छठ के बैज्ञानिक महत्व !

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वीरगंज के घड़ीअर्वा पोखरी छठघाट

छठ के बैज्ञानिक महत्व

आनन्द कुमार गुप्ता

ठ पवनी के धार्मिक, साँस्कृतिक, समाजिक, ऐतिहासिक, पर्यटकिय लगायत बहुत महत्व होते हुवे भी आज के बैज्ञानिक यूग में जवन पवनी आ सँस्कृति के बैज्ञानिक महत्व होला ओह पवनी आ सँस्कृति के ब्यापता आ प्रचार प्रसार संसार भर भइल बा जेमे से एगो छठ भी ह । बैज्ञानिक नजरिया से देखला पर छठ शब्द दूगो शब्द मिल के अर्थात छह् (छव गो अवस्था) आ हाथ् (हाथ योग ) मिलके बनल शब्द ह, अर्थात शाब्कि रुप से छठ के अर्थ छव गो अवस्था में कइल गइल एक किसिम के हाथ योग (जवन योग के माध्यम से प्रत्यक्ष सौर्य शक्ति प्राप्त कइल जा सकेला) जइसने एगो प्रक्रिया ह । दुसर रुप से देखला पर हिन्दु क्यालेन्डर के अनुसार छठ के मतलब सँख्या छव होला जवन कार्तिक माहना के अँजोरिया के छउवा दिन अर्थात षष्ठी तिथि होला । योगी श्री ओमकार के अनुसार छठ पवनी निरन्तर रुप से प्रकाश से शक्ति प्राप्त करे वाला प्रक्रिया ह । छठ कइला पर सूरुज के प्रकाश में के ‘फोटोन’ कहल जाए वाला शक्ति ब्रतालु के आँख आ छाला के माध्यम से दिमाग में जाके जैबिक विधुत (करेन्ट) उत्पन्न करेला जवना के चलते सारा देह सौर्य शक्ति से चार्ज हो जाला ।

छठ के इतिहास 

छठ पवनी कहिआ से शुरु भइल एकर कवनो ठोस प्रमाण नइखे मिलल, बाकिर विभिन्न यूग आ कालखण्ड में विभिन्न प्रमाणसब उल्लेख बा । सत्यूग में पुलस्त्य मुनी आ सत्यब्रती भीष्म के वार्तालाप में छठ के उल्लेख मिलेला त द्वापर में महाभारत काल खण्ड में पाण्डव लोग के अज्ञातवास के बेरिया पाण्डवलोग के कल्याण होखो आ युद्ध में विजय होखो कहके राजा विराट के घरे द्रौपदी सूरुज भगवान के पूजा अर्थात छठ पूजा कइले रहली । दोसर मान्यता के आधार पर अंग देश के राजा सूरुज पुत्र दानवीर कर्ण सूरुज पूजा (छठ पूजा) कइले रहस कहके कथा बा । स्कन्द पुराण में विस्तृत चर्चा सहित कहल गइल बा कि ई ब्रत नियम, निष्ठा पूर्वक जे भी कर सकेला । जात भा धर्म के कवनो बन्धन नइखे । जनाना–मर्दाना (सब उमेर के) ई ब्रत के अधिकारी ह लोग । एसे का स्पष्ट होता कि ई पवनी पौराणिक काल से भी पहिले से प्रचलन में बा । इन्साक्लोपेडिया के अनुसार ई पवनी के उल्लेख हिन्दु धर्म के सबसे पुरान ग्रन्थ ‘ऋगवेद’ में भी बा । ऋगवेद में सूर्य पूजा के महत्व के वर्णन कइल बा कि “ हे जाज्वल्यमान सूर्यदेव, जब रउवा उषा के गोदी में उगेनी, तब भक्तजनलोग गीत गाके राउर स्तुति करेला” । ऋगवेद में सूर्य के सब देवता के स्रोत मानल गइल बा आ ऋगवेद के ही अनुसार उदयकालीन आ मध्यकालीन सूर्य के उपासना कइला से दीर्घकाल तकले जीयल जाला । अर्थवेद में सूर्य के औषधिकार घोषित कइल गइल बा । सूर्य के देवत्व के संसार के लगभग सब संस्कृति स्विकार कइले बा । सूर्योपनिषद में उनका के ब्रह्मा, विष्णु, महेश के शक्ति के रुप में बतावल गइल बा । वेद में उल्लेख भइल अनुसार उषा (पहिल किरण) के ही छठ परमेश्वरी कहल बा । साम्वपुराण में अपने पिताजी श्रीकृष्ण आ महर्षि दुर्वासा के श्राप से भयंकर कोढ़ से पिडि़त साम्व सूर्य के आराधना के फलस्वरुप रोगमुक्त भइल रहलन कहके चर्चा कइल बा । सूर्यपुराण अनुसार सबसे पहिले अत्रि मुनि के पत्नी सति अनुसुइया अटल सौभाग्य आ पति के प्रेम पावे खातिर छठ व्रत कइले रहली । कुछ द्विान लोग के कहनाम बा कि भगवान राम आ सिता वनवास से लवटला के बाद छठ व्रत कके सूर्य पुजा कइले रहे लोग आ उहे आज लेक चलत आ रहल बा । सातवा सतावदी में उत्तर भारत के राजा सम्राट हर्षवद्र्धन के दरबार के कवि वाण भट्ट के साला आ प्रसिद्ध कवि मयूर भट्ट अपने बेटी के श्राप के कारण कोढ़ से पिडि़त भइला के कारण सूर्य उपासना के बाद फेर से सुन्दर आ स्वस्थ शरिर प्राप्त कइलन इतिहास बा आ ओकरे बाद छठ पर्व के प्रचार प्रसार भइल कहके मान्यता बा । मयुर भट्ट ठीक भइला के बाद ‘सूर्यशतकम्’ कहल किताब के भी रचना कइलन । बैज्ञानिक नजरिया से देखला पर वेद के समय से ही ई पवनी के प्रचलन बा । हिमालय में तपस्या करेवाला ऋषि लोग एह छठ प्रक्रिया के माध्यम से सूरुज के किरण में रहेवाला सौर्य शक्ति प्राप्त कके महिनो–सालो खाना खइले बिना रहे लोग ।

छठ के छवगो अवस्था (प्रकाश शक्ति प्राप्त करे के प्रक्रिया) 

छठ के सब प्रक्रिया के छव गो अवस्था में बाटल गइल बा । अवस्था १ ः उपवास, सरसफाई आ विशेष अनुशासन के कारण से देह आ दिमाग के निविर्षीकरण (डिटोक्सिफीकेसन) करे में मद्दत मिलेला । ई अवस्था ब्रतालुलोग के देह आ दिमाग के कौस्मिक सौर्य शक्ति प्राप्त करे खातिर तैयार करेला । अवस्था २ ः आधा देह पानी में डुबा के खडिअइला के कारण से प्राप्त शक्ति देह से बाहर निकले में कमी आवेला आ शक्ति दिमाग के ओर जाए लागेला । अवस्था ३ ः कौस्मिक सौर्य शक्ति ब्रतालु लोग के आँख के रेटिना आ छाला के माध्यम से पिट्युटरी, हाइपोथालामस आ पिनियल ग्रन्थी में प्रवेश करेला । अवस्था ४ ः पिट्युटरी, हाइपोथालामस आ पिनियल ग्रन्थी सक्रिय हो जाला । अवस्था ५ ः कौस्मिक सौर्य शक्ति विभिन्न स्पाइन आ न्युरोन के माध्यम से शरिर के विभिन्न भाग में जाला आ ब्रतालु के देह कौस्मिक पावर हाउस में परिवर्तित हो जाला । ओकरा चलते शरिर के सब निस्क्रिय तन्तु फेर से सक्रिय हो जाला । एकरा के योग के भाषा में कुन्दालिनी शक्ति कहल जाला । अवस्था ६ ः ब्रतालु के देह एगो चैनल (रास्ता) बन जाला जेसे शक्ति उत्पादन होके विभिन्न माध्यम आ रुप में फेरु ब्रहमाण्ड में सञ्चार होला आ ई क्रम जारी रहेला ।

छठ के वैज्ञानिक महत्व झल्कवात

छठ के बिज्ञान 

– आदमी के देह एगो शक्ति सञ्चार के रास्ता ह । – सौर्य जैविक विधुत आदमी के शरिर में चले लागेला जब देह कुछ खास समय के आ खास वेभलेन्थ के सौर्य किरण पर पडेला । – कुछ खास शारिरीक आ मानसिक अवस्था में शरिर के सौर्य जैविक विधुत के लेवे के आ शरिर में प्रवाह होखे के क्षमता बढ जाला । – छठ प्रक्रिया आ मान्यता के प्रमुख उदेश्य दिमाग आ देश के विभिन्न भाग में कौस्मिक सौर्य शक्ति प्रवाह करे के ह । – रेटिना एगो प्रकाश प्राप्त करेवाला आँख के भाग ह जवन अँजोर पडला पर शक्ति प्राप्त करेला । अर्थात जब आँख अँजोर में पडेला तब विधुत शक्ति रेटिना आ पिनियल ग्रन्थी के जोडेवाला नश होके रेटिना के माध्यम से पिनियल ग्रन्थी में जाला जवना के कारण से ग्रन्थी सक्रिय होजाला । पिनियल ग्रन्थी, पिट्युटरी आ हाइपोथालामस ग्रन्थी के बहुत नजदिक रहेला (ई तिनु के त्रिवेणी भी कहल जाला) जवना के कारण से उत्पादित शक्ति के प्रभाव ई तिनु ग्रन्थी पर पडेला । ई तिनु ग्रन्थी के सक्रिय भइला के कारण से निमन स्वास्थ्य आ शान्त दिमाग प्राप्त होला ।

छठ कइला से होखेवाला फायदा 

छठ प्रक्रिया में दिमागी अनुशासन पर बहुते दबाव पडेला । विभिन्न मान्यता के पुरा करते ब्रतालुलोग अपनेआप के आ वातावरण के सरसफाई में ब्यस्त रहेला लोग । सरसफाई छठ के एगो बहुत बलवान पक्ष ह जवन छठ के समय में ब्रतालुलोग के दिमाग में रहेला । एकरा चलते एगो बडका निर्विष प्रभाव शरिर आ दिमाग पर पडेला काहेकि शरिर में बहुत किसिम के जैविक रसायनिक परिवर्तन होला । उपवास शरिर के निविर्षिकरण करे में बहुत मद्दत करेला । शरिर में उतपन्न होखेवाला विष से छुटकारा मिलल बहुत अच्छा बात ह काहे कि ई हमनी के शरिर के विभिन्न रुप से नोक्सान करेला । निविर्ष अवस्था में शक्ति सञ्चार होखे में सहज हो जाला आ आदमी के फुर्तिला भी बनावेला । कारण सधारण बा । हमनी के शरिर में प्राकृतिक रुप से रहेवाला रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता हमनी के शरिर में उतपन्न होखेवाला विष से लडे में बहुत खर्च हो जाला, बाकिर जइसे प्रणयाम, मेडिटेसन, योग इतयादि आ छठ प्रक्रिया अपनइला पर हमनी के शरिर में उत्पन्न होखेवाला विष के मात्रा बहुत हद तकले कइल जा सकल जाला । विष कम उत्पन्न भइला पर शक्ति के बचत होला आ आदमी फूर्तिला महशुस करेला । जेकरा चलते हमनी के छाला नया आ स्वस्थ लउकेला, आँख से ज्यादा लउकेला आ बुढापा धिरे धिरे आवेला ।

शारिरीक फायदा 

– छठ कइला पर रोग से लडेवाला क्षमता बढेला । – छठ के विभिन्न मान्यता आ प्रक्रिया पुरा कइला के बाद सूरुज के सुरक्षित किरिण विभिन्न चरम रोग जइसे घाव, दिनाँय, हगुहट आ कोढ जइसन रोग के ओरवावे में मद्दत करेला । – छठ प्रक्रिया से जवन शक्ति शरिर में प्रवाह होला ओकरा चलते खुन में रहेवाला ह्वाइट ब्लड सेल के शक्ति बढ जाला । – सौर्य शक्ति के प्रभाव ग्रन्थी सब पर पडेला जेकरा कारण से सन्तुलित हरमोन के उत्पादन होला । – हमनी खातिर आवश्यक शक्ति सौर्य शक्ति के प्रत्यक्ष प्राप्त कर सकतानीसँ जेकरा चलते औरी अगाडी शरिर के निविर्ष होखे में मद्दत मिलेला ।

मानशिक फायदा 

– ब्रतालु के दिमाग में एगो रचनात्मक शान्ति के सञ्चार होला । – छठ कइला से दिमाग में उत्पन्न होखेवाला नाकारात्मक विचार, क्रोध, खिस, द्वेश, इश्र्या आदी धिरे–धिरे कम होते दिमागी रुप से मुक्ति मिलेला । – पूर्ण निष्ठा आ ध्यान पूर्वक छठ कइला से आदमी के अवस्था आ भावना जल्दिए बुझे के, कौनो ज्ञानेन्द्रिय के प्रयोग कइले बिना आदमी के बिचार आ भावना बुझे के झमता के विकास होत जाला ।

छठ में डुबत आ उगत सूरुज के ही काहे पूजा कइल जाला ?

बहुत प्रचलित कहावत बा कि लोग उगत सूरुज के ही प्रणाम करेला, बाकिर छठ के एगो बहुत बडका पक्ष ई बा कि ई पवनी में लोग डुबत सूरुज के भी प्रणाम करेला । बैज्ञानिक रुप से सूर्योदय (उगला के एक घण्टा बाद तकले) आ सूर्यास्त (डुबे से एक घण्टा पहिले से ) के समय में ही आदमी सुरक्षित रुप से सौर्य शक्ति प्राप्त कर सकता । सूर्योदय आ सूर्यास्त के समय में अल्ट्राभ्वाइलेट रेडिएसन के लेभल सुरक्षित अवस्था में रहेला आ सुरक्षित, कवनो हानी बिना आदमी सौर्य शक्ति पूर्ण रुप से प्राप्त कर सकेला ।

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