भोजपुरिया संकृति : बजड़ी विशेष – सरापे के,मुआवे के, जियावे के आ बजड़ी खिया के भाई के बज़्जड बनावे के

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भोजपुरी संस्कृति एगो समृद्ध संस्कृति हऽ । भोजपुरिया लोग जहाँ जहाँ बइठल बा आपन संस्कृति के जोगा के रखले बा । ऊ लोकगीत होय भा संस्कार लोकगीत होय, हर चीज भोजपुरिया महासागर में अँटाइल बा । जन्म से लेके मरन तक लोकगीत भोजपुरिया समाज के विशेषता हऽ।

दुनिया के अन्य संस्कृति से दुर्लभ बात हमनी के संस्कृति में विराजमान बा । अन्य समुदाय में भी भाई बहिन के सात्विक प्रेम भावना व्यक्त करेके पर्व त्यौहार मिल जाई । माने भोजपुरी संस्कृति में जवन संस्कार जीवित बा ऊ कही नइखे दाबी के साथ कहल जा सकता ।

लेखक – राम प्रसाद साह

सरापे के आ बजड़ी खियावे के पर्व त्यौहार बहिन भाई के निच्छल प्रेम के प्रतीक के रूप में बा । जवन आश्चर्यजनक भी बा । सूर्योदय लालिमा से पूर्व पुरूब मूँहे खड़ा होके लोक गायन शुरू होला । भाई के सरापे के अर्थात् भउजाई के राँड़ बनावेके गीत होला । मरल भाई के जियावे के प्रक्रिया में लोकगीत के उठान होला ।

अइसे स्त्री जाति का पाले एतना शक्ति बा कि केहू के मुआके जिन्दा कर सकेली। ई लोग अद्भूत आ शक्तिशाली देवी शक्ति हई प्रमाणित होला । वास्तव में ई त्यौहार अजरता अमरता के नवीकरण ह जे हर साल बहिनलोग भाई के मुआवेली आ फेरू जिया देवेली । भउजाई के माथ मे सिन्दूर लगावली आ गले मिलेली । भउजाई निहाल होजाली । अटल सौभाग्य हो जाला । आपसी प्रेम सद्भाव प्रगाढ हो जाला ।

भाई के बजड़ी ( केराव) खिया के भाई के बजड़ी जइसन बजड़ अजर अमर होवे शुभ- कामना के साथ हर्षोल्लास के माहौल हो जाला । एवम् रीत से बहीनलोग के मनोभावना के भाई लोग कदर भी करेला । ईहे बजड़ी खियावे के भैया-दूज भा भाई दूज कहल जाला । भैया-दूज के पहाड़ी समुदाय ‘भाई टीका’ के नाम से मानवे के परम्परा रहल बा ।

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