कामकाजी भाषा के बहसः भोजपुरी के सामर्थ्य

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गोपाल ठाकुर

नेको असंतुष्टी, विरोध, आंदोलन, संघर्ष के बावजूद नेपाल के संविधान लागू होके अभीन संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र कार्यान्वयन हो रहल बा । संविधान के सैद्धांतिक आ व्यवहारिक दूनू पक्ष पर समर्थन आ विरोध के स्वर गुंजिए रहल बा । एकरा बावजूद जब स्थानीय तह से लेके प्रादेशिक आ संघीय संसद के चुनाव संपन्न होके सभी जगह नया सरकार के गठनो हो गइल, तब एह संविधान में समयानुसार संशोधने संभव बा, बाँकी बात बाद में कइल ठीक रही ।

भोजपुरी के हिंदी के बोली के रूप में आजुओ कुछ लोग देखे के असफल प्रयास कर रहल बा । एकर जवाब त शताब्दी से कुछ बेसिए समय पहिले ग्रियर्सन दे चुकल बाड़न । उनका अनुसार त भोजपुरी संस्कृत के समकक्षी लोकभाषा ह ।

जहाँ तक राष्ट्रभाषा आ विभिन्न तह के सरकार के कामकाजी भाषा के सवाल बा, त संविधान के धारा ६ के मोताबिक अब नेपाल में जनता के जुबान पर रहल बड़हन से छोटहन तक २०६८ के जनगणना अनुसार १२३ गो भाषा अब एतहाँ के राष्ट्रभाषा बा । बाँकिर सरकारी कामकाजी भाषा के सवाल पर संविधान अबो संकुचित बा । एह संबंध में संविधान के धारा ७ में ३ गो दफा बाः ७(१) में संघीय सरकार के कामकाजी भाषा के रूप में देवनागरी लिपि में लिखाएवाला एकेगो नेपाली के उल्लेख बा ७(२) के अनुसार प्रदेश में ओतहाँ के संसद कानून बनाके नेपाली के अलावा बहुसंख्यक जनता द्वारा बोलल जाएवाला एक भा एक से बेसी भाषा के आपन कामकाजी भाषा निर्धा्रित कर सकतास आ ७(३) में भाषा के बारे में आउर विषय भाषा आयोग के सिफारिश पर नेपाल सरकार के निर्णय अनुसार होखे के प्रावधान बा ।

फिलहाल धारा ७(१), जेकर सब से अधिक जरूरी बा संशोधन के, पर गैर(नेपाली भाषिअन के सरोकार अभीन सतह में नइखे आइल । जहाँ तक स्थानीय सरकार के बात बा त कइयन जगह पर लोग स्थानीय मातृभाषा के सरकारी कामकाज में प्रयोग शुरू कर चुकल बा आ करे के उद्घोष भी कइले बा । रहल बात धारा ७(२) के कार्यान्वयन के, त जरूरत अनुसार ऊ होत चली बाँकिर थोड़ा सा जनाकांक्षा प्रदेश नं. २ में सामने आइल बा । मिथिलांचल के कुछ संकीर्ण सोइत बुद्धिजीवी आपन पक्षपोषण करनिहार के लेके प्रदेश के नाम मिथिला आ कामकाजी भाषा मैथिली मात्रे होखो कहके आंदोलन में लउकल बा लोग । ठीक ओकरा विपक्ष में भोजपुरी क्षेत्र के आम नौजवान लोग आक्रोशित लउक रहल बा जवन अस्वाभाविक नइखे ।

साथसाथ हिंदी के सरकारी कामकाजी भाषा मानल जाओ आ ना मानल जाओ दूनू खेमा में प्रदेश नं. २ के जनमत विभाजित देखल जा रहल बा । हिंदी पक्षीय खेमा के कहनाम बा कि ई मधेश के आम जनसंपर्क के भाषा बा त हिंदी वरोधी लोग के कहनाम बा कि एक तरफ ई भारत के भाषा ह त दोसरा एकरा के बोलेवाला के हिस्सा जमाजुमा ०.१२ प्रतिशत बा त एके कामकाजी भाषा काहे बनावल जाई । जहाँ तक जनगणना के बात बा त ओकर प्रतिवेदन पर बहुत असहमती बा जे में हिंदी पक्षीय लोग के कहनाम बा कि ऊ आँकड़ा यथार्थ नइखे । आँकड़ा यथार्थ होखो भा ना, हिंदी नेपाल में नेपालिओ से बेसी लोग बोलेला । मधेश से बेसी एह भाषा के जरूरत गैर मधेशी लोग के बा । नेता से अभिनेता तक मधेश में हिंदी के बिना नइखे रहे सकत त आम पहाड़ी लोग भी हिंदी के काबलियत के बिना भारत में रोजगार में नइखे रह सकत ।

अइसन तर्क वितर्क त चलते रही, जरूरत बा पहिले प्रादेशिक स्तर पर सरकारी कामकाजी भाषा के मामला के सुलझावेके । एकरा खातिर दूगो रास्ता बाः राज्य भाषा के मामला में कवनो घोषणा ना कके जहाँ के जनता जवन भाषा में कुछ लिखी भा कही ओके आधिकारिक मानके जाएके, त दोसर रास्ता बा संविधान के धारा ७(२) के तहत पहिले कानून बनावेके आ ओकरा बाद सरकारी कामकाजी भाषा होखे खातिर कुछ मापदंड बनाके ऊ मापदंड में परेवाला भाषा, चाहे एक होखे भा अनेक, के कामकाजी भाषा घोषित करत जाएके । हमनी के संदर्भ में दोसरके रास्ता बेसी अनुकूल होई । मापदंड वाला रास्ता के नजीर भी बा हमनी का लगे । रेडियो नेपाल में १ प्रतिशत से बेसी जनता के मातृभाषा रहल करीब समूचा भाषा में समाचार आ रहल बा । जनसंख्या के ही आधार मानके प्राथमिक तह के पाठ्यक्रम आ पाठ्यपुस्तक के भी निर्माण एह से पहिलही राज्य करा चुकल बा ।

अब रहल बात सरकारी कामकाज के भाषा के मापदंड के त ओह में जनसंख्या के प्राथमिक मापदंड मानल ठीक होई । एह अनुसार अगर २ नं. प्रदेश के बात कइल जाओ त सिलसिलवार से पहिलका से लेके दूसरका, तीसरका, चौथा … … करत कएगो भाषा के अभी देहल जा सकता, देके आगा बढ़ेके परल । अगर जनसंख्या के मानला से मात्रे समस्या समाधान नइखे होखेवाला त ओह में आउर सामर्थ्य ढूँढ़ल जा सकेला जे में व्याकरण, शब्दकोश, लोक साहित्य, आधुनिक साहित्य आदि पड़ सकता ।

अब रहल बात भोजपुरी के, त कुछ लोग के मुड़ी में अभीनो घामे नइखे लागल जइसन अपुष्ट बतकही सार्वजनिक हो रहल बा । भोजपुरी के हिंदी के बोली के रूप में आजुओ कुछ लोग देखे के असफल प्रयास कर रहल बा । एकर जवाब त शताब्दी से कुछ बेसिए समय पहिले ग्रियर्सन दे चुकल बाड़न । उनका अनुसार त भोजपुरी संस्कृत के समकक्षी लोकभाषा ह । ऊ कहेलन कि संस्कृत में ‘गृह’ भोजपुरी जइसन लोक जुबान के ‘गेह’ से पहुँचल बा ।

अगर आज के बात कइल जाओ त नेपाल के भाषा सब में भोजपुरी तीसरका १५८४९५८ (६ प्रतिशत) बा त प्रदेश नं. २ में दोसरका १०,०३,८७३ (१८.५८ प्रतिशत) । भारत में २०११ ई. के जनगणना मोताबिक ३,३०,९९,४९७ देखल जाला । एकरा साथ साथ आपन उद्गम स्थल नेपाल आ भारत के अलावा भोजपुरी मा‘रीशस, फिजी, सुरिनाम, गोयना, दक्षिण अफ्रिका, अष्ट्रेलिया, डच आदि विश्व के कई देश में बोलल जाला । जहाँ तक व्याकरण के बात कइल जाए त नेपाल, भारत, मा‘रीशस, सुरिनाम जइसन देश में एकर लिखित व्याकरण जनता के हाथ में बा । शब्दकोश के बात कइल जाए त नेपाल आ भारत में एकर शब्दकोश प्रकाशन हो चुकल बा । लोक साहित्य आ आधुनिक साहित्य के बात कइल जाए त नेपाल, भारत, मा‘रीशस, सुरिनाम, दक्षिण अफ्रिका आदि देशन में एकर विभिन्न विधा पर काम हो चुकल बा ।

भारत में अभी संविधान के आठवाँ सूची में राखे खातिर आंदोलन जारी बा । ओतहाँके भाषाकर्मी लोग से मिलल जानकारी के मोताबिक भारत में २० करोड़ से ऊपर लोग भोजपुरी बोलेला । ग्रियर्सन के भोजपुरी व्याकरण में ओह बेरा के जनगणना के मोताबिक २ करोड़ बेसी जनसंख्या भोजपुरी भाषी के बतावल गइल बा जवन अनुपात आज १३ करोड़ से ऊपर पहुँची ।

जहाँ तक हिंदी के भाषिका के रूप में हिंदी के देखे के सवाल बा त मैथिली भी हिंदी के भाषिका कहल जात रहे जब तक भारतीय संविधान के आठवाँ सूची में दर्ज ना भइल रहे । ओहीतरे राजशाही में नेपाल में जमाजुमा सतरहेगो भाषा बतावल जात रहे बाँकिर आज १२३ हो चुकल । अगर भाषावैज्ञानिक दृष्टि से देखल जाए त हिंदी आ उर्दी एकेगो भाषा हउए । व्यवहार में भी पहिले एके नाम हिंदुस्तानी से जानल जात रहे । बाँकिर पारिभाषिक शब्दावली खातिर फारसी, अरबी आ अंग्रेजी के ओर जाए के परंपरा आ लिपि में फरसी प्रयोग करनिहार मुस्लिम लोग उर्दू कहे लागल आ संस्कृत में पारिभाषिक शब्दावली खोजे के परंपरा सहित देवनागरी में लिखेवाला लोग एके हिंदी कहे लागल । बाद में धर्म भी जुड़ गइल । हिंदू(हिंदी आ मुसलमान(उर्दू हो गइल । बाँकिर उहो ढेर दिन ना चलल । पूर्वी पाकिस्तान के मुसलमान लोग बंगाली के मान्यता के लड़ाई लड़ल जवन बाद में स्वाधीनता आंदोलन में बदलके बंगलादेश के स्थापना कइलख । ओतहू चकमा लोग अपना के बंगलादेशी त कहेला बाँकिर बंगाली ना ।

अतः भोजपुरी हिंदी के भाषिका कहके काल्ह के शासकीय चरित्र प्रदर्शन कइल मोनासिब ना होई । अतः प्रदेश के सांसद लोग पहिले कानून बनाओ । ओकरा बाद मापदंड निर्धा्रित करो । ओकरा अनुसार जवन भाषा जहिआ सामर्थ्य हासिल करी कामकाजी भाषा के मान्यता पाई । इहे सुगम आ सुल्टा रास्ता बा । ओही से काल्ह के एकभाषी चरित्र के विरुद्ध लड़ाई लड़ेवाला लोग के आज आपन प्रदेश में फेर से कवनो बहाने दोसर एकभाषी चरित्र के प्रदर्शन हमनी के अग्रगमन के ओर ना ले जा सकता । जहाँ तक बात बा भोजपुरी के त ऊ अब हर इम्तहान में खरा उतरेके सामर्थ्य राखता ।

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