन इच्छा से कि समाज के डर से । निमन विद्यार्थी विज्ञान पढ़ेला, ई समाज के एगो अंधविश्वास हो गइल बा । बहुत कम रहेलन जे निमन परीक्षाफल के बावजूद विज्ञान ना पढ़ेलन । विज्ञान लेहला के बाद ऊ दू बरीस चाहके भा ना चाहके विज्ञान पढ़ेला । १२ कक्षा के परीक्षा देहला के बाद बेसी विद्यार्थी के ‘अब का पढ़ीं ?’ थाह ना रहेला । तब ऊ लोग डाक्टरी आ इंजिनिअरिङ करे खातिर नाम निकाले में भीड़ जालन । केतना के सीट मिलेला केतना के ना मिलेला । जेकरा सीट ना मिलेला तौन कुछिओ कके भी गलत तरीका से सीट हासिल करेला । बाद में जेकर इच्छा रहेला तौन त पढ़ेला आ निमन से डिग्री हासिल करेला । बाँकिर जेकर मन ना लागेला तौन ना चाहके भी पढ़ेला, गलत काम कके भी डाक्टर–इंजिनिअर बनके समाज में अपना परिवार के रुतवा देखावेला । ई बा आपन देश के आ मधेश के अवस्था । सब के अपना नाम के पहिले ‘डाक्टर’ भा ‘इंजिनिअर’ लिखावे के भूत सवार बा ।

आखिर सब के दिमाग में काहे इहे भरल बा ? पैसा खातिर ? मान–सम्मान खातिर ? कि सब निमन चीज डाक्टर आ इंजिनिअरे में समीटाइल बा ? मधेश में त केतना लोग दहेजो लेवे खातिर ई सब करेला । हमनी के मानसिकतो इहे हो गइल बा । हम ई ना कहेके चाहतानी कि डाक्टर आ इंजिनिअर बनले गलत बा । निश्चित रूप से ई पेशा महìवपूर्ण बा । देश–दुनिया के विकास में एह लोग के महìवपूर्ण भूमिका बा । देश में कुछिओ बनावे के परी, कवनो नया रोग देखल जाई, कवनो जटिल समस्या आई त डाक्टर–इंजिनिअर लोग महìवपूर्ण भूमिका निर्वाह करिहें । समस्या डाक्टरी आ इंजिनिअरिङ में नइखे, हमनी के सोचाई में बा जे हरेक आदमी के डाक्टर–इंजिनिअर बनावे में लागल बा । एगो लइका बच्चे से एह पेशा में बहुत पैसा बा, अइसन सुनके बड़ा होखेला । बड़का होते–होते ई बात सब ओकरा मष्तिष्क में बैठ जाला आ ऊ चाहते ना चाहते इहे करे लाग जाला । समाज का सोची ? काहे कि समाज के मानसिकता त डाक्टर आ इंजिनिअर के भूत से भरल बा ।

बहुत विद्यार्थी डाक्टर–इंजिनिअर बनता बाँकिर देश में निमन डाक्टर–इंजिनिअर के अभी भी कमी बा । काहे ? कवनो दुर्गम ठाँव में ना निमन रास्ता बा ना स्वास्थ्य सुविधा बा, ना निमन शिक्षा बा । काहे ? काहे कि हमनी के मानसिकता गलत बा । जेकरा मन से पढ़े के इच्छा बा त एकरा पढ़े के ना मिलेला आ जेकरा इच्छा नइखे तौन डिग्री लेके घुमेला । आखिर एह तरह से समाज के विकास कइसे होई ? ना केकरो किसान बनेके बा, ना केकरो शिक्षक बनेके बा, ना उद्योग खोलेके बा, ना व्यापार करेके बा, ना अर्थशास्त्र पढ़ेके बा, ना आपन संस्कृति बँचावेके बा, ना लेखक बनेके बा, ना कुशल राजनीतिज्ञ बनेके बा । सब के डाक्टर–इंजिनिअर बनेके बा आ समाज अइसन हो गइल, अइसे बिगड़ गइल कहके सनावेके बा । काहे ? काहे र सब पेशा के सम्मान करेके काहे ना सिखनी हमनी ? अब देश ऊ के अवस्था नें नइखे जहाँ डाक्टर आ इंजिनिअर मात्र महìवपूर्ण रहे । अब देश के जेतना डाक्टर चाहीं ओह से बेसी शिक्षक के आवश्यकता बा ।

त का करेके चाहीं एह से बँचे खातिर ? आपन सोचाई बदलेके परी । सब पेशा के सम्मान करेके परी । केकरो कुछिओ पढ़े खातिर बल प्रयोग ना करेके परी । सब पेशा के ज्ञान देवेके परी । शैक्षिक संस्थान के सब कुछ के ओतने विज्ञापन करेके परी जेतना आजकाल डाक्टरी आ इंजिनिअरिङ के होखेला । अपना कथी करे के इच्छा बा ऊ पहचानके अगाड़ी बढ़ेके चाहीं । अइसन समाज के सिर्जना करेके परी जहाँ सब सब के पेशा के सम्मान करो । तब हमनी के समाज मात्र डाक्टर आ इंजिनिअर के ना रही । तब एगो किसान के बेटा डाक्टर आ डाक्टर के बेटा किसान बने में ना हिचकिचाई ।

माक्र्स के २००वाँ जन्म जयन्ती सम्पन्न

वैशाख २२, काठमाड़ो । द्वन्द्वात्मक आ ऐतिहासिक भौतिकवाद, वैज्ञानिक समाजवाद आ अतिरिक्त मूल्य के अविष्कारक, दुनिया के सर्वहारा वर्ग के महान नेता कार्ल माक्र्स के जन्म द्विशतवार्षिकी भव्य रूप से मनावल गइल ।

तत्कालीन नेकपा (एमाले), नेकपा (माओवादी केंद्र), नेकपा (संयुक्त) आ नेकपा (मसाल) के संयुक्त आयोजन में काठमाड़ो में दू–दिनहा प्रवचनमाला के आयोजन के सपराहट अनुसार ई कार्यक्रम कइल गइल । एह अवसर पर विभिन्न राजनीतिक नेता आ विचारक व्यक्तित्व लोग आपन आपन विचार राखत कहलन कि माक्र्सवाद पुरान नइखे भइल काहे कि ई एगो वैज्ञानिक विचार बा जे वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार स्वयं में नया आयाम के समायोजन के माङ करेला ।

तत्कालीन नेकपा (एमाले) आ नेकपा (माओवादी केंद्र) के केंद्रीय कार्यालय में भी माक्र्स के द्विशतवार्षिकी समारोह संपन्न भइल समाचार प्राप्त भइल बा । अभीन नेकपा (एमाले) आ नेकपा (माओवादी केंद्र) के बीच एकीकरण होके नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी के स्थापना हो चुकल बा । नेकपा (संयुक्त) एह से पहिलही नेकपा (माओवादी केंद्र) के साथ एकीकरण कर चुकल रहे ।

एमाले आ माओवादी केंद्र के बीच एकीकरण संपन्न ।

काठमाड़ो, जेठ ३ । देश के सब से बड़का दूगो कम्युनिष्ट पार्टी नेकपा (एमाले) आ नेकपा (माओवादी केंद्र) के बीच एकीकरण होके नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी के घोषणा हो चुकल बा । दोसर शब्द में कहल जाए त अभी सरकार में शामिल बाम गठबंधन अब नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी हो चुकल बा । एमाले अध्यक्ष आ प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली आ माओवादी केंद्र के अध्यक्ष आ पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’ दूनू जने नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी के अध्यक्ष बानी । पार्टी स्थायी समिति के घोषणा हो चुकल बा । अब नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी देश के ना कि पूरे एशिया के एगो शक्तिशाली कम्युनिष्ट पार्टी के मंजिल पर पहुँच चुकल बा ।

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