भोजपुरी रामायण पर एक नजर

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भोजपुरी रामायण पर एक नजर

गोपाल ठाकुर

ओमप्रकाश जायसवाल, वीरगञ्ज के प्रकाशन में मुकुंद आचार्य भानुभक्तीय रामायणको भोजपुरी अनुवाद भोजपुरियन के बीच में लेआइल बाड़न । यह ‘भोजपुरी रामायणः भानुभक्त रामायण के भोजपुरी अनुवाद’ खातिर अनुवादक आचार्य र प्रकाशक जायसवाल दूनू जने बधाई के पात्र बानी । २०६३ साल में एकर प्रकाशन पूरा भइल बा । ई पहिल संस्कारण ५०१ प्रति छपाइल बा । राज्य भा राज्य प्रायोजित कौनो संस्था अगर एकरा खातिर आगा आइल रहित त आउर अधिक प्रति छपा सकत रहे । खैर जे होखे, अनुवादक आ प्रकाशक दूनू जने के निजी प्रयास एह दिसाईं प्रशंसनीय बा । ई ‘नेपाली’ समाज के भोजपुरी समाज में कुछ हद तक आधिकारिक रूप में परिचित करावे में मदत कइले बा त एकरा माध्यम से भानुभक्त के भोजपुरी समाज में प्रवेश मिलल बा । निश्चित रूप से अनुवाद अपनेआप में एगो बहुत झंझटिआह आ अपजसी काम बा । अनुवाद के विद्वान लोग एगो अइसन भंसार से तुलना कइले बा जहाँ असावधानी भइला पर बहुतो अबैध सामग्री लक्ष्य भाषिक समुदाय में घुस सकता । त आचार्य के अनुवाद कृति के रूप में आइल ई भोजपुरी रामायण भाषिक, शैलीगत, विषयगत आदि दृष्टिले कइसन बा त ? तनिका विचार कइल जाओ । १. भाषा भाषा के दृष्टिकोण से ई रामायक नेपालीय भोजपुरी के केंद्रीय भा मानक भाषिका अर्थात्‌ कलैया-वीरगंज के भाषिका में अनुदित बा । एकरा बादो अनुवादक संस्कृत, ‘नेपाली’ आ हिंदी के शब्दन के भी कइयन ठाँव में भोजपुरी पर पइँचा लाद देले बाड़न । ओतने ना, एह रामायण के अंतिम पृष्ठ में तुलसीदास के रचना ‘रामचरितमानस’ में प्रकाशित रामायण के आरती जइसन के तइसने छापल बा । कम से कम अनुवादक के ई असावधानिए काहे ना होखे, भोजपुरी समाज में तुलसीकृत रामचरितमानस के प्रभाव के झलकावेला । १.१ संस्कृत शब्द अर्थे ना बुझाए के हिसाब से एह कृति में भोजपुरी में ‘खिर्ह’ भा ‘तस्मई’ के जगे ‘पायस’ के प्रयोग के भोजपुरी समाज प्रसङ के आधार पर मात्रे बुझी । ओही तरे भोजपुरी में ‘असापत’ भा ‘गाभिन’ प्रचलित रहला का बादो एह अनुवाद में ‘गर्भिणी’ के ही प्रयोग कइल गइल बा । १.२ ‘नेपाली’ उच्चारणका आधार पर अर्थ के अनर्थ होखेवाला हिज्जे के प्रयोग प्रचलित भोजपुरी प्रयुक्त शब्द अर्थ तइयो तहियो ओहू दिन गावेवाला गाएवाला गाईवाला पर मा, भित्र में बाड़ी बारी बारी चिन्हके चिनके चीन देश के पर्थन पर्शन परोसन छहिंड़ी छयारी निरर्थक सँसरत घसरत रगड़त लेखे लेखा जइसन पोता नाती बेटी के बेटा छन छिन जबर्दस्ती लेहल गावे लागल गाए लागल गाई दुहे देहलख बैताल बेताल तालबिहीन ३.६.१.३ अर्थ ना बिगड़ला के बादो नेपाली प्रभावित उच्चारण के आधार पर अस्वीकृत हिज्जे प्रयुक्त हिज्जे स्वाभाविक हिज्जे जनाएवाला जनावेवाला मनाएवाला मनावेवाला पिपल पीपर नारही ना रही जोडतानीं जोड़तानी अन्तरधान अंतरध्यान रहिअ रहिहऽ बुढउ बुढ़ऊ होइअन होइहन पहिचान पहचान हिरिस हिलिस चाँदी चानी लरिकाहीं लड़िकाईं उहे में ओही में धौड़ल धउरल बुलाउ बोलाईं बिहौलन बिअहलन दोसरा दोसर घोलल घोरल जले लागल जरे लागल इहे से एही से चौधे चउदे उलट उलिट गाली गारी नाजाई ना जाई छोडेके छोड़ेके खड़ाव खड़ाँव भालू भाल जाती जाति टुक्रा टुकड़ा जहिय जइह समझौवली समझवली जाएला जाला ताल ताड़/तार संशा दुबिधा गडल गड़ल खूटा खूँटा ओटिआएलागल ओटिआवे लागल चिनासी चिन्हासी छदाई बकोराई/कय खम्बा खाम्हा मिटाके मेटाके मुआए मुआवे बोकहिया बकइया/बोकइया कहिअ कहिहऽ अँगूठी अउँठी/औँठी तीनो तीनू पाए पावे खड़अइलन खड़िअइलन इहे बीच एही बीच कहिए कहिहे सुनहिए सुनइहे दशो दसू सोन सोन्ह ढोंड़ी ढोंढ़ी चारो चारू खड़ाउँ खड़ाँव गाये गावे रितुदान रत्तीदान गाज में गाढ़ में जहिअ जइहऽ उहे लेखा ओही लेखा बिताई बितावे १.४ हिंदी शब्द के प्रयोग प्रयुक्त हिंदी प्रचलित भोजपुरी रस्सी रसरी/लसरी है ह उमर उमीर हिरन हरिन मछली मछरी खदेरलख खहेरलख इतराता नितराता मुगदर गदा लहूलुहान लेहू-लेहुआन नींद नीन उपर देखावल गइल त्रुटियन के अलावा सकारात्मक संदर्भ में नकारात्मक प्रयोग के रूप में ‘खुशी में जनकपुर डुबल’ लिखल गइल बा । वास्तव में ‘डुबल’ हमनी के पूर्वीय परंपरा में शोक के प्रतीक ह । एतहाँ ‘खुशी में जनकपुर झुमल’ लिखल बेसी सांदर्भिक होई । ओही तरे भोजपुरी में दूगो शब्दन भा वाक्यन के जोड़े खातिर ‘आ’ के प्रयोग होला । ई अपनेआप में दीर्घ स्वर ह, बाँकिर एह में फेर से दीर्घता प्रयोग कके ‘आऽ’ लिखल गइल बा जौन जरूरी नइखे ।

२. शैली भानुभक्तीय रामायण शास्त्रीय छंद पर आधारित बा । बाँकिर एह भोजपुरी रामायण के बारे में अनुवादक के अइसन अभिव्यक्ति ‘अनुवादक के कथनी’ कहके आइल बाः ‘छन्द के ज्ञान हमरा ओतना ना भइला से हम खाली अन्त्यानुप्रास मिलाके भावानुवाद कइले बानी ।’ अर्थात ई अनुवाद छंदात्मक ना होके तुकबंदी मात्रे ह । एकरा अलावा हरफ में वर्णात्मक संख्या भी मिलल नइखे । बल्कि गद्य कविता में ही अगर अनुवाद कइल गइल रहित त शायद एह से निमन होखित । ३. विषयवस्तु विषयवस्तु के बात कइला पर ई अध्यात्म रामायण के संक्षिप्त अनुवाद ह । भानुभक्त रामायण में जमाजमी १३१७ पद बा त अध्यात्म रामायण में ४२६८ पद । तुलनात्मक रूप में तुलसीकृत रामचरितमानस एकरा से बहुते विस्तृत बा । ई भोजपुरी रामायण भानुभक्तीय रामायण के हुबहु अनुवाद भइला से भानुभक्त के ‘नेपाली’ रामायण के बराबर पद एह में भइल वांछनीय होला । संदर्भ के बात कइल जाओ त माझी-राम संवाद प्रसङ रामचरितमानस में अयोध्याकांड में बा त एह रामायण में बालकांड में ही विश्वामित्र आ राम के जनकपुर यात्रा के क्रम में राखल गइल बाः ख्वामित् ! ई दुइ पाउको अति असल् धूलो जसै ता पर्यो । पत्थर् हो त पनी मनुष्य सरिको सुन्दर् स्वरूपै धर्यो् ॥ तस्‌तै पाठ यहाँ भयो पनि भन्या डुङ्गा स्वरुप् धर्दछन् । डुङ्गाले पनि रुप् धर्या यदि भन्या हाम्रा जहान् मर्दछन् ॥९७॥ (भानुभक्त रामायण बालकाण्ड) खेवैया एगो ठिटोली कइलख, प्रभु के पांव पकड़ के । अपने सुन्दर नारी बनौनी, पत्थर में चरण धरके ॥ वइसने लीला इहां करब त, हमर नैयाँ होई नारी । लइकन के मुँह में जाबी लागी, का कही घरवाली ॥९७॥ (भोजपुरी रामायण बालकाण्ड) संदर्भ अलग भइला का बादो घटना उहे ह । बाँकिर एकरा बाद बनिहारी लेवे-देवेवाला प्रसङ के रामचरितमानस में उल्लेख बा जब कि भानुभक्तीय रामायण एह विषय पर मौन बा । एह प्रसङ के भोजपुरी समाज प्रमुखता के साथ गावेला । अर्थात गंगा हेलला का बाद राम माझी के बनिहारी के तौर पर कुछ देवे खातिर सीता के इशारा करेलन । सीता औंठी देवे के कोशिस करेली । बाँकिर माझी अपना के एह मर्त्यलोक के एगव नदी मात्र के खेवैया बतावत राम के भवसागर के माझी बतावेला आ एके पेशावाला लोग के बीच में बनिहारी लेवे-देवे के काम कइल ठीक नइखे कहत बनिहारी लेवे से इनकार करेलाः नाई से ना नाई लेत केस के कटाई जी धोबी नाही लेत कभी धोबी से धोआई जी केंवट से केंवट ली काहे पार उतराई जी लज्जित ना करीं अभी देके मजदूरी हमें का होई लेके अभी पार उतराई जी देके मजदूरी आपन जात ना बिगाड़ीं जी । हम इहाँ प्रभुजी के गंगा पार कइ देनी करेम भव पार प्रभु घाट जब राउर आएम ओही दिन बराबर होई पार उतराई जी ४. उपसंहार सामंती राजशाही के आदर्श के रूप में राम के मर्यादापुरुषोत्तम बतावल गइल बा । एह विशेषण के पक्ष आ विपक्ष में बहस जारी बा, जारी रही भी । एकरा बादो भारतीय उपमहाद्वीप में रामायण सर्वाधिक भाषा आ संस्करण में उपलब्ध बा । रहल बात भोजपुरी के, त तुलसीकृत रामचरितमानस भोजपुरी समाज खातिर अनुवाद कके पढ़े के विषय ना रहल, ना बा आ ना रही । एकरा बादो मुकुंदजी भानुभक्तीय रामायण के भोजपुरी अनुवाद हमनी के सामने लेआइल बाड़न । ऊ निश्चित रूप से ‘नेपाली’ मातृभाषी होत भी उनकर कर्मभूमि भोजपुरिया क्षेत्र रहल बा । तइयो एह अनुवाद के लक्ष्य भाषा उनकर मातृभाषा ना भइला से उपर बतावल कुछ त्रुटी सब रह गइल बा । हँ, अनुवाद के प्रकाशन से पहिले भाषिक संपादन जरूरी होला जौन एह पुस्तक में नइखे लउकत । भविष्य में एह पर ध्यान पहुँचो । ना त गुँड़-गोबर-बतासा बनावल ठीक ना होई । वाणस्थली, महादेवस्थान-७, काडमाड़ो भोजपुरी टाइम्स दैनिक, सावन १८, २०७२ में प्रकाशित ।

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