भोजपुरी भाषी क्षेत्र में प्रारम्भिक शिक्षा

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उमाशंकर द्विवेदी ‘दधीचि’

मरा लइकाइ में गाँवन में शिक्षा प्राप्त करे के खातिर कवनो नियमित आ औपचारिक व्यवस्था उपलब्ध ना रहे , ना कवनो पाठशाला, ना कवनो शिक्षक, नाही कवनो अवसर प्राप्त रहे । परिवार के नियोजन के एहतियातन ना कवनो सामग्री आ नाही कवनो उपाय उपस्थित रहला के बावजूद सब गृहस्थ के परिवार प्रायः नियोजित हीं रहे । परिवार में सिमित संख्या के अनुसार हीं बाल–बच्चा जन्म पावसन । अगर अनियोजित संख्या के प्रारब्ध लउके त शितला माइ, हैजा आ प्लेग आऽके ओकर नियन्त्रण स्वयं कऽदेवे ।

लइकासन के पाँच वर्ष तक भइला के बाद वर्तमान के अवस्था लेखां गृहस्थलोग के अपना बाल–बच्चासन के शिक्षा के चिन्ता करे के जरूरत ना परे । कहाउत बाटे जे बच्चा के पहिलका पाठशाला घर हीं हउए आ मातारी पहिलका शिक्षक । इ अवस्था ओह घरी भी रहे । घर में शिक्षिका निसन्देह मातारीलोग होखे आ ओह घर रूपी पाठशाला के प्रधानाध्यापक होखेलोग बच्चा के पिता । मातारी लइका के प्यार, दुलार से व्यवहारिक पाठ पढ़ावे आ बपसि कठोर दण्ड से । उदाहरण के रूप में अगर बच्चा अपना साथी के साथ खेल खेल में मार पिट कऽलेवे आ ओकर मातारी बच्चा के घर में आऽके ओह बच्चा के गार्जियन से एह बात के हाथ नचा नचा के तथा अभिसारिक इशारा कऽकऽके ओरहन दे देवे त ओही ‘टुरमुकाम पर’ अस्थाइ अदालत के सुनवाइ हो जाए । अगर ‘एक्युज’ ‘सेटिस्फेक्टरी’ जवाब दे देवे त तुरन्त माफी अगर ना त बाँस के छर्की ओकरा चूतर पर तत्काल बजरे लागे आ ओकरा जीवन भर खातिर ई पाठ इयाद हो जाए–‘बिना वजह कवनो लइका से मार–पीट ना करे के चाहीं ।’ इ पढ़ाइ सैद्धान्तिक बिना पूर्ण व्यवहारिक भी होखे जवन ओह लइका के जीवन भर इयाद रहे काहे कि सैद्धान्तिक बात कब इयाद परी आ कब भोर हो जाइ निश्चित ना होला माने व्यवहारिक ज्ञान त कबही भोर ना परेला ।

एही तरे दैनिन्दन जीवन के कइएक शिक्षा प्रकृति द्वारा अपने प्राप्त हो जाए । उदाहरण के स्वरूप डम्हा–डम्हा आ घूलल रूनी देख के जवन लइका बिर्नी के खोंतावाला गाछ पर चढ़े के घृष्टता करे ओकरा के क्रुद्ध बिर्नी सेना आँख, नाक, कान आ सम्पूर्ण चेहरा पर बिन्ह के थबाक बना देवे–पाठ मिल जाए जे बिर्नी के खोंता में हाथ ना डाले के चाहीं । अन्हरिया में अपना सुर में रस्ता चलत गइला पर ठेस लाग के जब लइका गीर के अपन भूभून फोर के चान के ओर थूक फेके लागे त सारा थूक ओकरे चेहरा पर गीर के थक बक कऽदेवे । एसे पाठ मिले जे–चान ओर मुंह कऽके उपर ना थूके के चाहीं । झोपा में फरल करियाइल जामुन देख के जब लइका के जीभ में से लार चूवे लागे आ जब ओकरा के प्राप्त करे के खातिर ओह गाछ पर चढࡊ के के उ झोंप्पा तूरे के चेष्टा करे त ओकर भार उ पतरडढ़ जामुन के डाढ़ वहन ना करे सके आ टहङी टुट के ओह लइका साथे जमीन पर गीर जाए आ ओकर हाथ, गोड़ भा छाती के बाती छटक जाए आ अस्पताल में भर्ना होखे के परे त पाठ मिले– गाछ के पतरडढ़ पर ना चढ़े के चाहीं । इ अइसनका व्यवहारिक ज्ञान रहे जे एकर भुक्तभोगी उ लइका अपना जीवन भर में दोबारा फेर से कबहीं प्रयत्न ना करे सके । इ सब बात भोजपुरी समाज में मुहावरा, कहाउत के रूप में अद्यापि मौजूद बाड़नसन जइसे ‘भेडि़या धसान’, ।

अइसन बात ना जे लइका खाली व्यवहारिक ज्ञान करसन, कुछ सैद्धान्तिक शिक्षा प्राप्त कऽलसन । जइसे भाषा के सैद्धान्तिक व्याकरण, जइसे संज्ञा, सर्वनाम, वचन, लिङ्ग, पुरूष आदि के ज्ञान । सबकर नाम संज्ञा हउए, संज्ञा के बदले सर्वनाम के प्रयोग होला, संज्ञा आ सर्वनाम दुनु के कर्म प्राप्ति अनुसार क्रिया करे के परेला, इ बात लइकासन के लइकाइए में थाह चल जाए । क्रिया दू किसिम के होखेला–सकर्मक आ अकर्मक क्रिया । क्रिया के फल जवना से मिलेला ओकरा के कर्म कहल जाला । कुछ प्राप्त करे के उदेश्य से कइल जांव त सकर्मक क्रिया, सकर्मक क्रिया के फल सदैव मीठा होखेला । अकर्मक त्रिया के फल तनका दुःखदायी होखेला जइसे अकर्मक क्रिया के कर्म के रूप में प्राप्त भइल चूतर पर लागल छरका के दोदरा ! गाल पर उगल बाप के हाथ के पञ्जा के छाप !

वचन के ज्ञान लइकाइ में संख्यात्मक रूप में प्राप्त हो जाला व्यवहारिक रूप में गुल्ली–टाँड़ खेलत में । घुर्ची में से मारल गुल्ली के टाँड़ से नापत दुरी–एड़ी, दोड़ी, तिडि़या, चनवा, साबड़, सितो, जितो….। एही से हमरा लडि़काइ में बच्चालोग के प्रायः बीस से अगाड़ी के संख्या थाह ना होखे सके । कवनो चिझ गने के होखे त एक बीस, दु बीस, तीन बीस…आदि कऽके गनल जाए(हम पाठकलोग के कान में कहे के चाहतानी–बीस से अगाड़ी के गिन्ती हमरा बुढि़यो के अभिनो ना आवेला माने ओही ज्ञान के आधार पर हमरा के अपना अङुरी पर जे तरे नचावेली ओकर गवाही भगवाने दिहन) ।

घसवाही, बकरीहारी, गायवारी भा भइंसवारी में अध्ययन करत करत लइका लइकीलोग भूलत भटकत पाठशाला में अगर पहुच जाए त माड़्साहेबलोग गन्ती करावे–एकाइ, दहाइ, सयकड़ा, हजार, ..लाख..करोड़.., अर्ब.., खर्ब.., नील.., पदुम.., शङख.., महाश«ङख.. आ ओकरा बाद माड़्साहेबलोग कहेला अनन्त… ! अननन्त माने ? जवना के अन्ते नइखे । अनन्त केतना होइ ? पार पावल सम्भव नइखे । तब उल्टा दहलावल जांव..दहलावते दहलावते फेर पहुंच जाइल जाइ सयकड़ा, दहाइ आ एकाइ तक । फेर उहे अनन्त । तब एतना फेर में काहे परल जांव ? एही से पूर्वीय संस्कृत के विद्वानलोग वचन के तीन गो विभाग कइलख–एक वचन, द्विवचन आ बहु वचन । एक वचन माने एक, द्विवचन माने मर्द आ अपन मेहरारू(दु) तथा बहुबचन माने अवर जन साधारणलोग(दु से ज्यादा) । इ त कहल जांव–बलिहारी पछिमाहा विद्वानलोग के जे लोग व्याकरण के किताब में केवल दुइएगो वचन गढ़ कऽके ठोक देहलख–एक वचन आ बहु वचन । माने ओहू विद्वानलोग के का कहल जांव ? एगो वचन त अउरी बढ़ले बाटे जवना के इश्वरिय अस्तित्व कह सकल जा सकेला !

अब रहल लिङ्ग के विवेचन आ ज्ञान प्राप्ति के बात ? चोर लुकउवल भा आँख मुनन्ता खेलत में शरीर के स्पर्श कऽके ओकरा भूगोल अनुसार लिङ्ग के भी थाह चल जाए । छोट केश, सपाट छाती, पातिर डांड़, लामा जाङह, पम्ह भिनत ओठ, लामा खुरदुरा गाल महशूस होखे त उ प्राणी पुलिङ्ग, लामा आ महकत चिकन केशराशी, छाती पर टिकोड़ा रूप में उभरत पिण्ड, श्वेत आ गमकत दन्तपंक्ति, थरथरात ललहुं ओठ, कदली थम्ह लेखां जाङह आ स्थूल कटिप्रदेश महशूस होखे त उ स्त्रीलिङ्ग आ एह दुनू के मिलल–जूलल शारीरिक बनावटवाला प्राणी महशूस होखे त उ उभयलिङ्गी माने मउगा । हम त तीन चार कक्षा में एगो अउरी लिङ्ग पढ़ले रहनी– निर्जीव लिङ्ग । सुनिने जे जवना पदार्थ के स्पर्श में इ कवनो लक्षण ना लउकेला ओकरा के निर्जीव लिङ्ग कहल जाला, जइसे–डेस्क, बेन्च आ कुर्सी इत्यादि ।

पुरूष के बात कइल जांव त अवर भाषा में कुछो होखो, माने हमनी के भोजपुरी में त तीनेगो पुरूष होखेला–प्रथम पुरूष माने जे बात करत होखे, उ उत्तम पुरूष, जेकरा से बात कइल जाला उ मध्यम पुरूष, जेकरा बारे में बात कइल जाए उ अधम पुरूष । अङग्रजी भाषा में ँष्चकत, द्दलम, तजष्चम उभचकयल होखेला । ओहलोग के एतना उन्नति होखे के सम्भवतः इहे कारण हो सकता । ओहलोग मे सभे बराबरी के स्थान पावेला आ हमनी के भोजपुरी भाषी क्षेत्र में प्रारम्भिक शिक्षा के निष्कर्ष में हमनी के इहे प्राप्त होखेला– मे सुनरा, तूं सुन्नरी, अवरलोग बनरा–बनरी ! ( लेखक के शिघ्र प्रकाश्य ‘चोखा–चटनी’ हास्य–व्यङ््य संग्रह में से)।

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