भोजपुरी में नाता आ संबोधन – गोपाल ठाकुर

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भोजपुरी में नाता आ संबोधन – गोपाल ठाकुर

जेठ, १० शनिचर ।

नाता आ संबोधन के शब्द भाषा के समृद्धि आ लालित्य दूनू दर्शावेला । ई समृद्धि आ लालित्य प्राकृतिक ह, कुछिओ के सहारा भा वइसाखी पर टिकल कृत्रिम ना । ई बात हम एह से कहनी ह कि आज के विश्वभाषा कहावेवाला अङ्रेजी में अगर सब से बेसी दरिद्रता बा त एही नाता आ संबोधन के शब्द सूची में । अङ्रेजी में हाड़नाता भा रक्त संबंध कही, ओह से दूर के लोगन खातिर सब से आसान तरीका बा नाँव धके बोलावल । भोजपुरी में ओइसन कइल उद्दंडता होला । बाँकिर कइल जाई का ? जे जीतल उहे सिकंदर ! दुनिया पर राज त अङ्रेजे लोग कइलन सब से अधिक । एकर परिणाम ई बा कि अङ्रेजी में दुनिया के समूचे भाषा में से कौनो ना कौनो शब्द अङ्रेजिआ गइल बा । बाँकिर नाता आ संबोधन के क्षेत्र में अङ्रेजी पर आज तक कौनो दोसरा भाषा के प्रभाव नइखे देखल गइल । जी, ठीक एकरा उल्टा अङ्रेजी के प्रभाव में दुनिया के बाँकी भाषा सब, जे ओकरा संपर्क में आइल, नाता आ संबोधन के क्षेत्र में दिनानुदिन आऩर होके पड़ रहल बा । एकरा बादो उहे अङ्रेज सब से पहिले भोजपुरी में नाता के शब्दन के सूची तइआर करेवाला में अब तक के हमार अध्ययन में मिलल बा ।

जी, जॉन बीम्स के लिखल सन १८६८ में प्रकाशित भोजपुरी भाषा पर एगो व्याकरणिक लेख के अंत में भोजपुरी में नाता के कुछ शब्दन के संकलन लउकेला । अनेक तिरस्कार, अपहेलना, छीः-छीः दूर-दूर से गुजरला के बावजूद अब भोजपुरी के शब्दकोश भी कइअन जगह से प्रकाशित हो चुकल बा । हमरे संयोजन में रहल संपादक मंडल के तइआर कइल भोजपुरी-भोजपुरी-नेपाली-अङ्रेजी शब्दकोश नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठान भी दू बरीस पहिलही प्रकाशित कर चुकल बा । चौबीस हजार से ऊपर प्रविष्टी रहल एह शब्दकोश में नाता आ संबोधन के शब्दन के भी देखल जा सकेला । बाँकिर अब तक एही क्षेत्र में गहिराई से देखल गइल कौनो काम अभीन हमरा नजर पर नइखे आइल । हो सकता कुछ भइल होखे, निमने भइल होखे, बाँकिर हमरा नजर से ओझल होखे । ओही से अगर नइखे भइल भा होके ओझल रहल दूनू अवस्था में भोजपुरी के समृद्धि के एगो छोट प्रदर्शन का रूप में ई आलेख के बुझे के हमार निहोरा बा । आउर भाषा के अध्ययन से थाह लागी, बाँकिर भोजपुरी में नाता के शब्दन में से अधिकाधिक से संबोधन ना कइल जाला ।

संबोधन खातिर प्रायः अलग शब्द के प्रयोग कइल जाला । सृष्टि के शुरूआत होला दंपत्ती से । भोजपुरी में दंपत्ती खातिर मरद-मेहरारू, मर्दाना-जनाना, पति-पत्नी , श्रीमान-श्रीमती, मालिक-मलिकाइन, जोए-पोए, घरवाली-घरवाला, तिरिआ-पुरुष जइसन आदर्श शब्द बाड़े सन । एकरा साथ साथ पति के पर्याय के रूप में भतार के प्रयोग होला त पत्नी के पर्याय के रूप में घरनी, मेहरी, मेहारू जइसन शब्द बाड़े सन । एही तरे दंपत्ती के बीच संबोधन के बात कइल जाए त एक-दोसरा के नाँव धके बोलावल भोजपुरी परंपरा नइखे । बोलावे खातिर पत्नीी के सब से उपयुक्त शब्द बा मल्किनी भा मलिकाइन, एकरा अलावा दुलार-प्यार से रानी, प्यारी, प्राण प्यारी, डिअर, जान, डार्लिङ आदि शब्दन के प्रयोग हो रहल बा । एहीतरे पति के संबोधन खातिर आदर्श शब्द के रूप में मलिकार शब्द ह । एकरा अलावा दुलार-प्यार से राजा, डिअर, जान, डार्लिङ के प्रयोग हो रहल बा । एकरा साथे-साथ हिंदी, नेपाली आ मूलतः अङ्रेजी के प्रभाव से अब दंपति के बीच में एक-दोसरा के नाँव धके बोलावे के प्रचलन भी आउर शब्दन के जोर-शोर से विस्थापित कर रहल बा ।

अपने पुश्ता के बीच में आपन घर-परिवार से ससुरार तक प्रयोग होखेवाला नाता के शब्दन में भाई, बहिन, भाभे, भउजाई, भइँसुर, देवर, ननद, देआदिन भा गोतिन, सार, सारी, सारिन, सरहोज, बहनोई, ननदोसी भा ननदोई अब तक प्रचलन में बा । संबोधन खातिर जेठ भाई के भइआ भा भाई कहके बोलावल जाला त छोट भाई के बउआ, बबुआ भा नाँव धके बोलावल जाला । ओहीतरे भउजाई के भउजी भा भाभी कहके बोलावल जाला । भाभे आ भइँसुर के बीच सीधा संवाद के परंपरा शुरू भइल भोजपुरी समाज में ढेर नइखे भइल । एह में भइँसुर के भइआजी, भाईजी से संबोधन कइल जाला त देवर के बउआ भा बबुआ आ ननद में जेठ के दिदियाजी भा बहिनजी कहके आ छोट के बबी, बबुनी भा बइआ कहके बोलावल जाला । देआदिन भा गोतिन में जेठानी के दिदियाजी, बहिनजी भा बहिन कहके बोलावल जाला त देवरानी के कनिआ भा बहुरिआ कहके बोलावल जाला । औरत अपना छोट भउजाई के कनिआ भा बहुरिआ कहेली । सार अगर अपना से जेठ बानी त भइआजी चाहे भाईजी कहल जाला त छोट के नाँव धके बोलावल जाला । जेठ बहनोई के जीजा भा पहुना कहल जाला त छोट के मेहमान कहे के प्रचलन बा ।

ओही तरे जेठ ननदोसी के जीजा भा पहुना कहल जाला त छोट के मेहमान कहल जाला । सरहोज में जेठ के दिदी चाहे बहिनजी कहल जाला त छोट के कनिआ भा बहुरिआ कहल जाला ।  अपना के पहिल ऊपरका पुश्ता में घर-परिवार में प्रयोग होखेवाला नाता में सब से पहिलका नाता खूद के जन्म-देवेवाला माता-पिता से होला । माता के भोजपुरिआ समाज में माई, दाई, दिदी, अम्मी, मम्मी, मम से संबोधन कइल जाला त पिता के बाबु, बाबा, आबा, पापा, डैडी, डैड, दादा से संबोधन कइल जाला । माता-पिता के बाद परिवार में आवेलन पितिआ-पितिआइन आ फूफू । आपन पिता से जेठ पितिआ के बड़का बाबु भा बड़का लगाके पिता के संबोधन करेवाला कौनो शब्द से संबोधन करे के बेसी प्रचलन बा ।

एकरा अलावे पिता से जेठ भा छोट पितिआ के काका, चाचा कहके संबोधन कइल जाला । पितिआइन अगर माई के जेठानी बाड़ी त बड़की माई भा बड़की कहके माई के संबोधन करेवाला कौनो शब्द के प्रयोग हो सकेला आ माई के देवरानी बाड़ी त सामान्यतया काकी, चाची कहल जाला । परिवार से बाहर पूरे गाँव समाज के बपहर कहल जाला । बपहर में अपना पुश्ता में अपना परिवार खातिर प्रयोग होखेवाला ऊपर के शब्दन के प्रयोग होला त अपना से एक पुश्ता ऊपरवाला खातिर प्रायः चाचा-चाची, काका-काकी प्रयोग होला । चाचा भा काका के संक्षेप कके पितिआ के नाँव धके चा भा का कहे के भी प्रचलन बा । बपहर के बाद आवेला मामा भा नाना के घर आ गाँव । ओ के म

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