छठ पबनी – नेपाल विशेष

सूर्यदेव के श्रद्धा भक्तिपूर्वक आराधना आ पूजा कर के मनावेवाला छठ पबनी आजू से काठमाण्डु मे भी शुरु हो गइल बा । कातिक शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक मनावेवाला ई पबनी मे ब्रतालु पहिलका दिने स्नान कर के निरइठ रहल गइल । ई दिन से छठ पबनी ना ओराए तक व्रतालु मछरी, मासु, लसुन, कोदो, फापर, मुसुरी, आदि ना खाएके विधि बा । चतुर्थी के कर्म के “अरबाइन भा अरबा” कहल जाला ।

मनोकाङ्क्षा पूरा होखे के विश्वास मे जनानी लोग छठ मे कठोर व्रत करेलन । खास करके तराई मे मनावेवाला मिथिला /भोजपुरी संस्कृति मे आधारित छठ पबनी वि.स. २०४६ के बाद काठमाण्डु लगायत पहाड मे मनावे लागल बा । २०४६ साल से हि सरकार ई पबनी के दिन सार्वजनिक छुटी देवे लागल बा । वि.स. २०६३ के बाद काठमाण्डु के थापाथली, गौरीघाट आ रानीपोखरी मे भी विशेष महत्व के साथ ई पबनी मनावल गइल । एकरा से पहिले से हि बागमती आ विष्णुमती नदी किनार मे छठ मनावे के संस्कृति शुरु भइल रहे । कातिक शुक्ल पञ्चमी के दिन मे निर्जल उपवास रहल जाला । ई दिन सँझिया घर मे खीर बना के चन्द्रमा के अर्पण करके एक छाक खाइल जाला । एकरा के खरना कहल गइल काठमाण्डु मे छठ मनावत आइल निलेन्द्र बर्मा बतवनी ।

“षष्ठी के दिन व्रतालु ठेकुवा, फलफूल, मिठाइ आ रोटी सूर्य एवम् छठी माता के चढावल जाला, रोटी मे सूर्य के रथ के पाङ्ग्रा अङ्कित कइल जाला” उ कहनी । षष्ठी के दिन पक्वान्न, फलफूल आ नरिवल के बाँस के टोकरी मे सजा के उपर से कपडा से तोपल जाला । सँझिया के समय बत्ती बारके माटी के घडा के साथ गीत गावत नदी भा तलाउ के किनार मे जाइल जाला । डुबे लागल सूर्य के अघ्र्य देके प्रणाम कइल जाला । अघ्र्य देहला के बाद तीन बेर पानी मे डुबकी मार के मनोरञ्जन करत उहँवे रात बितावल जाला । सप्तमी के दिन सबेरे उग रहल सूर्य के दर्शन करे खातिर सबेरे ४ बजे से इन्तजार कइल जाला । उग रहल सूर्य के गाई के दूध, फूल आ जल से अघ्र्य देहल जाला । अइसे घाट मे करेवाला पूजा के “भिन्सरीया घाट” कहल जाला । सबेरे घाट मे करेवाला पूजा भइला से भिन्सारवा घाट कहल जाला । सूर्योदयकाल मे अघ्र्य देके सूर्य के दर्शन कइला के बाद छठपूजा ओराला । सूर्य के दर्शन कइला पर भक्तजन लुगा सहित डार तक भर पानी मे डुब के सूर्यदर्शन करेके विधि रहल रमाकान्त यादव बतावेनी । “पृथ्वी मे भइल जीव के सञ्चालन आ संरक्षण जल एवम् सूर्य से भइला से नदी के माता, सूर्य के सभी शक्ति के स्रोत के रुप मे मान के विशेष पूजा कइल जाला” कहके बतवनी । कातिक शुक्लपक्ष मे सूर्य के पूजा कइला से भाखल पुरा होके सोंचल जइसन फल मिलेके शास्त्र मे कइल धर्मशास्त्रविद् एवम् नेपाल पञ्चाङ््ग निर्णायक समिति के अध्यक्ष प्रा डा रामचन्द्र गौतम बतवनी । सूर्य के उपासना करेके आ शुद्धता के प्रतीक भइला से खुद विस २०१२ से ई पबनी मनावे लागल वरिष्ठ पत्रकार एवम् सम्पादक समाज नेपाल के अध्यक्ष देवेन्द्र गौतम बतावेनी ।
सूर्यपूजा आ दर्शन करके बिवाहित जनानी आपन मरद आ आपन मरद आपन जनानी के दीर्घायु एवम् अविवाहित सुयोग्य वरबधु प्राप्ति के कामना करेलन । सन्तान प्राप्ति के कामना से ई पबनी मनावेवाला के सङ्ख्या भी बहुते बा । ई पवनी मे मुस्लिम, बौद्ध आ जैन धर्मावलम्बी के भी सहभागिता रहेके विसं २०६८ से कमलपोखरी मे छठ पूजा के नेतृत्व करत आइल राजेन्द्र सिंह बतावेनी ।

सब से पहिले छठीमाता से सूर्यदेव के खुसी करके ई पबनी मनावे लागल धार्मिक विश्वास बा । महाभारतकाल मे द्रोपदीसहित पाण्डव अज्ञातवास मे रहला पर गुप्तवास सफल होखो कहके सूर्यदेव के आराधना कइले रहलन । पाण्डव विराट राजा के दरबार मे बइठल समय कइल सूर्य पूजा के प्रभाव से अज्ञातवास सफल भइल विश्वास मे ई पबनी मनावल सुरु कइल एगो किवदन्ति रहल बा ।

सूर्य पुराण मे उल्लेख भइल मुताविक सबसे पहिले अत्रिमुनि के पत्नी अनुसूया छठव्रत कइले रहनी । फलस्वरूप उ अटल सौभाग्य आ पतिप्रेम प्राप्त कइनी । उहे समय से “छठ पबनी” मनावे के परम्परा के सुरुवात भइल दोसर किसिम के कहनाम बा ।

advertisement

राउर टिप्पणी

राउर टिप्पणी लिखी
Please enter your name here