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भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता के सवाल

भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता के सवाल 

आनन्द कुमार गुप्ता

विश्वभाषा भोजपुरी आज संसार में १३ करोड़ लोग के भाषा बा । भारत, नेपाल, मॉरीशस, फिजी, सुरिनाम, गोयना, टुबैगो, दक्षिण अफ्रिका, अष्ट्रेलिया, म्यान्मार, बंगलादेश, पाकिस्तान, अरब, अमेरिका आ यूरोप के कैयन देशन में भोजपुरिया लोग के बसोबास बा । हँ, एकर उद्गम के रूप में भारत आ नेपाले बा। एकरा बाद राज्य संचालन के हिसाब से मॉरीशस में भोजपुरिए लोग के शासन बा । फिजी में भी एक बेर महेंद्र चौधरी के सरकार बनल रहे बाकिर ओतहाँ के आदिवासियन के विरोध का सामने टिके ना सकल । एकरा बादो संवैधानिक रूप से मान्यता के जहाँ तक सवाल बा, ऊ अभी तक एकरा नेपाले में नसीब भइल बा । हँ, बेहवार में नेपाले में ई सर्वाधिक उपेक्षा के शिकार बा ।

जहाँ तक शिक्षा के सवाल बा, नेपाल में प्राथमिक आ माध्यमिक स्तर पर एकर पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक आ सहायक सामग्री सहित अनौपचारिक शिक्षा में भी आपन पहुँच बना चुकल बा । भारत में उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद् आ विश्वविद्यालयन में ई स्थापित हो चुकल बा । मॉरीशस में शिक्षा मंत्रालय के तहत भोजपुरी के एगो विशेष निकाय के जरिए ही पाठ्यक्रम में सामिल करेके काम हो रहल बा । संचार माध्यम में नेपाल, भारत आ मॉरीशस में भोजपुरी सामिल बा । बाकिर नेपाल के अलावा एकरा अभी तक संवैधानिक मान्यता नइखे मिल पावल । हँ, अमेरिका में स्थानीय स्तर पर भोजपुरी में बनल कागजात के मान्यता मिलल बात अभीओतहाँ के भोजपुरियन के लेख-रचना के माध्यम से जानकारी में आ रहल बा । नेपाल के अंतरिम संविधान के धारा ५ में नेपाल के समूचा भाषा के राष्ट्रभाषा के मान्यता बा आ स्थानीय स्तर पर ओह सब में सरकारी कामकाज के वैध भी मानल गइल बा । भारत में संविधान के आठवाँ अनुसूची में सामिल भाषा के संवैधानिक मान्यता देहल मानल जाला । अभी एकरा खातिर ओतहाँ जोर-सोर से आंदोलन जारी बा । एतने ना, महाभोजपुर प्रांत निर्माण के बात भी उठ रहल बा । बाकिर एने फेसबुक संजाल आदि-इत्यादि के माध्यम से कुछ मित्र लोग के बात आ रहल बा कि संवैधानिक मान्यता खातिर हो रहल संघर्ष बेकार बा । कारण बतावल जाला नेपाल में बरकरार रहल एकर संवैधानिक मान्यता आ उपेक्षा दूनू के बेमेल अवस्था ।

एक तरफ से सोचला पर बात ठीके बुझाला । संविधान में लिखिए देहला से का होई ? अगर बेहवार में नइखे त झूठमूठ के संवैधानिक-कानूनी मान्यता खातिर लड़ल जरूरी नइखे, एह तर्क में भी दम बा । वास्तविक बात भी बा नेपाल के संदर्भ में । संवैधानिक भाषा भइला का बादो आज तक कवनो गाँव विकास समिति, नगरपालिका भा जिला विकास समिति में भोजपुरी में निवेदन लिखल देखल भा सुनल नइखे गइल । भोजपुरी में कौनो औपचारिक कागजात बनावल नइखे जात । एतने ना, सरकारी प्रायोजन में प्राथमिक आ माध्यमिक तह में एकर पाठ्यक्रम आ पाठ्यपुस्तक त बन गइल बाकिर कहीं पढ़ाई नइखे होत । मूल बात बा कि राज्य एह भाषा के विषय शिक्षक अभी तक कहीं नइखे रखले । संचार माध्यम के क्षेत्र में रेडियो नेपाल आ गोरखापत्र में नाम मात्र के जनशक्ति आ काम दिआइल बा एह भाषा खातिर । नेपाल टेलिभिजन में त अब तक समाचार सुरू भी नइखे भइल । त सवाल उठता, एकर संवैधानिक मान्यता मिलले आ नामिलले का ? एही सवाल का सङे दोसरो सवाल उठ सकता, का अब तक कौनो नेपालीय भोजपुरिया कहीं कवनो स्थानीय निकाय में भोजपुरी में निवेदन देवे के साहस कइले बा ? कौनो भोजपुरिया गाँव विकास समिति के सचिव भा नगरपालिका के कार्यकारी अधिकृत का लगे केहू भोजपुरी में निवेदन लेके गइल बा ? भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति आदि पर काम करेवाला संघ-संस्था का ओर से भी कौनो स्थानीय निकाय में भोजपुरी में पत्राचार भइल बा ? जिला स्तर के न्यायिक भा अर्धन्यायिक संदर्भ में केहू भोजपुरिए में आपन बात लिखवावेके कोशिस कइले बा ? आउर ना त साटा लिखेके काम भी केहू अब तक भोजपुरी में कइले बा ? भोजपुरी विषय पढ़ावेवाला शिक्षक के मांग कके आज तक संगठित रूप में भोजपुरियन का तरफ से कौनो आंदोलन उठल बा ? अगर ई समूचा सवाल के जवाब अब तक हमनी का लगे नकारात्मक बा त एकर दोष केकर ? अधिकार के सदुपयोग केहू ना करी त ओकरा खातिर दोषी के होई ? निश्चित रूप से अधिकार का साथे कर्तव्य भी रहेला । एकरा साथे इहो बात बुझेके पड़ी कि कर्तव्य पर ही अधिकार टिकल रहेला । कर्तव्य के अभाव में अधिकार के कौनो अर्थ नइखे । बाकिर जहाँ अधिकार नइखे ओतहाँ कर्तव्य कइला पर दंडित भी होखेके पड़ी । दूर जाएके अवस्था नइखे । २०२९ साल में रानी के जन्मोत्सव पर भोजपुरी में स्मारिका निकललें पंडित दीपनारायण मिश्रजी । एकरा खातिर उनका के तत्कालीन अंचलाधीश गारी-फजिहत त देबे कइलन, दिनभर अपना कार्यकक्ष में बंदी बनाके भी रखले रहस । उनकर कहनाम रहे— ‘राजारानी के गुणगान त ठीक रहे बाकिर भोजपुरी में काहे ?’ का आज कौनो सरकारी अधिकारियन के नेपाल में अइसन करेके मजाल बा ? निश्चित रूप से केहू ना कर सकेला । एकरा साथे साथ नेपाल के हर जनगणना में भोजपुरी भाषा के उल्लेख बा । नेपाल के केंद्रीय तथ्यांक विभाग में भोजपुरी भाषा के मातृभाषा भा संपर्कभाषा के रूप में बोलेवाला का बारे में केहू जाके आधिकारिक जानकारी माङ सकता । एह से कि अब ई एतहाँ के संवैधानिक भाषा बन चुकल बा । ठीक एकरा विपरीत भारत के भले ई दोसरका भाषा काहे ना होखे, आज तक ओतहाँ के कौनो जनगणना में एकर उल्लेख नइखे । ओही तरे ओतहाँ के कौनो कार्यालय में भोजपुरी में निवेदन नइखे देहल जा सकत । भोजपुरी में साटा तक भी केहू नइखे लिखवा सकत । अगर लिखवइबो करी त ऊ मान्य ना होई । एकरा साथे साथ भारत के कागजी मुद्रा पर ओतहाँ के समूचे संवैधानिक भाषा में ओकर मूल्य यानी ऊ पाँच, दस, बीस, सौ केतना के नोट बा लिखल रहेला । का संवैधानिक मान्यता बिना मिलले भोजपुरी के ऊ सौभाग्य मिल सकता ? ओही से बेहवार में उतारल भा उतरवावल ओतना कठिन नइखे जेतना कौनो विषय के संवैधानिक अधिकार में सामिल करावल । एह मामला में भले भोजपुरी नेपाल में बेहवार में उपेक्षित बा, बाकिर संवैधानिक आ कानूनी हिसाब से अब त विश्व में नेपाल ही बा जहाँ के ई संवैधानिक भाषा बा । त अपना अगर चले के ढङ नइखे त कम से कम दोसरा के चलाई पर टिका-टिप्पणी ना कइल बेहतर रही । हमनी के समाज में एगो बहुत प्रचलित कहावत बाः केकरा पर करीं सिङार पिआ मोरा आन्हर ? त हमनी अपना करते अन्हरकूप में बइठल बानी । एह से जरूरत बा जहाँ संवैधानिक मान्यता मिलल ओतहाँ ओकरा के बेहवार में उतरवावेके आ जहाँ नइखे मिलल ओतहाँ एकरा खातिर संघर्ष करेके आ चल रहल संघर्ष के कम से कम नैतिक समर्थनो करेके । एही से भारतीय भोजपुरियन के आपन मातृभाषा के ओतहाँ के संविधान के आठवाँ अनुसूची में सामिल करावे के संघर्ष में नेपालीय भोजपुरियन का ओर से हम पूरा-पूरा नैतिक समर्थन देतानी आ आउर भोजपुरियन से भी समर्थन देवेके हार्दिक आग्रह करतानी ।

श्रोत : भोजपुरी टाइम्स दैनिक, सावन १०, २०७२ में प्रकाशित ।

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