दू नं प्रदेश के नामाकरण विवाद आ सुझाव (विचार )

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सुभाष कुमार बैठा

देश के सब दिनसे एकात्मकत सत्ता, एकात्मक शासन आ एकात्मक भाषा संस्कृति से अवजियाइल जानता, आपन हज़ारों के क़ुर्बानी का साथे एगो बहुत लम्बा आ बड़का लड़ाई का बाद मे संघीयता प्राप्त कइलक । जेकरा से जनता मे एगो बहुत बड़का उत्साह का साथे आश भी रहे । बाक़िर उ चिज कुछ शासक आ कुछ समुदाय के संकिर्ण एवम् वक्र मानसिक्ता के चलते नेपाली के कहावत “ हाथी आयो, हाथी आयो फुस्स!!!!!” जइसन हो गइल ।

जहाँ जनता के जनमत के लतियावत, क़ुर्बानी आ लड़ाई के वेवास्ता करत ज़बरदस्ती संविधान लादल गइल । जावना के चलते देश अभी अस्त-ब्यस्त बा । सबलोग आपना हक़ अधिकार ख़ातिर आन्दोलित बा ।

एगो त १००% पक्का बा कि ई संविधान के आयू आ ई संघियता के स्वरूप लमहर नइखे । नेपाल के शासक सब जल्दिए आपने-आप में असंतुष्ट होके काटे-मरेवाला बाडन सब । अभीन बस शासक दमी साधले बाडन सँ, काहेकि मधेशियन के उपर के नश्लीय विजय के दम्भ बा, ना त ओहु लोग के ई संविधान आ संरचना नटी लेक पहुँच गइल बा । उ लोग ९० % बहुमत से प्राप्त संविधान मे कोमा, फ़ुल स्टोप ना बदली के गित गावल छोड़ के कमि निकाले लागल बा । आ दोसर तरफ़ देश के बहुसंख्यक लोग आन्दोलन कर रहल बा लोग ।

बेहतर बा कि समग्र लोग के स्विकार कइल गइल आ उहे नाम, उहे पहचान के स्थापित करे खातिर एतना बड़का आन्दोलन के आ शहीदन के सहादत के लाज राखे देवे खातिर भी मधेश नाम ही जायज बा, बाकिर मधेश शब्द पर खाली २ नं प्रदेशे के लोग के हक सिमित नइखे, एकरा खातिर त झापा से कंचनपुर तकले के लोग के योगदान बा, खुन बहल बा ओहिसे एकरा के ‘मध्य मधेश’ कहला से ही सबसे उत्तम होई

अब २ नं प्रदेश के नामाकरण के सन्दर्भ में कहल जाए त कुछ संक्रिण एवम् ध्रुत मान्सिक्ता के लोग अापन-अापन जगह के प्रतिनिधित्व करत खुद से सम्बन्धित भाषा आ नामाकरण के सम्बन्ध मे जोड़दार अवाज उठा रहल बा । जेमे मिथला, जानकी, जनक, मध्य मधेश, मिथिला मधेश, मैथिल-भोजपुरिया प्रदेश आदी नाम सब चर्चा में बा ।

मैथली क्षेत्र के लोग कहेला कि मिथिला पुरान इतिहास बा जबकि उहाँ के हिन्दु धर्म से सम्बन्धित राजा जनक, सिता के आलवा कवनो वैज्ञानिक भा पुरातात्विक प्रमाण नइखे मिलल। बाकिर सिम्रौनगढ़ भा तिरहुत के त पुरान इतिहास भी बा आ आज ऊ पुरा मधेश के जिन्दा धरोहर आ पुरातत्विक प्रमाण का साथे वैज्ञानिक आधार भी बा । यदि केकरो मिथिला के पुरान इतिहास के दम्भ बा त दोसर केहु दावा करे जे मिथिला से पहिले धर्ती के इतिहास बा तब का भाव पड़ी ? ख़ाली राजा जनक, माता सिता, जनकपुर के इमोसन के आगे बाढ़ा के नामाकरण कइल चाहे सोचल दोसर धर्म चाहे जगह के लोगके साथे नाइन्साफ़ी होई ।

देखल जाय एक त हमनी मधेशिया पर पहिले से हि देश के नाम नेपाल आ एगो जात/समुदाय के नाम नेपाली भइला से राष्ट्रियता थोपाइल बा जे पर प्रश्न उठत आ रहल बा । अब २ नं प्रदेश के भी नाम मिथिला, भा मिथिला मधेश भा कवनो एगो भाषा सँस्कृति (जइसे भोजपुरी, मगही) के नाम पर राख दिआव जे अब गैर मैथिली भाषी के आपन राष्ट्रियता प्रमाणित करत करत बितो आ फेन ग़ैर मैथली भाषी लोग के १-२ पुस्ता आन्दोलन करत – करत बितो ।ओइसे त देश में दुसरका दर्जा के नागरिक बडले बानी सब मधेशिया, प्रदेशो में चउथका दर्जा के नागरिक हो जाइल जाँव ?

दोसर सब से प्रमुख बात दशकों से सब २२ जिल्ला के मधेशी एही सब नाम ख़ातिर आन्दोलन करत आरहल बा का ? जे मे ५०० से जादा शहीद आ हज़ारों से जादा अपाहिज भइल बा लोग । ई काहे २२ जिल्ला के मधेश ८ गो जिल्ला मे सिकुड़ल जाता ? ओमे भी नाम आ भाषा खातिर मारामारी होता । एगो त आँख से देखल बात बा कि के तरे देशके शासक हमनी के २२ जिल्ला के मधेश के फोरफार के अलग अलग कइले बा । अगर २२ जिल्ला के पुर्ण मधेश रहइत त निर्विवाद मधेश प्रदेश हि सब से उत्तम नाम रहइत बाक़िर ई तs अधो से कम बा । पूरा मधेश आ मधेशी के सब चिझ जइसे भाषा संस्कृति, रितीरिवाज, रहन-सहन के मध्य नज़र राखत प्रदेश न. २ के नामाकरण कइल ज़रूरी बा ।

बहुभाषिक देश के पहचान से जुड़ल सारा समस्या इहे बा जे देश के नाम नेपाल आ एगो जात समुदाय के भाषा के नाम नेपाली बा, ओहिसे भी हमनी दशको से आवाज उठा रहल बानी कि, कि त देश के नाम बदलो भा कथित नेपाली भाषा के, तबे सबकर पहचान बराबर होई । इहे संन्दर्भ २ नं प्रदेश में भी बा, बहुभाषिक प्रदेश में एगो जात/समुदाय के भाषिक पहचान से यदि प्रदेश के नाम ( एकल भा मिश्रित) रखाइल त फेर त उहे बतिया गैर मैथिली भा भोजपुरी भाषी के उपर लागु होई ।

“आशमान से गिरनी आ खजुर पर अटकनी “ ओहिसे बेहतर बा कि समग्र लोग के स्विकार कइल गइल आ उहे नाम, उहे पहचान के स्थापित करे खातिर एतना बड़का आन्दोलन के आ शहीदन के सहादत के लाज राखे देवे खातिर भी मधेश नाम ही जायज बा, बाकिर मधेश शब्द पर खाली २ नं प्रदेशे के लोग के हक सिमित नइखे, एकरा खातिर त झापा से कंचनपुर तकले के लोग के योगदान बा, खुन बहल बा ओहिसे एकरा के ‘मध्य मधेश’ कहला से ही सबसे उत्तम होई ।

अइसन ना होखो कि ई नाम के विवाद में भाषिक समुदाय के आन्दोलन करे के परो । पुरा मधेश के लोग केतना आन्दोलन के बोझा ढोओ ? कबो मधेश स्थापित करे खातिर, त कबो ………? अब ई ना होखो कि आपने आप के भोजपुरी, मगही, अवधी आदी बोल के मैथिली प्रमाणित करे खातिर भा मिथिला के बिस्थापित करे खातिर फेर आन्दोलन करे के परो । मानतानी सब लोगके अापन भाषा आपना जगह से सम्बन्धित नाम से अगाध प्रेम बा आ रहे के भी चाही बाक़िर आपना स्वार्थ के चलते दोसरा पर थोपल चाहे लादल उपयुक्त नइखे ।

लेखक – सुभाष कुमार बैठा
ठेगाना – बेल्दारी ५ बारा
अभी : अमेरिका (पेनसल्भानिया)

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