गंवार !!

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गंवार !!

ब-जब तु कहेलु हमराके गवार ।

अमेरेश यादव

फकरसे सिना फुलके चौरा होजाला हमार ।।

न जानि काहे तु हरदम रटत रहेलु शहर-बजार ।

स्वर्गसे सुनर ए गाउवाके अपने बा कला संस्कृति हजार ।।

मन नि कि इहा नइखे होटल-रेस्टुरेन्ट ना डिस्को- बार ।

पर हर भोजनमे अपने माटीके मिठास भरल रहेला परिकार ।।

इ हा त पुरवइया पछेया गावेला होरी आ बैल गरिएसे निकलेला झनकार ।

का लागि एमे तोहर एसी कूलर का करी कार ।।

पैसा आ फैशनके पछाडि दौडके शहरिया होजाला बरि लचार ।

ना होला उ लोगमे रित- प्रित ना कौनो संस्कार।।

टोला परोसामे शहरमे जब परेला कोइ बिमार ।

ना होला एक-घुट पानी देवेबाला कोइ जिला-जवार ।।

गर्व बा कि हम बानी गवार । इहा पैसा ना रित-प्रित के होला ब्यापार ।।

हर घर अपने से भरल बा हमारे बा सब भाइ-पटदार ।

हर झोपडी के अपने दुःख सुख ह पर बनके रहेला एक परिवार ।। हम बानी गवार ….

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