“दुश्मन”

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“दुश्मन”

अमेरेश यादव

दुश्मन शब्द सुन्ते लोग मे डर समाजाला ।
सब केहु के अन्तर हृदय के तरंग बढजाला ।।
जिन्दगी के हर कदम पर रेगनी के काट विछावेवाला ।
अविस्मरणीय, अनमोल, जीवनरत्न व्यक्ति के “दुश्मन” कहलजाला ।।

हमरा फकर बा कि हमहु दुश्मन अरजले बानी ।
तोहरा मे दुश्मनहित से तनिको कम मेहनत भा समय ना खर्चले बानी ।।
तु ना रहते त दुश्मन हम जिन्दगी के यतना सजे सवरे ना पवती ।
भुखे पियासे ऐ दुनियाके दौर मे दउरे ना पवती ।।

आजु हमरा पृथ्वी पर से चन्द्रमा छुअल आसानी बा ।
इहा तक पहुचे मे हमनी दुनु जने के बराबर परेशानी बा ।।
हमरा केअनुशाशित आ मर्यादित बनावे मे तोहर बहुत लगानी बा।
जीतहार के जंग मे कर्मयोद्धा बनावे मे तोहर भारी कुरवानी बा ।।

धन्यवाद के तरीका आ पुरस्कार के किमत खोजत भटकत जात बानी ।
ऐ “दुश्मन” तोहर गुण-गाण हर कान मे फटकत जात बानी ।।

लेखक – डॉ. अमरेश कुमार यादव

 

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