छठ महापर्व हमरा के खेत-खरिहान आ नदी से प्रीत करेके सिखावे ला …

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ठ महापरब से हमार जुड़ाव बढ़त जा रहल बा। ई परब हमरा खेत-खरिहान आ नदी से प्रीत करे के सीखावे ला। छठ घाट के सूप-डाला आ केरा के पत्ता हमरा अपना ओरिया खींच लेवेला। नारियल फल के ऊपर सेंदूर आ पिठार के लेप के हम कईयन घंटा तकले निहारत रहेनी। गागर, निमो, सूथनी, डाब निमो आ हरदी, आदि के पौधन जब छठ घाट पर देखेनी त लागेला कि ईहे असली पूजा ह। जहवाँ हमनी प्रकृति के सबसे नीयर होखेनी।

तालाब के आसपास के माहौल पवित्रता के बोध करावेला। हमरा लेल छठ के अर्थ आहिस्ता-आहिस्ता सरद होखत रात आ ओस-ओस पिघलत भोर रहल बा। अब छठ मने सू्र्य आ नवका फसल के आराधना हो गईल बा। एगो अईसन पूजा पद्दति जवना में कवनो भी तरह के आडंबर नईखे। जहवाँ सफाई बाहर के आ मन के भीतर के भी महत्वपूर्ण मानल जाला।

उत्सव के एह महीना में सरदी भी दस्तक दे रहल बा। खेतन के आलू आ मक्का के खातिर तईयार करल जा रहा बा। अईसे में खेतन सब भी उत्सव के मूड में आ चुका बा।

धान के कटाई का बाद खेतन के अगिलका फ़सल के खातिर सजावल जा रहा बा, ठीक वईसही जईसे हमनी दीपावली के साँझ अपना आंगन-दुआर के दीया से सजईली रहनी सन। ई उत्सव हमनी सन के सामूहिकता के पाठ पढ़ावेला। हमनी सन ईहवाँ मिलके उत्सव मनावेनी। एह में कवनो एगो अकेला आदमी कुछ ना करेला बलूकी सबकेहू मिलके करेला।

गाजींदर नाथ झा

 

पोस्ट – गिरिंद्र नाथ झा जी के Facebook पोस्ट से, अनुवादक- रितु राज

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