भोजपुरी भाषा हमार माई ह, लजाई काहे ?

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भोजपुरी भाषा हमार माई ह, लजाई काहे ?

ईसन कि आदत बा, मेट्रो मे चढ़ते हम गेटके लगे कोना मे खड़ा हो गईनी । अबही कुछ देर ही भईल रहे खड़ा भईले कि बहुत धिरे से एगो आवाज कान मे पड़ल,‘नायका दवईया से बाबूजी के आराम बा नु ?’ मुड़ के देखनी त हमरा ठीक पीछे बईठल एगो भाई कान से फोन सटा के एकदम धिरे-धिरे शायद अपना गांवे बतिआवत रहलन । 

बातचीत के टोन अउरी उनकर सूट-बूट आ टाई वाला पोशाक बतावत रहे कि भाई कवनो बढिया कम्पनी मे कवनो बढिया पोस्ट पर काम करे लन । बातचित के जेतना अंश हम सुन पवनी ओसे त इहे लागल कि उ अपना बाबूजी के तबियत के बारे मे बात करत रहलन बाकी आवाज के धिमापन ई साबित करि रहे कि उ ना चाहत रहलन कि लोग उनका भोजपुरिया पहचान के जानो । हमरा ई बात तनि खराब लागल काहे कि अब जबकि बहुत लोग आगे बढ़ के भोजपुरी के एकर असली सम्मान दिलावे के लड़ाई लड़ रहल बा, ए समय अगर अइसन बुद्धिजीवी भोजपुरिया लोग ही अपना मातृभाषा के साथ उपेक्षा के भाव राखी त फेर दिल्ली जईसन शहर मे लोग भोजपुरिया लोगन के ‘अजीब नजर’ से ही देखत रही ।

हम सोचनी ई मुद्दा पर ओ भाई से कुछ बात करी । लेकिन फेर सोचनी कि कहीं उनका खराब ना लाग जाए । एही से एगो दोसर रास्ता अपनवनी । उनका के देखावे ला कि भोजपुरिया माई के बेटन मे अइसन लोग भी बा जे अपना ब्यक्तित्व विकास के साथे-साथे अपना मातृभाषा के विरासत से भी जुड़ल बा। ओही बेरा हम अपना अघरे फोन लगा देहनी आ एतना आवाज मे कि वो भाई के सुनात रहो बतिआवे लगानी । आस-पास के लोग भीसुनत रहे, ताकत रहे बाकी लोग का कही एकरा कारण अपना मातृभाषा के साथे अन्याय नईखे नु कईल जा सकत ।

हमरा फोन पर भोजपुरी मे बात करे के क्रम मे उ भाई बहुत बेर हमरा तरफ देखलन । उ जब देखस हम तनी हंसमुख चेहरा बना ली । ई सब मे ही हमार गन्तब्य ‘जीटीबी नगर मेट्रो स्टेशन आ गईल । हम फेर बिना उनका तरफ देखले उतर गईनी मेट्रो से । मेट्रो स्टेशन से निकले ला जब हम मशीन पर कार्डसटावत रहनी तले हमरा पीछे से एगो आवाज आईल,‘तनी जल्दी करअ भाई’ पीछे मुड़ के देखनी त उहे भाई रहलन ।

हमरा चेहरा पर त आश्चर्य के लकीर खिंच गईल । जब उ भाई कार्ड सटा के निकललन त हमही पूछनी कि ‘भैया अपने के घर कहाँ पड़ी’, ‘सिवान’ उ बतवलन । बिना देर कईले हम अपना मुद्दा पर आ गईनी, ‘रउरा एही से नु धीरे -धीरे भोजपुरी मे बतिआवत रनी ह ताकि लोग ना सुने ?’ उ कहलन, ‘ए भाई जब तू पहिलके वाक्य बोलल ह फोन पर, गोड़ लाग तानी दीदी, त देखलअ ह केतना लोग के अचानक से मुड़ी उठ गईल ह, लोग अब भी भोजपुरी के हेय दृष्टि से देखे ला ।’उनकर ई जवाब सुनके हम कहनी,‘अईसन भी हो सकता कि उ मुड़ी उठावे वाला लोगन मे  बहुत लोग भोजपुरी बोले वाला होखे आ ओमे से बहुत लोग के आज हिम्मत मिल गईल होखे कि उ लोग भी मेट्रो मे भोजपुरी मे  बतिया सकेला । अबही एतने बात भईल रहे कि उनकर फोन बाजल आ उ ‘ठीक बा बाय, अच्छा लागल तोहार भोजपुरी भक्ति’ कह के चल देहलन ।

हम सोचनी, ‘भोजपुरी भाषा हमार माई ह, लजाई काहे ?

साभार –  आखर पत्रिका
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