पबनी-तेहारः मिथक आ यथार्थ

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नेपाल के पहाड़ी समुदाय में एगो मुहाबरा अति प्रचलित बाः–
आइल दसईं ढोल बजावत ।
गइल दसईं रीन चढ़ावत ।।

गोपाल ठाकुर

एसवो दसईं के मुख्य आकर्षण नवराता आ दसोदुरा ओरा गइल बा । कोजाग्रत पुरनमासी का साथे बाँकी धुमधड़ाका भी शांत हो गईल । एकरा बाद नया अन आ पुरान बस्तर पर गुजारा करेवाला लोग खासकके पहाड़ में खर्चबर्च के हरहिसाब सुरू करी । के केकरा से केतना रीन लेलख आ कइसे तिरी ?

पुस्तोपुस्ता से ई मुहबरो कहाते बा बाँकिर दसईं ढोल बजाके आवते रही आ रीन चढ़ाके जाते रही । आखिर काहे ?
मधेश के बात कइल जाओ त लाखपाँचो के बाद से फगुआ तक कौनो ना कौनो पबनी–तेहार चलते रहेला । लेखाजोखा कइल जाए त अरबो रोपेया के खर्च के साथ साथ एह सब पबनी–तेहार का माध्यम से बेमारिओ अर्जाला । आखिर काहे ?

हरेक पबनी-तेहार में कौनो ना कौनो ईष्ट देव-देवी के विशेष आराधना होला आ सुख-समृद्धि के कामना के साथ होला । त शताब्दियो से जब अइसन होते बा त पुरान अन आ नया बस्तर पेऩेवाला मुट्ठीभर लोग के छोड़के आम लोग अब तक कंगाले काहे रहल बा ? अइसन सवाल के जवाब के खोजी ? ओझा-भक्ता, पंडित-पुरोहित, साध-ब्राह्मण, ब्यास-वाचक लोग कि आम जनमानस के बीच से सामान्य लोग ?

जी, ज्ञान आ अनुभव के हिसाब से त पहिलके समूह के महानुभाव लोग के ई कर्तव्य बनता । त अब तक ऊ लोग काहे ना खोजनी ? ई बहुत कठिन आ मार्मिक सवाल बा । काहे कि ओहू लोग से पुछला पर आपन जजिमान लोग के समृद्धिए खातिर ऊ लोग आपना के समर्पित बतावेलन । त शताब्दियो के ओह लोग के समर्पण के बावजूद आम जनमानस में समृद्धि आइल काहे ना ? एकर कारण बा कि ऊ लोग एह लोक में चाहे जे जइसन होखे, परलोक में समृद्धि के बात करेलन । हँ, जजिमान के परलोक सुधारे के बात होई बाँकिर दान-दच्छिना कम होई त फेर ओह महानुभाव लोग के परलोक से बेसी एही लोक में चिंता सतावे लागी । जी, त एह बात के हमनी जब तक ना बुझेम स, तब तक हमनी के दुर्दशा कम होखे के नइखे ।

सनातनी लोग के बीच में जेतना महत्त्वपूर्ण पबनी-तेहार बा ऊ सावन से फागुन के बीच में पड़ल, सब में महिलन के उपवास के पलहा पहिले पड़ल, निमन पति आ बालबच्चा के चिंता से महिले के मन में पबनी-तेहार के पहिल सरोकार लउकल जइसन विषय पर कुछ त सोचल जरूरी बा । ओकरा साथ साथ सोचल जरूरी बा कि देवी-देवता भा भगवान लोग के गुनगान बड़ा-बड़ा राक्षस के मारला खातिर होला । राक्षस के मारेवाला ओइसन देवी-देवता आ भगवान लोग अपने भक्त भा अपना मातृभूमि खातिर का कइलन, एकर व्याख्या कौनो शास्त्र में ना मिलेला, काहे ?

फेर दैंत्य भा राक्षस लोग के लड़ाई ई शक्तिशाली देवी-देवतन से ही काहे पड़ल ? आम लोग के धारबिगाड़ कइल कौनो शास्त्र में उल्लेख ना मिले । रहल बात खानपान के त आर्य सभ्यता में अश्वमेध यज्ञ, गोमेध यज्ञ, महिषमेध यज्ञ, अजःमेध यज्ञ के नाम पर घोड़ा, गाई, भैंसी, खँसी-बकरी के मांसाहार से नरमेध यज्ञ यानी मानव मांस से यज्ञ करे के परंपरा रहे आ सुरा-सुंदरी में देवराज इंद्र से बेसी पारखी केहू ना रहे अइसन उल्लेख मिलेला । त खाली राक्षसे लोग के मांस-मदिरा के नाम से बदनाम कइल केतना उचित बा ?

महिलन के एह सब पबनी–तेहार खातिर विशेष सरोकार रहल तथ्य से ई साबित होला कि ई सभी पबनी-तेहार पितृसत्तात्मक समाज निर्माण के साथ शुरू भइल बा । एकरा साथे समूचा पबनी में प्रयोग होखेवाला सामग्री अनाज, दलहन, तेलहन स्थानीय कृषि उपज भइला से लोग के कृषि युग में अइला के बादे शुरू भइल बा । खास कके दसईं में जगह अनुसार जौ आ मकई के जयंती (सुइआ) के प्रयोग देखला से इहो अनुमान कइल जा सकेला कि ई पर्व लोग के ई दूनू अनाज के अविष्कार के बाद शुरू भइल बा । बरसात के बाद खर्ह-माटी-लकड़ी से बनल घर के मरम्मत कके निपाई-पोताई का साथ दिया जराके स्वस्थ वातावरण बनावे के हिसाब से जमपंचक यानी दीपावली शुरू भइल बा । ओही तरे समूचा शक्ति के आदि श्रोत सुरुज भइला से सुरुज-पूजा के रूप में छठ शुरू भइल त प्रमाणित हो चुकल बा । ओहीतरे लखराँव-मधान जइसन जग के बात कहल जाए त आर्य-अनार्य मिलन के रूप में शिव-पार्वती विवाहोत्सव मनावे के क्रम में शुरू भइल बा । फगुवा के त बाते मत कहीं, विशुद्ध रूप से रबि बाली यानी दलहन, तेलहन, गहूँ-जौ के उपयोग उत्सव का रूप में एकर शुरूवात मानल जाला ।

बाँकिर एह सब पबनी में दैंत्यन पर देवता के विजय के कौनो ना कौनो प्रसङ जोड़ल आर्य-अनार्य द्वंद्व में आर्य विजय के विभिन्न गाथा भी बनावल गइल बा । जब कि देवता आ दैंत्य का बारे में कहल जाए त सनातनी धर्मशास्त्रन के अनुसार दूनू एके वंश के वंशज बाड़न स । कश्यप ऋषि के मानव के आदि गोत्र मानल जाला । त ओही कश्यप ऋषि के दूगो पत्नी में से दीति के जर से दैंत्य आ अदीति के जर से आदित्य यानी देवता के उत्पत्ति भइल बा । त एके वंश के एगो संतान के वंशज के महिमा मंडन आ दोसरा के वंशज के अवगुण मात्र के बखान कइल केतना उचित होई ?

मानवशास्त्रीय ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर पहिले भारतवर्ष अनार्य लोग के धरती रहे । आर्य लोग बाद में आइल । दूनू में भीषण युद्ध चलल आ एकरा साथ साथ शादी-संबंध आ रक्त सम्मिश्रण भी । एही जातीय द्वंद्व के आर्य पक्षीय सनातनी शास्त्र सब देवता यानी आर्य आ दानव यानी अनार्य के बीच के युद्ध बतावते आइल बा । ई निश्चित बा कि आर्य लोग के बुद्धि तीक्ष्ण रहे, ओहीसुके ऊ लोग षड्यंत्रकारी भी रहे । जहाँ दैंत्यन से सहायता के जरूरत पड़े त दोस्ती आ जहाँ बाँटेपरोसे के जरूरत पड़े उहाँ दुश्मनी कइल ओह लोग के चरित्र रहे । उहे लोग आम श्रमजीवी के मूर्ख बनावे खातिर भाग्य, भगवान, स्वर्ग, नरक के परिकल्पना कइलख ।

बाँकिर दैंत्य लोग आत्महत्या नइखे कइले, बल्कि आत्महत्या त भगवाने कहावेवाला लोग कइले बा । मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम आत्महत्या कइलन । आदर्श नारी के उपमा पावेवाली उनकर पत्नी सीता उनकर अत्याचार सहन ना कके उनका से पहिलही आत्महत्या कइली । भगवान श्रीकृष्ण के देखते-देखते ५६ करोड़ जदुवंशी लोग अपने में अपने लड़के मर गइलन । कृष्ण खुद एगो मलाह के वाण के घाव से बितलन ।

तनिका निमन से विचार करीं । आर्य साम्राज्य कायम करे के उद्देश्य से रामायण के रचना भइल बा । कुछ हद तक वर्गीय द्वंद्व बाँकिर सार में अनुवांशिक औपचारिकता के स्थापित करे खातिर अनेको कुकर्म पर पर्दा डालत महाभारत के रचना भइल बा । त आज के साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद विरोधी युग में सामंती आर्य साम्राज्य के स्थापत्व के रामायण के बहाने मुक्त कंठ से गुनगान कइल केतना उचित बा ?

ओही से करिआ वर्ण, गँठीला शरीर, घुर्मल केश, मुँह से बाहर आइल दाँत, उँचा कद के सब के अगर हमनी राक्षसे देखेम, जबकि आज ना कौनो भाषा ना कौनो रक्त शुद्ध रह गइल बा, त केतना उचित होई ? ओही से दशैं सहित हमनी के जीवन में आवेवाला आउर पबनी-तेहार के सामाजिक सद्भाव, पारिवारिक प्रेम आ समग्र में बसुधैव कुटुम्बकम् यानी संसारे परिवार बा कहल मानवीय भाइचारा बढ़ावे के उद्देश्य से निरंतरता देहल उचित होई । आ एकरा खातिर शादगी के साथ पबनी-तेहार मनावल ठीक रही ताकि ना कौनो पर्व ढोल बजाके आवे ना रीन चढ़ाके जाए ।

लेखक के हाल के पता – ओमकारेश्वर बस्ती, वाणस्थली, चंद्रागिरि-७, काठमाड़ो ।

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