काहे टुगड़ कर देनी, गुरुजी ?

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स्वर्गीय मास्टर तारा सिंह

– गोपाल ठाकुर

गोपाल ठाकुर

गुआ रङ, अबीर, होरी–जोगिड़ा आ जी भरके खाए–पिए के परब ह । एहू साल ई परब आके चल गइल धूम मचाके । अखबार के पाना, फेसबुक, ट्वीटर, वेबसाइट सहित के सामाजिक संजाल अबो तक होरी के रमझम भरल समाचार आ तस्वीरन से सदाबोर पड़ल बा । कई महीना के बंदी के बाद एह साल होरी से कुछे दिन पहिले राजधानी आइल रहनी । देश में बढ़ल राजनीतिक कटुता के माहौल भले संवेदनशील होखे, आपन लइका–लइकी, साथी–सङ्हाती, टोला–परोसा में त मन मारके भी कुछ भूमिका निर्वाह करेके पड़ेला । ओइसे त राजधानी में फगुआ समते के दिन ओरा जाला, बाँकिर आपन मधेशी संस्कृति के निर्वाह त कौनो ना कौनो रूप में आदमी पहाड़ त का, विदेशो में करिए रहल बा । त कहल जाओ, मधेशी फगुआ के तेयारी चलत रहे । एतने में सुनील पटेल के एगो फोन आइल । हमरा लागल कि कहीं कुछ आयोजन होई । ओही में नेवते खातिर उनकर फोन आइल बा । बाँकिर फोन पर उनकर आवाज सुनते दिमाग सुन हो गइल ।

पहिले पहिले अपना बाबा के मुँह से सुनले रहनी, ई दुनिया मृतभुवन ह । बाँकिर ओह बेरा समझ में अइबे ना करे । सब लोग के जिंदे देखीं आ बाबा के मुँह से मृतभुवन सुनत रहनी । जब कुछ अकिल भइल त बात समझ में आवे लागल ।

उनकर पहिलके वाक्य रहल, ‘राउर गुरुजी अब ना रहनी ।’
बात त समझिए गइनी बाँकिर फेर से ठहिआके पुछनी, ‘कवन गुरुजी?’
‘राउर संगीत के गुरुजी, मास्टर तारा सिंह ।’
बाँकिर शायद उहो कुछ तसल्ली देवेके चहलन, ‘वीरगंज के एफ. एम. से सुननी ह, एक बेर फोन कके यकीन कर लीं ।’
ओइसे मरन के खबर त झूठ का होई ! तइयो गुरुजी के मोबाइल डायल कइनी । फोन उठते रोहारोहट सुनाई पड़ल । आउर कुछ अब का पुछल जाओ ! फोन राख देनी ।

पहिले पहिले अपना बाबा के मुँह से सुनले रहनी, ई दुनिया मृतभुवन ह । बाँकिर ओह बेरा समझ में अइबे ना करे । सब लोग के जिंदे देखीं आ बाबा के मुँह से मृतभुवन सुनत रहनी । जब कुछ अकिल भइल त बात समझ में आवे लागल । आज बाबा हमनी के बीच में नइखीं । उनका अर्थी के कान्हा उठवला कुछ दशक बित गइल । बाँकिर एह समझ के गुरुजी के अवसान से अभी करेजा पर पथल धके बरियार बनावेके पड़ता । जिनगी में पहिल बेर टुगड़ भइल महशुस करतानी ।
अब रउआ पुछेम, गुरुजी हमार अंश–वंश भा लागाइत में के रहनी ?

स्वर्गीय मास्टर तारा सिंह

एकर जवाब अभीन हम इहे देहेम कि उनका से खुन के ना, दिल के रिश्ता रहे । जी हँ, संगीत विशारद मास्टर तारा सिंह से हमार दिल के रिश्ता रहे गुरु–चेला के । बाँकिर अइसनो गुरु ना जे कुछ अछड़ चिन्हवले होखे, हाँथ धके सरगम भा धाधाधिंधा सिखवले होखे, कान फुँकके बभनउटी खानगी सरिअवले होखे, ट्यूसन के बहाने जेब गरमवले होखे … । एतने ना उनका से बहुत बेसी महारथ हासिल कइल संगीतज्ञ लोग से भी सङ्हत करेके मौका मिलल । बाँकिर संगीत के दुनिया में हम एके जने के गुरु जनले आ मनले बानी, मास्टर तारा सिंह के ।

बात २०४८ साल के ह । ऊ साल भी हमरा खातिर बहुत मनहुस साबित भइल । भाई दुर्घटना में पड़ल रहे । दहिना जाङ्ह के हड्डी दू टुकड़ा हो गइल रहे । हम एमाले के बारा जिला के पार्टी सचिव रहनी । ओह बेरा कम्युनिस्ट पार्टी में एक पदीय प्रभारी बनावल जात रहे । यानी हमही जिला प्रभारी रहनी । घटना रौतहट के टिकुलिया में भइल रहे । गौर में चार दिन तक के प्रयास में एंबुलेंस नसीब ना भइल आ ओतहाँ ऑपरेशन संभव ना रहे । हारके ले गइनी दरभाङा । करीब महीना दिन लाग गइल । तब तक राजनीतिक आ सामुदायिक दूनू हिसाब से पूर्व माले के पहाड़ी साथी लोग हमरा पछे में जिला अधिवेशन तय कर लेलक । हमरा हाँथ लागल जमाजुमा एगो चिट्ठी, सूचना खातिर । एक त गिरनी गाछ से दोसर परल मुङड़ी । पंचायत के विरोध में नोकरी–धोकरी छोड़ला से लेके जेल–नेल के कारण आर्थिक रूप से तबाह रहनी, ऊपर से राजनीतिक बेइमानिओ झेले के पड़ल । अधिवेशन में हम जिला कमिटी में आपन निरंतरता से इनकार कर देनी आ आ गइनी वीरगंज । मिनी लैंड बोर्डिङ स्कूल में पढ़ावे लगनी ।

२०५२ में नेपाल भोजपुरी प्रतिष्ठान के गठन भइल । गठन त भइल मित्र गोपाल अश्क के अगुवाई में वीरगंज में, बाँकिर लेआवल गइल काठमाड़ो में डा. वंशीधर मिश्र के नेतृत्व में । प्रतिष्ठान के दर्तो काठमाड़ो में ही भइल । कुँथला कुँहरला से एक बेर नवीकरणो भइल, बाँकिर पता ना, कए बरीस बित गइल फेर से नवीकरण नइखे भइल । हँ, नेपाल भोजपुरी प्रतिष्ठान के कुछ जिलन में शाखा जरूर खुलल । बाँकिर चलल देखल गइल बारा में रामप्रसाद साह आ पर्सा में गुरुजी का बले ।

ओह बेरा तीस बरीस के पंचायती तानाशाही के हर्दी–गर्दी बोलवला के बाद पहिलका आम चुनाव से गिरिजा प्रसाद कोइराला के सरकार बनल रहे । कुछे दिन का बाद मालूम भइल वीरगंज में एगो क्रिकेट मैच उद्‌घाटन खातिर उनकर सवारी होई । हमार स्कूल के प्रिंसिपल लालबाबू पटेल ओह बेरा झर्रा कांग्रेसी रहनी । स्कूल का तरफ से एगो सांगीतिक झाँकी लेके गिरिजा बाबू के स्वागत में जाए के फरमान जारी कर देनी । ओही झाँकी के तैयारी के क्रम में मास्टर तारा सिंह से हमार पहिलका मुलाकात भइल । देखके कुछ अचम्हो लागल, बोली ठेंठ भोजपुरी आ शकल–सुरत–लिवास से पूरा पंजाबी । ओइसे पंचायत काल में भी ठाकुर राम कॉलेज में पढ़त बेरा कुछ कार्यक्रम सब में दूरे से उनका के तबला बजावत देखले रहनी । लालबाबू जी के आदेश के मोताबिक हमरा हरमुनिया आ सरदारजी के तबला बजावेके जिम्मा मिलल । रिहर्सल का आगे–पिछे उनका से कुछ बातो हो जाए । एही क्रम में थाह लागल कि उहाँका पंजाबी ना होके मधेशी हईं आ उहो हमरे जिला के खरहीगाड़ बसीना । जी, उनकर घर बारा जिला के चिलझपटी में रहे आ खास नाम राम अदेया राउत । बाँकिर हम उनका के सरदारजी कहे लगनी ।
जब कुछ गानाबजाना के संदर्भ पर बात भइल त उहाँका पुछनी, ‘रउआ सुर–ताल में त कसल बुझातानी । कहीं संगीत सिखले बानी ?’
हमर जवाब रहल, ‘जे जहाँ मिल गइल कुछ सीख लेनी । पद्धतिबद्ध ढङ से कहीं कुछिओ नइखी सिखले । रउआ सिखावे सकेम ?’
‘काहे ना ?’
‘एह से कि ना हमरा लगे राउर फी देवेके औकाद बा आ ना नियमित तरिका से समय ।’
‘समय त निकालेके नु पड़ेला । आईं शनिचर का दिने हमरा डेरा में ।’
हम डेरा में गइनी । पता चलल उहाँका तबला आ गायन में प्रयाग से संगीत विशारद हईं, यानी संगीत स्नातक । बी. म्युज. कहला से भी होई । औपचारिक रूप से संगीत सिखेके क्रम आगे बढ़ल । गायन में सरगम आ थाट का साथे यमन आ भोपाली राग तक पहुँचनी । तबला में त्रिताल, दादरा, कहँरवा, खेमटा, रूपक, दीपचंदी आ झपताल तक पहुँचनी । एह तरे जब उनकर चेला भइनी तब से उनका के गुरुजी कहके संबोधन करत अइनी । एक साल बाद रेडियो नेपाल में उनका साथे प्रतिस्पर्धात्मक संगीत सम्मेलन में भी भाग लेनी । फेर साल भर बाद २०५० फागुन १५ गते वीरगंज में ‘भोजपुरी साँझ’ के भव्य आयोजन भइल । ओकरे बिहान भइला हम आ गइनी काठमाड़ो । आइल त रहनी कुछ इलाज खातिर जौन सफल त ना भइल बाँकिर ओकरे लमरला से हम एतहीं रहे लगनी । बाद में २०५१ में रेडियो नेपाल में भी कर्मचारी होके पहुँचनी, बाँकिर संगीत के ना होके समाचार खातिर । बस, हमार संगीत शिक्षा ओतहें रह गइल । कोशिस त काठमाड़ो में भी कइनी आगे बढ़ावेके, बाँकिर ना सकनी । हँ, एतना जरूर भइल कि रेडियो नेपाल में आधुनिक गायन के परीक्षा तक पास कके बइठल बानी ।

उनका भोजपुरी संस्कृति से अगाध प्रेम रहे जेकरा खातिर ऊ केकरो प्रशंसा आ केकरो निंदा करे में देर ना करीं । हमरा सामने के बात ह, एक जने जब पोता के नाती कहनी त गुरुजी उनका योग्यता–क्षमता पर ही सवाल खड़ा कर देनी ।

२०५२ में नेपाल भोजपुरी प्रतिष्ठान के गठन भइल । गठन त भइल मित्र गोपाल अश्क के अगुवाई में वीरगंज में, बाँकिर लेआवल गइल काठमाड़ो में डा. वंशीधर मिश्र के नेतृत्व में । प्रतिष्ठान के दर्तो काठमाड़ो में ही भइल । कुँथला कुँहरला से एक बेर नवीकरणो भइल, बाँकिर पता ना, कए बरीस बित गइल फेर से नवीकरण नइखे भइल । हँ, नेपाल भोजपुरी प्रतिष्ठान के कुछ जिलन में शाखा जरूर खुलल । बाँकिर चलल देखल गइल बारा में रामप्रसाद साह आ पर्सा में गुरुजी का बले ।

जीवन के अनेक उतार–चढ़ाव में गुरुजी के देखनी बाँकिर उनका चेहरा पर तनाव ना लउके । हँ जब पता चलल कि उनकरा मधुमेह आ उच्च रक्तचाप हो गइल बा, तब से हम महशुस करत गइनी कि कलाकार के दूगो जिनगी जिएके पड़ेला । आपन श्रोता–दर्शक खातिर प्रफुल्लित मुद्रा में आ अपना खातिर मानसिक तनाव में । ओहू में गुरुजी जइसन कलाकार जेकरा हर गुण रहे, बाँकिर वीरगंज से अटूट मोह रहल जेकरा कारण से उहाँका राष्ट्रीय–अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभरे ना सकनी । हम एह से कहतानी कि ऊ हमरा जइसन संगीत के कखरा भी ठीक से ना जानेवाला लोग से राष्ट्रीय स्तर पर आपन शास्त्रीय गायन में हरमुनिया पर साथ करवा लेले बानी । निरमोहिया एलबम २०५८ साल में बनावत बेरा हमरा इयाद बा कि रेकर्डिस्ट रवीन दर्शनधारी उनका से काठमाड़ो में रहेके अनुरोध कइले रहलें । एकर कारण रहे तबला पर उनका से निकलल हर अङुड़ी के बोल । काठमाड़ो में हम आउरो लोग के साथ गीत–गाना में शामिल भइल बानी । बाँकिर केहू के अङुड़ी के बोल साफ ना निकले त केहू के भोजपुरिया उड़ान समझ में ना आवे । रेडियो नेपाल में भी हमर कुछ गीत रेकर्ड भइल बा जवना में अधिकांश में हम ताल वादन से संतुष्ट नइखीं । अगर गुरुजी काठमाड़ो में रहतीं त कुछ आउर बात रहित । बाँकिर वीरगंज से उनका मोह के कारण रहल भोजपुरी । भोजपुरी उनका खातिर सिर्फ भषे ना, उनकर पूरा जीवनशैली रहे जवन आन जगह पर ना जी सकेवाला रहनी ।

उहाँका राजनीतिक रूप से भी सचेत रहनी, खासकके मधेशी राष्ट्रीयता के प्रति । गजेंद्रबाबू के समय से उहाँका सद्‌भावना पार्टी के सदस्य रहनी । बाँकिर ई बहुत कम लोग के मालूम रहे । काहेकि शायद एकरा के उहाँका उजागरो करेके जरुरत ना समझत रहनी । पहिलका संविधान सभा के चुनाव प्रचार में करीब महीना दिन हमनी एमाले चुनावी सांगीतिक अभियान में साथे रहनी । अतः उनका भोजपुरी संस्कृति से अगाध प्रेम रहे जेकरा खातिर ऊ केकरो प्रशंसा आ केकरो निंदा करे में देर ना करीं । हमरा सामने के बात ह, एक जने जब पोता के नाती कहनी त गुरुजी उनका योग्यता–क्षमता पर ही सवाल खड़ा कर देनी ।
हमरा जीवन के अन्हार पक्ष ई रहल कि गुरुजी आपन गुरुदक्षिणा लेबो ना कइनी आ चल बसनी । उमीरो खुछ खास ना रहे । जी, ५९ बरीस के उमीर में गुरुआइन सहित २ जने बेटी आ ४ जने बेटा के छोड़के खुद अलविदा हो गइनी । बाँकिर आज हम वीरगंज में अपना के टुगड़ महशुस करतानी । एह से कि पता ना, भोजपुरी सांस्कृतिक अभियान खातिर उनकर जगह केहू लेता कि ना ! गुरुजी के शत शत नमन ! शोकाकुल परिवारजन के प्रति हार्दिक समवेदना !

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