भोजपुरी लोकगायन : सामर्थ्य और चुनौतियाँ

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भोजपुरी लोकगायन : सामर्थ्य और चुनौतियाँ

  – गोपाल ठाकुर                                                                                                               अध्यक्ष : नेपाल भोजपुरी अकाडेमी

१. पृष्ठभूमि

गोपाल ठाकुर

र्तमान भारत के बिहार में रहा भोजपुर से शुरू हुई मानी गई भोजपुरी संस्कृति अपनी गायन विधा में संसार में मशहुर है । आज के दिन में नेपाल हो या भारत, फिजी या मॉरीशस, एशिया हो या अमरीका; हर जगह पर नेपाल और भारत में बनी भोजपुरी सिनेमा लोगों के दिल जीतने में सफल है । गैर भोजपुरी हिंद-आर्य भाषाओं में बनी सिनेमा को चमकाने में भोजपुरी मौलिकता पर आधारित गीतों का अहम् योगदान है । इन सभी सफलताओं के पीछे भोजपुरी वाचिक परंपरा में जीवित लोकगायन ही श्रेय का हकदार है । किंतु भोजपुरी की मौलिक लोकगायन परंपरा पर नाम मात्र का काम हुआ है । राज्य की ओर से अगर कही जाए तो इस क्षेत्र में भारत में अभी तक शुरूवात भर हुई है । नेपाल में अभी अभी सुगबुगाहट हो रही है । इसका नतिजा है कि भोजपुरी की लोकगायन परंपरा अन्य भाषाओं की गायन विधा को सजाने-सँवारने में अपने सामर्थ्य को लगाती गई और आज के प्रतिलिपि अधिकार के जमाने में अपने भिखैनी होती गई महशुस कर रही है । भोजपुरी लोकगीतों के नाम पर हाबी हुई वर्णसंकर अश्लीलता आज के दिन में समूचा भोजपुरी संस्कृति के दामन पर दाग बनकर रह गई है ।  इस संगीन घड़ी में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग की ओर से आयोजित इस संगोष्ठी के लिए संयोजक मित्र प्रो. डॉ. वशिष्ठ अनूप सहित सभी आयोजक मित्रों को धन्यवाद देते हुए भोजपुरी लोकगायन का संक्षिप्त परिचय के साथ उसके सामर्थ्य, चुनौतियाँ, संरक्षण और पुनर्स्थापन के सवाल पर कुछ बात कहना चाहूंगा ।

२. भोजपुरी लोकगायन

लोकगायन अपनेआप में जीवनवादी होता है । लोकगायन यानी जनता का गायन, जनता में भी श्रमजीवी जनता का गायन, मेहनत के समय भी प्रसन्नचित्त रखनेवाला गायन लोकगायन होता है । कहना नहीं पड़ेगा, भोजवंशी राजाओं की राजधानी से भोजपुरी शुरू जरूर हुई किंतु यह तब से अब तक मेहनतकश लोगों की भाषा और जीवनशैली के प्रतीक के रूप में जीवित है । जहाँ जितना इसे सजाने-सँवारने का प्रयास हुआ, कोई राजकवि, राजगायक, राजपुरोहित से नहीं बल्कि राजतंत्र पर भी अंकुश लगानेवाले, पाखंड पर अंकुश लगानेवाले निष्कामकर्मयोगियों से हुआ । इसलिए भोजपुरी लोकगायन के महत्वपूर्ण अंश के रूप में श्रमगीत शामिल है । उस में गायन की समयावधि के हिसाब से भोजपुरी लोकगायन को दो भागों में बाँटकर देखना होगा :  लोकगाथा और लोकगीत । 

३. लोकगाथा

भोजपुरी संस्कृति के भीतर निरस श्रम को सरस बनाकर मनोरंजन के साथ मेहनत करने की परंपरा बहुत पुरानी है । इसके साथ साथ बैठकी के समय यानी काम से फुर्सत के समय में भी मनोरंजन के जरिए जीवन की ओर नजर डालने की भी परंपरा रही है । इस हिसाब से भोजपुरी समाज में कुछ घंटो में पूरी होनेवाली लोकगाथा से लेकर महिनो लगाकर पूरी होनेवाली लोकगाथाएँ मौजूद हैं । इसी तरह हास्य, व्यंग्य, करुण, शृंगार, बिरह, वीरता आदि हर रस में इतिहास, समाज, प्रेम, भक्ति, वैराग्य हर पक्ष में आशावादी और निराशावादी दोनो तरह की लोकगाथाओं की उपस्थिति रही है ।

  • ऐतिहासिक लोकगाथाओं में आल्हा और लोरिकाइन का स्थान सब से ऊपर है ।
  • सामाजिक लोकगाथा के रूप में शोभनयका बंजारा, सती बिहुला, कुमरविजयी का नाम ऊपर है ।
  • प्रेमप्रधान लोकगाथाओं में काना सारंगा-सदाबृज, सोरठी-बृजभार का नाम सब से आगे है ।
  • भक्ति और वैराग्य के लिए गोपीचन और भरथरी लोकप्रिय हैं ।
  • इसी तरह मानवीय कमजोरी पर आधारित मिरिद सिंह लोकगाथा शिक्षाप्रद है तो प्रेमप्रधान साहसिक लोकगाथा के रूप में हिरनी-बिरनी का भी अपना ही महत्व है ।
  • लोकगाथा राजा ढोलन राजसी कमजोरी और मित्रता के अजब मिशाल के रूप में लोकप्रिय है ।
  • भक्ति और तंत्र-मंत्र के लिए देवास का भोजपुरी समाज में अपना ही स्थान है । यह खास इष्टदेवी-देवता के स्मरण में गाया जाता है ।
  • पुरुष-प्रधान समाज में भी महिला के पैतृक सम्पत्ति पर अधिकार की ओर लक्षित चाँचर भी भोजपुरी संस्कृति के अभिन्न अंग के रूप में मौजूद है ।

ऊपर चर्चा की गई लोकगाथाओं में मिरिद सिंह सब से छोटी और आल्हा सब से लंबी है । मिरिद सिंह करीब एक घंटा में पूरा होता है तो आल्हा को पूरा करने में महिनों लग जाते है । इसी तरह आल्हा के बारे में यह भी कहा जाता है कि इसमें ५२ किल्ला यानी अध्याय हैं और कोई भी अल्हवहिया एक संकल्प में सभी बावन किल्ला नहीं गाता है ।

४. लोकगीत

समय की गति के साथ लोगों के फुर्सत और आनंद लेने के तरिके में आए बदलाव के साथ भोजपुरी समाज ने लोकगीतों की झड़ी लगा दी । भोजपुरी संस्कृति की इस अनोखी धरोहर में समय से स्वतंत्र और समय से अनुबंधित दोनो तरह के लोकगीतों की रचना हुई । समय से स्वतंत्र रहे लोकगीतों में भजन-कीर्तन, झुमर सहित के कुछ गीतों को लिया जाता है । बाँकी सभी गीतों को खास समय, खास महिना, खास ऋतु, खास उत्सव, खास अनुष्ठान के अवसर पर ही गाने का प्रचलन है । इस अनुसार हमारे स्मृति पटल में रही पारंपरिक समय तालिका से बंधे कुछ भोजपुरी लोकगीतों की चर्चा करना चाहता हूँ : 

४.१  समयबद्ध लोकगीत :  प्रहर, महिना, ऋतु

भोजपुरी में अधिक लोकगीतों को समय से बांधा गया है । उन में भी खासकर सोई और जगी अवस्था के भी आलग अलग लोकगीतों की उपस्थिति देखी गई है । समय से बंधे लोकगीतों के असमय गाने के खिलाफ हिदायत भी दी गई है :  साँझ पराती भोर के संझा, लात खाए के इहे धंधा । यानी शाम को पराती और सुबह को संझा नहीं गाना चाहिए ।

४.१.१ प्रहरबद्ध लोकगीत

चौबीस घंटे के रात-दिन को आठ प्रहरों में बाँटा गया है । सामान्यतया भोजपुरी में कहा जाता है है :  जेकर दिन सेकर रात । यानी सूर्योदय के बाद से अगले सूर्योदय तक एक ही दिन की गिंती होती है । इस आठ प्रहर में मध्यान्ह और अपरान्ह तथा आधीरात और छोटी भोर के समय तक एकही तरह के लोकगीत गाने का प्रचलन है । वैसे ही पूर्वान्ह तथा देर शाम के समय एक तरह के लोकगीत गाने की परंपरा है । बाँकी प्रहर में प्रहरबद्ध गीत गाना उत्तम माना जाता है । ऐसा विश्वास है कि समयबद्ध रागों का निर्माण भी भोजपुरी सहित अन्य हिंद-आर्य संस्कृति में रहे प्रहरबद्ध लोकगीतों से सिखकर ही किया गया है : 

४.१.१.१ पराती 

प्रहरभर रात शेष रहने पर पराती शुरू होती है । इनके दो उद्देश्य होते हैं :  सोये लोगों को समय का अभाष कराना और जगाकर अपने नित्य कर्म की ओर आकर्षित करना । इनकी कई लय होती हैं । किंतु अभी दो-तीन लय ही यदाकदा कानों में पड़ती हैं । वैसे तो ये किसी महिना और मौसम में गाई जा सकती है । इसके बावजूद जाड़े के समय लम्बी रात में तड़के सुबह लोग घुर की चारो ओर बैठकर यह गीत गाते हैं । दिखए जाड़े और गरीबी का व्यंग्यात्मक चित्रण इस पराती में : 

तोरा डरे घेंकुरी लगइया हो जाड़ रइया, तोरा डरे घेंकुरी लगइया।। तोरा०।।

गोड़ दने जाड़ समइले थरथर करेज कँपइया

नाक दूनू सुरुरुरु नाक दूनू सुरुरुरु, कान दूनू बँसिया बजइया हो जाड़ रइया तोरा०

चदरवाला के घुसोघासो फारत लाल रजइया

कमरवाला के टाड़ोटुड़ो, गुदरा के भिरिओ ना जइया हो जाड़ रइया तोरा०

४.१.१.२ झुमर

झुमर का कोई खास समय निर्धारित नहीं है । उसी तरह प्रहर भर दिन उठने की अवस्था में निश्चित गीत गाने की परंपरा भी नहीं है । इसका कारण ये हो सकता कि लोग इस समय में दिनभर के काम की तैयारी के क्रम में एक तरफ घर से निकलते हैं तो दूसरी ओर घर में रसोई तैयार करने का समय भी यही है । अतः काम करने गाँव से झुंड में निकली महिलाएँ झुमर गाती हुई राश्ता तय करती हैं । इसलिए ये गीत खेत से काम करके लौटते समय भी सुनने को मिलता है जिसके चलते इसे बाटगायन भी कहा जाता है । अन्य अवसरों पर भी महिलाएँ समूह में राश्ता चलते वक्त ये गीत गाती हैं । किंतु होली खेलनेवाले होलवइया लोग भी राश्ता चलते समय झुमर गाते हैं : 

एक बिता कपड़ा हम कलेया से मङवलो से कलेया से मङवलो पिअवा दरजी

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चोलिया सिआदे लहरदार पिअवा दरजी

चोलिया पहिरी हम चललो बजरिया से चललो बजरिया पिअवा दरजी

लागेला नजरिया हजार पिअवा दरजी

४.१.१.३ खड़ा लय

इस धुन में विभिन्न गीत दिन या रात के पहले प्रहर के बाद से लोग गाना शुरू करते हैं । इस गीत में लंबी तान की जरूरत पड़ती है । लोकजीवन से आध्यात्मिक जीवन तक की विभिन्न विषयवस्तुओं का इन गीतों में गाने की परंपरा रही है ।

मरी गइलऽ रेलिया में कटिके हो रजऊ, मरी गइलऽ रेलिया में कटिके ।

पुरुब से आवे माल ही गड़िया, पछिम से आवे पसिंजर

बीचे लयनिया में पिआ मोरा ठाड़ रहलें

गड़िया लड़ेला हटि हटिके हो रजऊ मरी गइलऽ० 

४.१.१.४ निर्गुन

मध्यान्ह और आधी रात के समय से निर्गुन गाने का प्रचलन है । इस गीत को भी अलग अलग लय और अंदाज में गाया जाता है । इसमें भी लोकजीवन से आध्यात्मिक जीवन तक के मसाले मिलते हैं । बहुतो निर्गुन शृंगारिक शब्दों में बिरह रस में गाये जाते हैं जिसमें हास्य, व्यंग्य के जरिए सामाज की कमजोरी को भी उजागर किया जाता है और वैराग्य की ओर भी उसका उतना ही महत्व समझा जाता है : 

सुतल में रहली ए सखिया लाली तरे पलङिया

कब उठी भगले कब उठी भगले बलमुआ छोड़ी हमे रे सेजिआ

४.१.१.५ पूर्वी 

निर्गुन के बाद का समय पूर्वी का है । इसकी लय निर्गुन से कुछ और मीठासपूर्ण होती है । तान की जरूरत इस गीत में भी पड़ती है : 

बाबा मोरा गइले उरुबीपुरुबिआ सेहो अइले पोखरा खनाई हो राम

     पोखरा के आँट पर लगइले दू बिरिछया एक महुआ के एक आम हो राम

४.१.१.६ सोहर

पूर्वी के बाद सोहर गाने का प्रचलन है । ये गीत जीवन के अनेक पक्षों को उजागर करते हुए बच्चों के जन्म की खुशी में बधाई देते हुए भी गाया जाता है : 

जुग जुग जिअस ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो

ललना लाल होइहें कुलवा के दीपक मनवाँ में आस जागल हो ।।

आजु के दिनवा सुदिनवा, कि रतिया लोभावन हो

ललना दिदिया के होरिला जलमले होरिलवा बड़ा सुंदर हो ।।

४.१.१.७ समदावन

ये बिदाई गीत है । सोहर के बाद लोगों को महफिल से बिदा करने के लिए, घर से बेटी-बहन को बिदा करते वक्त ये गीत गाया जाता है । इस गीत में बिछोड़ की पीड़ा के साथ साथ भविष्य के सुखमय जीवन की परिकल्पना का भी संकेत मिलता है : 

राजा हिमाचल गृह गउरा जलमली शिव लले अङुड़ी धराय

बसहा बयल पर डोलिया फनवले बाघ छाल दिहलन ओढ़ाय । 

४.१.१.८ संझा 

सूर्यास्त के बाद बच्चों के साथ दिल बहलाने और उन्हें पुचकार पुचकारके खिलाने पिलानेके हिसाब से संझा गाने का प्रचलन है । अधिकतर माई-दाई लोगों की जुबान से ये गीत सुना जाता है : 

हो चंदा मामा आरे आवऽ पारेऽ आव नदिया किनारे आवऽ

सोने के कटोरिया में दूधभात लेले आवऽ बबुआ के मुहवा में घुटुक ।

आवऽ हो उतरिआव हमरी मुड़ेल, कब से पुकारिले भइले बड़ी देर

भइले बड़ी देर हो बाबु का लागल भूख चंदा मामा०

४.१.१.९ लोरी

संझा गाते हुए बच्चों को खिलाने-पिलाने के बाद उन्हें सुलाने के लिए लोरी गाई जाती है । लोरी सुनते सुनते बच्चे उसी सुर में सुंदर स्वप्‍न के साथ सो जाते हैं : 

बउआ हमर आवले मामाकिहाँ से, आव हे निनिया बरगिनिया से 

किनी लइबो मुङवा बेसाही लइबो मोतिया

बबुआ खेलिहन अपना दाई के गोदिया

घरवा भरल रही अनधन से ।। आव हे निनिआ०।।

४.१.२ महिनाबद्ध लोकगीत

भोजपुरी समाज में कुछ खास गीत खास महिना में गाए जातै हैं । भोजपुरी जनश्रुति के अनुसार ऐसे गीत के असमय गाने पर अनिष्ट भी होने की आशंका की जाती है । जनश्रुति के अनुसार एक गाय कहीं कुएँ में गिर पड़ी थी । सावन महिना का समय था । सावन-भादो बरसात का समय है । गाय को आशा थी कि दो-चार दिनों में ही बारीस होगी, कुएँ में पानी भरकर सतह ऊपर उठेगा और वह कुएँ से बाहर आ जाएगी । इतने में किसी ने चैतावर गा दिया । चैतावर की धुन सुनकर गाय की हिम्मत टुट गई । क्योंकि चैत से तो भादो आने  में कई महिने गुजरने पड़ते हैं । अतः गाय अधीर होकर मर गई ।

४.१.२.१ चैतावर 

चैत के आरंभ से लेकर रामनवमी तक और कहीं कहीं पूर्णमासी तक चैतावर गाया जाता है । इस में रामायण के विभिन्न प्रसंग का चित्रण किया जाता है तो लोकजीवन के अनुराग और प्रेम का प्रदर्शन भी किया जाता है । इस गीत की मूल रूप में दो लय होती हैं : 

बितले फगुनवा आहो चइता आएल हो चइता आएल हो रामा

देश गेल बलमुआ सेहो नहीं आवले हो रामा देश गेल बलमुआ 

चैत मासे चुनरी रङाइद बलमु हो जइबो नइहरवा

चुनरी रङाइद चोलिया सिआइदऽ

अँचरा में घुँघुर लगाइदऽ बलमु हो जइबो नइहरवा।। चैत मासे०।।

४.१.२.२ घाँटो

चैत महिना में गाया जानेवाला दूसरा लोकगीत घाँटो है । ये थारू समुदाय में काफी प्रचलित है । तौरतरिका सामाचकवा से मिलता है । महिलाओं के बीच में ये गीत समूह में रात में गाया जाता है ।

४.१.२.३ कजरी 

सावन के लुभावन मौसम में कजरी गाने का प्रचलन है । ये गीत महिलाओं के बीच परंपरागत रूप में गाने का प्रचलन है । किंतु अभी कीर्तन मण्डलीवाले लोग भी इस गीत को खासकर कृष्णचरित्र का वर्णन करते हुए गाते हैं : 

रिमझिम बरसे बदरिया गोइयाँ गावेली कजरिया, मोर साँवरिया भींजे ना

खेते धनवा के केयरिया मोर साँवरिया भींजे ना 

४.१.२.४ जाटजटिन

भादो की रात में अभिनय के साथ ये गीत गाने का प्रचलन रहा है । किंतु अब ये गीत लोप प्रायः हो गया है । परंपरागत रूप में महिलाओं के बीच ये गीत गाया जाता था । इस गीत में प्रायः पति-पत्‍नी के बीच रही असंतुष्टी का पटाक्षेप होता है : 

हँसुली जब जब मङनी रे जटवा हँसुली क्यों ना लइले रे

मोरी बारी समइया रे जटवा बिदेसवा काहे गँवइले रे 

हँसुली जब जब ले अइनी जटिनिया हँसुली क्यों ना पेन्हले रे ?

तोरी बारी समइया जटिनिया नहिरा काहे गँवइले रे ?

४.१.२.५ चकुचन्ना 

भादो के शुक्ल पक्ष के चौथे चाँद को चकुचन्ना कहा जाता है । इसके दो पक्ष हैं :  शिक्षक-विद्यार्थी के बीच गणेश चतुर्थी मनाना और महिलाओं का चकुचन्ना व्रत करना । खासकर गणेश चतुर्थी में गीत गाने का प्रचलन था । अब ये प्रथा करीब करीब अंत हो चुकी है : 

बबुआ हो बबुआ सिताबलाल बबुआ

कोठी पर से ढेउआ उतार लावऽ हो बबुआ

बबुआ के माई बड़ा हईं दानी

लइकन के देख-देख भागेली चुहानी

घर में धोती टाङल बा

बाकस में रोपेया बान्हल बा

घर में धरबू त चोर ले जाई

गुरुजी के देबू त नाम हो जाई।

बबुआ के आँख मुनिहऽ भाई

बिन कुछ लेले चलल ना जाई।।

४.१.२.६ झिँझिया 

आश्विन महिने में दशहरा के दौरान समूह में महिलाओं द्वारा अभिनय के साथ गाया जानेवाला गीत झिँझिया है । झिँझिया का मतलब छीद्र ही छीद्र से भरा घड़ा है जिस में दिया जलाकर रखा होता है । इस गीत में समाज को कुदृष्टि से देखनेवालो को गाली दी गई होती है और झिँझिया बनाने में सहयोग करनेवालों का गुणगान किया गया होता है : 

खइबे त खो डइनी कोतरा मछरिया

ना खइबे कोतरा चिबइबे अपना भतरा

भइया मोरा जइहेन माटी कोड़ी लइहेन

भउजी मोरी झिँझिया उरेहिहेन हो ।।

जिन मोरा झिँझिया पर ढेलवा चलइहेन

उनका के देबो बलिदनवे हो ।।

४.१.२.७ दोहा 

कार्तिक महिने में दीपावली तक गाया जानेवाला ये गीत अब लोप हो चुका है । कृषि जनजीवन का चित्रण रहा इस गीत की हरेक पंक्ति के अंत में बाजन बोल कहा जाता है : 

भइया रे कथीए के सोभले घाँटी घर्दनवा कथिए के सोभे लटकनवा बाजन बोल

भइया रे गइया के सोभले घाँटी घर्दनवा कि बछरू के सोभे लटकनवा बाजन बोल

४.१.२.८ छठ 

कार्तिक और चैत में छठ व्रत की तैयारी में खासकर कतकी छठ के लिए तो एक महिना पहले से ही छठ गीत गाना शुरू हो जाता है । इस अवसर पर अनेक लय में गीत गाने की परंपरा रही है । सब से लोकप्रिय रहा ये गीत : 

ऊ जे केरवा जे फरेला घवद से ओह पर सुगा मेड़राय

ऊ जे सुगवा के मारबो धेनुख से सुगा गिरे मुरुछाय

ऊ जे सुगनी जे रोएली बियोग से हमरा कोई ना सहाय

ऊ जे उठ उठ सुगनी सबुर से दिनानाथ होइहेन सहाय

४.१.२.९ सामाचकवा 

कार्तिक में अभिनय के साथ गाया जानेवाला सामाचकवा के गीत में भाई-बहन का प्रेम झलकता है । कृष्ण की बेटी श्यामा और उसका प्रेमी चारुवक्र के बीच के प्रेम पर लगा ग्रहण श्यामा के भाई की तपस्या से अंत हुआ था । इसी उपलक्ष्य में ये पर्व मनाया जाता है । इस अवसर पर ये गीत गाया जाता है : 

वृंदावन में आग लागल कोई ना भुतावे हो

असगर हमर भइया पैंड़ा धएले आवे हो

भइया हमर अपने से अगिआ भुतावे हो  

४.१.२.१० होली

खासकर फागुन में गाये जानेवाले गीत को होरी, फगुवा या होली कहा जाता है । होली अनेक लय और ताल में गायी जाती है । ये दोपदी और चौपदी रूप में अधिक मिलती है । मूलतः शृंगार रस में वसंती बहार के स्वागत में ये गीत परंपरागत रूप में गाने की परंपरा है । किंतु इसकी पौराणिक मान्यता होलिका दहन से है । इसलिए इस गीत में अश्लील गालियों की भी प्रचूरता है । पौराणिक मान्यता के अनुसार होलिका को ही वो सभी गालियाँ दी गई मानी जाती है । इसके साथ साथ होली में भी जीवन के अनेक पक्ष पर विचार किया गया मिलता है : 

राम खेले होरी लछुमन खेले होरी, अजोधा में भाई भरथ खेले होरी ।

चल हो भरथ भइया होरिया खेलन के, बनवा से अएलन भगवान ।

धन बा सेनुरिया के भाग, कि पिआ मोरा चुरिया से लवटे ।

४.१.३ ऋतुबद्ध लोकगीत

भोजपुरी में कुछ गीत खास ऋतु में गाये जाते है । यानी ये महिना से थोड़ी अधिक अवधि तक गाया जाता है । इन गीतों की धुन से लोग खास ऋतु का आभाष कर लेते हैं ।

४.१.३.१ बिरहा

वसंत ऋतु का उत्तरार्ध और गृष्म का पूर्वार्ध यानी वैशाख और जेठ महिने में परंपरागत रूप से बिरहा गाने का प्रचलन है । बिरह वेदना ही इसकी परंपरागत विषयवस्तु होने के बावजूद अब इसके जरिए हास्य-व्यंग्य भी प्रस्तुत किया जाने लगा है । बालेश्वर सहित के गायकों द्वारा विभिन्न अंदाज में प्रस्तुत किया जानेवाला बिरहा का कुछ अंशः

काशी में मजा ना काबा में मजा बड़ा मजा बरसानी में ।

तीन बजे आके जगइहऽ पतरकी सुतल रहब खरिहानी में ।।

मंदिर में सोभेला पंडा-पुजारी कि चौकठ केवाँरी दुआरी में ।

मरदा मनइआ सीमा पर सोभे मउगा मरद ससुरारी में ।।

आरा जइबू कि छपरा जइबू कि जइबू खैरुल्ला में ।

क्यों जिलेबी के तरसेलु गोरकी बड़ा मजा रसगुल्ला में ।

४.१.३.२ बिरहिनी

गृष्म ऋतु यानी जेठ-आषाढ़ में बिरहिनी गाने की परंपरा रही है । इस गीत में तान लंबा होता है । महिला-पुरुष दोनों इस गीत को गाते हैं । तपी धरती पर बरसे पहले मेघ के बाद लोग इस गीत को गाना शुरू करते हैं । उस वर्षा को बिरहिनिया पानी भी कहा जाता है : 

पुरुब से चले बनिजरवा पछिम रे बनिजिया हो

आरे निहुरी निहुरी धनिया अङना बहारस रेकी

तोहरा के देबो धनी हे अन धन बरधिया हो

अपन बदनवा धनिया हमे रे छुए द न रेकी

हमरो बदनवा बनिया हो बिखवा के घरिया हो

जिन छुअलन तिन मरी हो जास नु रेकी

तोहरो बदनवा धनी हे बिखवा के घरिया नु हो

तोहरो हो बलमुआ कइसे के छुअस नु रेकी

हमरो बलमुआ के गरुड़ा इअरवा नु हो

बहियाँ रे मसोरी बिख मोरा हरस नु रेकी

४.१.३.३ बरमासा

नाम से तो बरमासा कहने से सभी बारह मास गानेवाला गीत लागता है, किंतु ये गीत गृष्म के उत्तरार्ध में यानी वर्षा उतरने के बाद अधिक गाया जाता है । इस गीत में प्रेम और बिरह का अधिक वर्णन मिलता है : 

बाव बहे पुरवइया हे ननदी, रिमिझिमी बरसले मेघ हे

सब के बलमुआ हो घरे घरे सुतल, हमरो बलमु परदेश हे

बाव बहे पुरवइया हे ननदी, गोइठी में सुनगले आग हे

जरिए से पिआ मोरा हुँकवा सवादले, जरी गइले कोमल करेज हे

४.१.३.४ होली

होली की चर्चा ऊपर की जा चुकी है । किंतु होली तो वसंत पंचमी से ही सरू हो जाती है । ये वसंत ऋतु के आगमन में वसंत राग में गाई जाती है । ऋतु के हिसाब से ये शिशिर ऋतु में गानेवाला गीत है : 

रङ बरसे भींजे चुनरवाली रङ बरसे

सोने के थारी में जेवना परोसी

खाए गोरी के यार बलम तरसे रङ बरसे

४.२  अवसरबद्ध लोकगीत :  श्रम, संस्कार, पर्व और अनुष्ठान

खास अवसर पर गाये जानेवाले गीतों का भी भोजपुरी में भरमार है । ऐसे गीत काम करते समय, संस्कार संपन्न करते समय, खास पर्व के समय और कोई विशेष यज्ञ-अनुष्ठान के मौके पर गाये जाते हैं ।

४.२.१ श्रमगीत

भोजपुरी समाज मूलभूत रूप में श्रमजीवी समाज है । आरण्य संस्कृति से खेती संस्कृति तक आने पर खासकर खेती किसानी से लेकर घर में मेहनत करते समय मेहनत सफल हो कहकर सुमिरन या शुभकामना गीत से लेकर मेहनत को सरस बनाने के हिसाब से अनगिनत लोकगीतों की उपस्थिति भोजपुरी समाज में देखी जाती है । उस में से कुछ इस तरह हैं : 

४.२.१.१ मूठलगी/गबलगी

भोजपुरी समाज में पहली बार घर से निकालकर खेत में बीज बोने के रश्म को मूठलगी और सरिहन धान की पहली रोपनी को गबलगी कहा जाता है । इन अवसरों पर सब से पहले कुल देवी/देवता का सुमिरन गीत होता है और खेत में पहुँचने पर अन्य श्रमगीत : 

४.२.१.२ बरमासा

बरमासा की चर्चा ऊपर की जा चुकी है । किंतु ये श्रमगीत के रूप में अधिक प्रसिद्ध है । खासकर बिआ उखाड़ते  और धान रोपते समय ये गीत गाने का प्रचलन अधिक है ।

४.२.१.३ जाँतसारी

पहिले ढेँकी और जाँत चलाते समय माँ-बहनें अनेक तरह के गीत गाती थीं । मिला-जुलाकर इसे जाँतसारी कहा जाता था । अब तो ना ढेंकी ना जाँत । तब जाँतसारी सुनने को कहाँ मिलेगी ? किंतु कुछ लोक गायकों की जुबान पर अभी इसकी साँस बाँकी है : 

काल्हुए गवनवा अइली पिआ मो से रुसी हो गइले

हम धनी राते के हो आएल रे केकरे सङवा रहब केकरे ?

हँसिले त हँसे ना देवे रोइले त गारी हो देवे

हम धनी राते के हो अएल रे केकरे सङवा बोलब केकरे ?

सासु मोरा गहुँवा रे देली बाँस के हो चङेलवा रे भरी

हम धनी काल्हे के हो आइल रे केकरे जाँतवा पीसब केकरे ?

४.२.२ संस्कारगीत

जीवन के अनेक संस्कार यानी जीवन का आरंभ जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत हिन्द-आर्य संस्कृति में १६ संस्कार बताये गए हैं । उसी तरह भोजपुरी समाज की इस्लामी संस्कृति में भी कुछ संस्कार हैं । इन समूचे संस्कारों का श्रमजीवी भोजपुरी संस्कृति में पूरा होना अब संभव नहीं रह गया है । तो भी कुछ संस्कार के अवसर पर गीत गाने की परंपरा अभी भी है ।

४.२.२.१ गोदभराई

महिला के गर्भवती होने पर परिवार में आई खुशियाली सहित उसे शुभकामना व्यक्त करने के लिए गोदभराई का रश्म पूरा किया जाता है । ये खासकर संभ्रांत परिवार में संपन्न हुआ देखा जाता है । इस अवसर पर सोहर जैसे कुछ गीत गाये जाते है । अब ये खोज और संरक्षण का विषय बन चुका है ।

४.२.२.२ बधाई

बच्चों के जन्म के बाद घर में खुशियाली के माहौल में सोहर तो उठता ही है किंतु कुछ दिन बितने पर खोजीन और पँवरिया दरवाजे पर बधाई गीत गाकर नवजात शिशु को दुआ देते हैं : 

कंगन लेबो हो बबुआ के बधइया

कवने लुटावे अन धन सोनवा

कवने लुटावे धेनु गइया हो बबुआ के बधइया

४.२.२.३ छठियार

नवजात शिशु के छठे दिन पर छठियार होता है । इस अवसर पर कई तरह के गीत गाये जाते हैं । बहुत ही प्रचलित छठियार गीत का कुछ अंश : 

जुग जुग जिअस ललनवा भवनवा के भाग जागल हो

ललना लाल होइहें कुलवा के दीपक मनवा में आस जागल हो ।

ढोलवा त बाजे सुन सुनर बाजत सुहावन हो

राजा दशरथ के दुअरिया कोसिलाजी के आंगन हो

४.२.२.४ बरही

बच्चा के जन्म के १२ वेँ दिन को बरही कहा जाता है । इस दिन से नवजात शिशु को घर सोइरीघर से बाहर निकाला जाता है । इस दिन पर भी बधाई उत्सव होता है : 

आज मोरा बहुआ के होरिला भइले नेवता भेजाएब हो

ललना अरबन नेवतिह भवँरा परबन सासुजी के नइहर हो

४.२.२.५ अन्नप्राशन/भतखिआई

बच्चा जब छ से नौ महिने का हो जाता है तो कुछ खास मुहूर्त पर एक उत्सव का आयोजन कर उसे अन्न खिलाया जाता है । इसे अन्नप्राशन या भतखिआई कहा जाता है । इस अवसर पर भी कुछ गीत-नाद की परंपरा है : 

काँचकुँच कौआ खाला, दूधभात बउआ खाला

पाता उधिआइल जाला, कौआ लजाइल जाला

बउआ के मुह बिटोरले जाला ।

४.२.२.६ मुंडन

जन्म के बाद बच्चे का पहली बार केश कटाना मुंडन संस्कार कहलाता है । अपनी औकाद अनुसार हजाम को विशेष दान-दक्षिणा देकर मुंडन कराया जाता है । इस अवसर पर भी गीत गाने की परंपरा रही है : 

भल हउ कोसिला रानी काहे बउराइल हो

आरे करहु रमइया जी के मुंडन परम सुख पावहु हो

घरे घरे घुमेली कोसिला रानी गोतिनी बोलावेली हो

गोतनी हमरे मड़इया तरे आव रमइया जी के मुंडन हो 

हमरा बबुआ के गोरे गोरे गाल, केसिया भुइयाँ लोटले रे

ऐसा सुन्दर केसिया भुइयाँ लोटले रे

हजमा धीरे धरे काट हमर बबुआ के केश … …

४.२.२.७ ब्रतबंध

खासकर हिंदू वर्णाश्रम में तागाधारी समुदाय में जनेऊ धारण करने और गैर तागाधारियों में कुलगुरु से गुरुमंत्र लेने के संस्कार को ब्रतबंध कहा जाता है । इस अवसर पर भी गीत-नाद की परंपरा रही है : 

के बाड़े दुनिया के मालिक जनेउवा पहिराएब हे ?

दुनिया के मालिक सुरुजदेव जनेउवा पहिराएब हे ।

धरती पर ठाड़ बाड़े बबुआ जनेउवा जनेउवा बोले हे

दशरथ के चार गो ललनवा मंडप पर सोभे

कहाँ सोभे मुज के डोरी कहाँ सोभे मृगछाला

कहाँ सोभे पिअरी जेनेउवा, मंडप पर सोभे

हाँथ सोभे मुज के डोरी, कम्मर में मृगछाला

कान्हे सोभे पिअरी जनेउवा, मंडप पर सोभे ।

४.२.२.८ विवाह

भोजपुरी समाज में सब से अधिक गीत गाने का अवसर और परंपरा के लिए विवाहोत्सव प्रसिद्ध है । इस संस्कार के लिए घरदेखी, छेंका, तिलक, मटकोर, इमलीघोंटाई, चुमावन, परिछावन, दुआरपूजा, कनिआनिरेखन, सेनुरदान, माथझाँका, बिदाई और कोहबर तक के अलग अलग असंख्य गीत गाने की परंपरा है । ये सभी गीत महिलाओं के कंठ से सुनने को मिलते हैं । इसके साथ साथ तिलकदेउआ और बरिअतिया को खिलाते समय बहुत प्रेम से गाली गाई जाती है । इन गालियों को सुनने के लिए भी खाना की अवधि घंटो तक चलने की परंपरा भोजपुरी समाज में रही है । किंतु लोगों की व्यस्तता के चल्ते अब ये सब लोप हो रही हैं । भोजपुरी लोकगीतों का ये अध्याय इतना विशाल है कि इसी पर खोज करके एक बढ़ियाँ शोधग्रंथ तैयार किया जा सकता है । उदाहरण के तौर पर कुछ पंक्ति : 

केकरा पोखरवा में चेल्हवा मछरिया कवने फेँकले महाजाल

कहवाँ आवले लवङ बनिया आउरो जयफर बनिया हे

कहवाँ से आवे तिलकदेउआ तिलक लेले ठाड़ी भेल हे

एह भइँसुर के टाङे ना पइसिहेन कइसे अङना

लकसी लगाके घिँसिआ लाएब अङना

४.२.२.९ डोमकछ

बिआह में बेटाहा जब बरियात लेकर चला जाता है तब उनके घर की महिलाएँ डोमकछ खेलती हैं । अभिनय के साथ खेला जानेवाला इस खेल में गाया जानेवाला एक गीत का ये कुछ अंश : 

अनारकलिया डोमनी तोर डोम कहाँ गइले ?

डोम गइले बाँस काटे ओतहीं लोभइले

अनारकलिया डोमनी … … …

४.२.२.१० मृत्यु

मृत्यु जीवन की अंतिम सच्चाई और शोकदायी है । किंतु इस समय पर भी भोजपुरी समाज में खासकर बृद्धबृद्धा की मृत्यु के बाद खुर्दक-सहनाई बजाई जाती है जहाँ इस गीत की धुन गुंजती है : 

माई-बाप घेले बाड़ें जड़ीबुटी लेले बाड़ें

हंस के उड़इते केहु ना देखेला हो राम

४.२.३ पर्वगीत

भोजपुरी समाज में अनगिनत पर्व-त्योहार हैं । उन में से कुछ पर्व-त्योहारों के समय संबंधित इष्ट देव-देवियों के स्मरण में गीत गाने की परंपरा रही है ।

४.२.३.१ लाखपाँचो/नागपंचमी

भोजपुरी समाज में नागपंचमी को लाखपाँचो कहा जाता है । ये सावन महिना शुदी पंचमी तिथी को पड़ती है । इस पर्व के अलग अलग तरिके से मनाने की परंपरा होने के बावजूद भोजपुरी समाज में इस पर्व के दिन बिषहर माता को दूध-लावा चढ़ाया जाता है एवं उल्टा सरसो और खड़ा बालू पढ़वाकर उसे गोबर में मिलाकर घर चौकेठा जाता है । इस अवसर पर विषहर माता सहित साँप तथा कनखजुरों से भी अपनी भूल के लिए क्षमा मांगते हुए गीत गाया जाता है : 

ओ नाग कहीं बसहु हो मोर पिआ के ना डँसहु हो … …

४.२.३.२ साउनीपूजा

साउनीपूजा मूलतः कुलदेव-देवी की पूजा है । ये लाखपाँचो के बाद से अष्ठमी के बीच तक किसी एक दिन की जाती है :  खासकर सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को । इस अवसर पर देवी-देवताओं का बिंडी नेवतन गीत गाया जाता है : 

कोपी कोपी बोललन गोरेया बाबा सुन ए सेवक लोग 

हमर गहबर दुभिया उबजी गइले मकरा बसेड़ लेले 

४.२.३.३ जन्माष्ठमी

भादो बदी अष्ठमी को भगवान श्रीकृष्ण की जन्मजयन्ती पड़ती है । इस पर्व को बड़े धुमधाम से मनाया जाता है । खासकर महिलाएँ उपवास बैठती हैं और आधीरात में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ मानकर उसके बाद अन्नजल ग्रहण करती हैं । इस अवसर पर गाया जानेवाला ये एक गीत : 

जब से गइले श्याम मथुरा नगरिया हे

हमनी ग्वालिन के लेवे ना खबरिया हे

आपो ना आवे कृष्णा चिठियो ना भेजे हे

अब ले ना आइल इहाँ कवनो सनेस हे

४.२.३.४ तीज

सावन या भादो सुदी तृतीया को विवाहित महिला द्वारा पति के दीर्घायु, सुस्वास्थ्य के लिए और अविवाहित महिला द्वारा सुयोग्य पति प्राप्ति की कामना के साथ तीज व्रत किया जाता है । इस अवसर पर श्रावणी तीज में अनेक लय और अंदाज में कजरी गायी जाती है और भदैया तीज में शिव-पार्वती के महिमागान गाने की परंपरा है । कजरी के बारे में ऊपर बताया जा चुका है । शिवपार्वती महिमा के बारे में पेश ये नचारी : 

बरवा तोर बउरहवा हे गौरा गुजर कइसे जतव हे

अपने चढ़तव बँसहा बयल पर तोहरा से डोरी घिंचवतव हे

अपने खतव भांग धतूरा तोहरा से भांग पिसवतव हे 

४.२.३.५ चकुचन्ना

चकुचन्ना के प्रसंग का ऊपर उल्लेख किया जा चुका है । इस अवसर पर महिलाओं के बीच शत्राजीत की कथा कहने और गीत गाने की परंपरा रही है : 

एक दिन सतराजीत भाई, पहुँचे वन में जाई ।

४.२.३.६ नाग दुलरुवा

किसी किसी समय चक्की पिसते समय केंचुर गिरने और दही जमाते समय दूध फाटकर साँप के आकार भें होने जैसी अनुभूति को नाग दुलरुवा प्रकट हुआ माना जाता है । ऐसा होने पर भादो महिना में नाग दुलरुवा की भीख मांगकर पूजा करने का प्रचलन है । उस समय एक बहुत चर्चित गीत इस तरह गाया जाता है : 

अपने कारन नाग जाँता में पिसएलऽ

लोगवा के कएलऽ बदनमवे हो मोरा नाग दुलरुवा

अपने कारन नाग दूध में अउँटएलऽ

लोगवा के कएलऽ बदनमवे हो मोरा नाग दुलरुवा

४.२.३.७ जीतिआ

आश्विन बदी सप्तमी और अष्ठमी को जीतिआ मनायी जाती है । ये पर्व महिलाओं द्वारा महिला पूर्वज (पितराइन) लोगों की पूजा आराधना कर अपने बच्चों के सुखद भविष्य के लिए किया जाता है । इस अवसर पर भी गीत गाने की परंपरा रही है ।

४.२.३.८ दशहरा या दशैं

दशैं के अवसर पर गाया जानेवाला झिँझिया गीत की चर्चा ऊपर हो चुकी है । किंतु इस अवसर पर गाया जानेवाला भगतई का गीत भी है : 

तोहरे भरोसे बर्हम बाबा अर्घा उठाइले हो

हो बर्हम बाबा लागि जा न कोखिया रे गोहार 

बर्हम बाबा बिनती करिले हो 

४.२.३.९ दीवाली

दीवाली सामान्यतया पाँच दिन मनायी जाती है । कार्तिक बदी तेरस से सुदी दुतिया तक मनाया जानेवाला इस पर्व में धनतेरस, जमदियरी, देवदियरी, सोहरइया और दोहरइया या भइयादूज अलग अलग तरिका से मनाने की परंपरा रही है । इस अवसर पर गाया जानेवाला दोहा तो अब करीब करीब समाप्त हो गया है जिसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है । किंतु खासकर देवदियरी के दिन लक्ष्मी बन्दना और गोधन बाबा के गीत और भइयादूज का गीत गाने की परंपरा अभी भी साँस गिन रही है : 

दीवाली गीत :  

आज दीवाली मंगलचार

ब्रज में गोपिया मंगल गावत

चौक पुरावत नंदकुमार

आज दीवाली मंगलचार

गोधन गीत : 

गोधन बाबा अइलन पाहुन हो घरे बइठेके दीं

चन्नन काठ के पिढ़इया हो उहे बइठेके दीं

मरस पुत ओही अहिरा के हो इनके दूधवो ना देवे

जिअस पुत ओही अहिरा के हो इनके दूधवा जे देवे

कारी लउर चितकाबर हो सोने मढ़ल मूठ

से लउर लेवेलन धनी राम हो मुदई मारे हिया फुट

कारी लउर … …

४.२.३.१० छठ

छठ कार्तिक और चैत सुदी चतुर्थी से सप्तमी तक मनाया जानेवाला भोजपुरी क्षेत्र का महान पर्व है । इसमें सूर्य भगवान और छठीमाता दोनो के गीत गाये जाते हैं । सब से कर्णप्रिय रहा ये गीत : 

उजे काँच ही बास के दउरवा दउरा लचकत जाय

उजे बाट ही पुछेला बटोहिया ई भार केकरा ही जाय

४.२.३.११ शिवरात

फागुन सुदी चतुर्दशी को महाशिवरात के रूप में मनाया जाता है । इस अवसर पर महिलाएँ ब्रत रखती हैं । इस अवसर पर गाया जानेवाला ये गीत : 

उतरत माघ चढ़त ऋतु फागुन, अरे सखी सब भूखे शिवराती ए लला ।

मिलहु सखिया रे मिलहु सलेहर, अरे मिलीजुली चल शिव पूजे ए लला ।

४.२.३.१२ पचरा

देव-देवियन के सुमिरन को पचरा कहा जाता है : 

कवना केयरिया में दवना मड़ुअवा, कवना केयरिया में धूप हो

आरे कवना केयरिया में बइठे देवी शारदा, धरीके पवनवा के रूप हो

अगिली केयरिया में दवना मड़ुअवा, बिचली केयरिया में धूप हो

पछिली केयरिया में बइठे देवी शारदा, धरीके पवनवा के रूप हो

४.२.३.१३ रामनवमी

आर्य संस्कृति में मर्यादा पुरुषोत्तम माने गए भगवान श्रीराम की जन्मजयन्ती चैत सुदी नवमी को पड़ती है । इस दिन को चैत्र रामनवमी या भोजपुरी में चैतनमी कहा जाता है और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है । इस अवसर पर गाया जानेवाला एक गीत : 

अजोधा में राम के जनम भेल हो रामा चइत शुभ दिनवा

राम के जनम भेल दुनिया आनंद भेल

घरे घरे बाजत बधइया हो रामा चइत शुभ दिनवाँ

४.२.४ अनुष्ठानगीत

विशेष समय पर विशेष जगजाप करने की परंपरा भी भोजपुरी समाज में प्रचलित है । इन अवसरों पर कुछ विशेष गीत गाये जाते हैं ।

४.२.४.१ लखराँव/मधान

शिव-पार्वती आराधना पर आधारित लखराँव और मधान यज्ञ की भोजपुरी समाज में बड़ी अनोखी परंपरा है । लखराँव में सावा लाख पार्थिव शिवलिङ बनवाकर पूजवाया जाता है और मधान में शिव-पार्वती विवाह का रश्म पूरा किया जाता है । इन दोनो अवसरों पर शिव-पार्वती के महिमागान के रूप में प्रसिद्ध नचारी गाने की परंपरा रही है । नचारी भी विभिन्न लय में गायी जाती है । किंतु भोजपुरी समाज इस अवसर पर भी हास्य-व्यंग्य का बौछार करने से नही चुकता : 

कइसे के कटइहें भोला गरीबन के दिन भोला गरीबन के दिन

छीपा त एकेगो देलऽ बेटा देलऽ तीन

खाइते के बेरिया भोला होला छिनाछीन भोला गरीबन के दिन

४.२.४.२ अष्टयाम/अठजाम

आठो याम यानी प्रहर, कहने का मतलब चौबीसो घंटा लगातार चलनेवाला यज्ञ या अनुष्ठान को अष्टयाम या अठजाम कहा जाता है । इसमें माला जाप, हवन और रामचरितमानस पाठ के साथ महामन्त्र के रूप में मानी गयी रामधुन, कृष्णधुन, शिवधुन को अनेक लय में गाया जाता है । भोजपुरी क्षेत्र में प्रचलित कुछ धुन इस तरह हैं : 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

हरि  ॐ राधेश्याम गौरीशंकर सीताराम

जय शिवशंकर गौरीशंकर पार्वती शिव हरे हरे

जय सीताराम सीताराम सीताराम जय सीताराम

बम भोलेनाथ भोलेनाथ भोलेनाथ बम भोलेनाथ

४.२.४.३ पितरनेवतन

कोई अनुष्ठान से पहिले पान-सुपाड़ी भेजकर नेवतने का प्रचलन है : 

पाँच ही पनवा के कोँपड़ सरगे जे बाड़े बर्हम बाबा उनहु के नेवतब हे

पाँच ही पनवा के कोँपड़ सरगे जे बाड़े बिसुन बाबा उनहु के नेवतब हे

उनही सरीखे सातो बहिनी मइया त उनहुँ के नेवतब हे

४.२.४.४ पिंडदान

पितरपक्ष में पिंडदान के समय गाया जानेवाला ये गीत : 

चलले कवन राम गया से गया पिँड़ा पारब हे

पाछे लागल चलेली कवन देइ चलब रउरा संग कहे हे

हमहीं सानब रउरा पारब पीतर आनंद होइहें हे

मड़वाहि गड़ुवा ढरकिहें त पितर आनंद होइहें हे

४.२.४.५ घरपूजा/कुलदेव पूजा

नया घर निर्माण के बाद सामान्यतया सत्यनारायण पूजा करके प्रवेश करने का प्रचलन है । इसी तरह अपनी वंशीय परंपरा अनुसार कुलदेवता की भी पूजा की जाती है । इन में कारीखपूजा, गोविन्दपूजा, सोखापूजा अधिक प्रचलित है । इन अवसरों पर भी विशेष गीत गाने का प्रचलन है । वह खासकर सुमिरन का गीत होता है : 

ए सरग में बसलन गोरेया बाबा उनहू के नेवतब

आईं बाबा अङना हमार कि पूजा राउर करब

ए सरग में बसलन कारीख बाबा उनहू के नेवतब

आईं बाबा अङना हमार कि पूजा राउर करब

४.३ जातिगत गीत

भोजपुरी समाज में कुछ जातिगत लोकगीत की भी उपस्थिति रही है । कहँरउआ, अहिरउआ जैसे गीत तो अब लोप हो चुके हैं । लोप होने के कागार पर रहा धोबी गीत के कुछ अंश : 

४.३.१ धोबी गीत

कवना पोखरवा में झिलमिल पनिआ कि कवना पोखरवा सेवाँर

कवना पोखरवा में चेल्हवा मछरिया कि कवने बिगे महाजाल

राम पोखरवा में झिलमिल पनिया कि लछुमन पोखरवा सेवाँर

सीता पोखरवा में चेल्हवा मछरिया कि रावन फेंके महाजाल

लाली रे घोड़वा पर लाल चढ़ी अइलें कि उजर घोड़ा भगवान

सोने पलकिया में सीया चढ़ी अइली कि चवर डोलावे हनुमान 

४.४ तंत्रगीत

अपनी तांत्रिक सिद्धी प्राप्ति के जरिए अनेक अद्भूत कौतुक करने से लेकर झारफुँक करने के लिए तंत्रगीत की भी भोजपुरी समाज में अनोखी परंपरा रही है । अलग अलग इष्टदेव-देवी के आवाहन के लिए गाया जानेवाला इस गीत को देवास कहा जाता है ।

४.४.१ देवास

देवी-देवता पर आस लगाकर सुमिरन करने के चल्ते इस गीत को देवास कहा गया होना चाहिए । ऐसा गीत दशहरा के समय और कुलदेवता के पूजा के रूप में की जानेवाली गोविन्दपूजा, कारीखपूजा और सोखापूजा के अवसर पर सुना जाता है । इसकी संक्षिप्त चर्चा ऊपर हो चुकी है ।

४.५ गाली/गारी

भोजपुरी लोकगीत की बात करने पर अगर गाली को छोड़ दिया जाय तो वह नून बिना के भोजन समान हो होगा । गाली के दो भाव हैं :  स्‍नेह और क्रोध । क्रोध भाव की गाली तो संसार की हरेक भाषा में मिलती है और भाषा के भी लोक या कथ्य रूप में मिलती है । किंतु स्‍नेह भाव की गाली हरेक भाषा में संभव नहीं है । नव हिंद-आर्य भाषा में भोजपुरी सहित मैथिली, अवधी आदि कुछ भाषाओं में स्‍नेह भाव से गीत गाकर गाली देने की परंपरा रही है । भोजपुरी समाज में खासकर छेंका से लेकर विवाह से दोंगा तक की हरेक विधि और भोजन के समय कुटुम्ब को गीत गाकर गरिआने का प्रचलन है । उसके साथे डोमकछ खेलते समय कोई पुरुष अगर मिल गया तो मानो उनकी खैर नहीं । किंतु अब तो ये प्रचलन लुप्त प्रायः हो चुका है । उदाहरण के तौर पर कन्या निरीक्षण के समय जेठश्री (भइँसुर) को दी जानेवाली गाली का कुछ अंश : 

दहिया देली गुरहेथेके चाट गइलन भइँसुर

मोरा श्याम सुनर धिया के छुछुनर जइसन भइँसुर

पानवा देली गुरहेथेके चिबा गइलन भइँसुर

मोरा श्याम सुनर धिया के छुछुनर जइसन भइँसुर

हँसुली त लइले भँडुआ ओछे ओछे कइसे पेन्हस रे अलरइतिन धिया

तोरा त हऊ भँडुआ सातो पुता हमरा एकेगो अलरइतिन धिया

५. लोकगायन का सामर्थ्य

जब हम सामर्थ्य की बात करते हैं तो इस पर लोकगायन के परिचय के क्रम में ही कुछ बातें आ चुकी हैं । गीत सुनते सुनते बच्चे खाते हैं और सो जाते हैं, महफिल से विदाई गीत सुनकर लोग चलने लगते हैं, पराती सुनकर लोग नींद से उठ जाते हैं आदि आदि । कुएँ में फँसी गाय पर असमय चैता का असर भी बता दिया गया है । पर इतना ही नहीं, बिहुला गाने से बारीस होने, विषहर सुमीरन से साँप का विष समन करने, आल्हा से वीरता की ओर प्रेरणा मिलने का भी भोजपुरी समाज विश्वास करता है ।

आल्हा के बारे में मैंने एक आँखों देखा हाल अपने गुरु स्व. हरिहर यादव से सुना है । मेरे ही गाँव के अदालत यादव राणाशाही के समय वीरगंज जेल में सजा काट रहे थे । वे अपने जमाने के मशहूर आल्हा गायक थे । उनकी सजा खत्म होने को थी । इसलिए उन्हे बन्दी साथियों ने आल्हा सुनाकर जाने को कहा । जेल में ढोलक तो उस वक्त जेल में उपलब्ध होने की बात ही नहीं थी । सो उन्होंने कनेसरा बजाकर आल्हा गाना शुरू किया । ठेका पर उनकी चाटी और उनके गायन से लोग जोश में तो आ ही गए थे, इसी बीच उनके मुख से निकल पड़ा, ‘मार दे धक्का पक्का में पक्का चुरमचुर हो जाय ।’ बस क्या था ! जेल के कमजोर दीवाल तोड़कर कुछ कैदी तो भाग खड़े हुए । इस जुर्म में बेचारे अदालत यादव को आजीवन कारावास के दौरान जेल में ही दम तोड़ना पड़ा ।

खासकर नेपाल के संदर्भ में लोकगायन का ही सहारा लेकर लोक लय पर आधारित गीतों के जरिए कम्युनिष्टों ने अपना संगठन विस्तार किया । देश में कई बार आन्दोलन हुए । संयुक्त जन आन्दोलन, २००६ के प्रतिफल के रूप में अभी हम गणतन्त्र में जी रहे हैं ।

लोकगायन तो हमारी संस्कृति का परिचायक है, हमारी जान है, हमारी पहचान है । सब से बड़ी बात तो ये है कि यह हमें जोड़ने का काम करता है, तोड़ने का नहीं । यह हमे स्वस्थ मनोरंजन देता है, वह भी साफ-सुथरे तरिके से । हाँ यह समयसापेक्ष भी होता है जो बदलते समय के साथ इसमें भी परिमार्जन की आवश्यकता होती है ।

६. चुनौतियाँ

समग्र रूप में राज्य के मूलधार से अलग रही लोक संस्कृति की स्थिति बहुत ही दयनीय है । इसलिए भोजपुरी लोकगायन इसका अपवाद नहीं बन सकता । नेपाल में गोर्खाली संस्कृति से बाहर जाने का तो अभी अभी प्रयास हो रहा है । ऐसे प्रयास होते होते कितनी भोजपुरी सांस्कृतिक धरोहर इतिहास के गर्भ में चली गई तो कितनी अभी संरक्षण की राह जोह रही है । किंतु भोजपुरी के संदर्भ में बात केवल राज्य की नहीं, कुछ अपनी भी बात है जिसके चल्ते हम अपनी संपत्ति अपने गँवा रहे हैं । वर्तमान अवस्था में जो जितना भी शेष है, ह्रासोन्मुख है । रोज रोज घिसती जा रही है । सब से पहले इसके कारण को खोजना होगा । इसे आंतरिक और बाह्य दो तरिके से देखना होगा ।

६.१ आंतरिक कारण

भोजपुरी लोकगायन के लोप होने के आंतरिक कारणो को इस तरह से लिया जा सकता है : 

६.१.१ हीनताबोध

भोजपुरी लोकगायन के लोपोन्मुख होने में सब से पहला कारण है भोजपुरियों के आत्मिक हीनताबोध । भारत में हिन्दी, नेपाल में कथित नेपाली और समग्र में पश्चिमी प्रभाव में अंग्रेजी वातावरण को रोजगार से जोड़कर देखने पर तो भोजपुरी केवल घर में ही सिमटकर रह गई है । यानी यह रोजगार की भाषा, रोजगार की संस्कृति के रूप में स्थापित नहीं रह सकी । इसलिए भोजपुरी बोलकर क्या होगा, भोजपुरी पढ़कर क्या होगा, भोजपुरी गीत गाके क्या होगा भोजपुरी नृत्य कके या देखके क्या होगा जैसे सवाल अभी तक अनुत्तरित हैं । इस अवस्था में खासकर नये पुस्ते के भोजपुरी भाषी अपनी भाषा जब बोलने से ही सकुचाते हैं तो उसके लोकगायन की अवस्था को तो लोपोन्मुख होना ही है और हो रहा है ।

६.१.२ संदर्भहीनता

विज्ञान और प्रविधि में आई क्रांति के चल्ते अब जीवन भौतिक रूप से बहुत सुगम हो गया है तो मानसिक रूप से बहुत कठिन भी । फलतः अब ढेंकी-जाँत चली गई, दउनी विस्थापित हुई, मौसमी की जगह बेमौसमी खेती का प्रचलन बढ़ गया । वातावरण में आए बदलाव से अपना अरोस परोस बंजर हो गया । इसके साथ साथ नये तरिके से एक ओर बेरोजगारी बढ़ी तो विदेशों में रोजगारी का अवसर भी बढ़ा । इसकी वजह से अब समूह में काम करने की अवस्था जाती रही । तब भला कुटावन, जाँतसारी, ढोलन, बिरहा आदि गाने की फुर्सत और संदर्भ कहाँ शेष रहे ? इसलिए संदर्भहीनता के कारण भी भोजपुरी लोकगायन की प्रस्तुति की संभाव्यता का घटना स्वाभाविक ही दिखता है ।

६.१.४ लैंगिक पूर्वाग्रह

ऊपर बताया जा चुका है कि महिला के घर से बाहर ना निकलने की परंपरा और निकल भी गई तो महिला व पुरुष किसी समारोह में खासकर गीत-नाच के समय साथ बैठने की परंपरा नहीं रहने के चल्ते लौंडा के जरिए महिला की भूमिका नृत्य में निर्वाह की गई देखी जाती है । इसी तरह महिलाओं के बीच के भडाँस निकालने के हिसाब से शुरू हुआ जाट-जटिन और डोमकछ में पुरुष की भूमिका भी महिला द्वारा ही की गई दिखती है । इसके बावजूद इस समाज को रामायण और महाभारत देखकर भी इस बात पर सोचने की अभी शायद फुर्सत नहीं कि उन सभी सिरियलों में भी तो महिला की भूमिका में रही महिलाएँ प्रतिष्ठित ही हैं । इतना ही नहीं, कोई महिला अगर कहीं मंच पर चढ़कर कुछ कहती है तो हैसियत में सामान्य है तो सामने ही और नहीं तो पीठ पिछे लाञ्छना तो लगाना ही है इस समाज को । भला ऐसा करने पर अपनी धरोहर का संरक्षण कैसे होगा ?

६.१.४ जातीय पूर्वाग्रह

भोजपुरी समाज परंपरागत रूप में हिंदू वर्णव्यवस्था के तहत रहा है । बाद में धर्म परिवर्तन के बावजूद मुसलमान और इसाई लोगों में भी इसका छाप अभी बाँकी ही है । इस अवस्था में ये गानाबजाना करने का काम कथित शूद्र जाति के ऊपर लोगों ने छोड़ दिया । अगर शूद्र नहीं भी है तो आर्थिक रूप से विपन्न लोगों को गानाबजाना किया देख जाता है । कुछ जातियों में तो नाच कइला पर भात छाँटने का भी प्रचलन देखा गया है । कथित उँच जाति के संपन्न लोग अगर गानाबजाना सिखते भी हैं तो पेशेवर नहीं बन सकते । भोजपुरी समाज में परतोक का रूप में ये सवाल अभी भी पुछा जाता है :  का ब्राह्मण नाची आ शूद्र देखी ? इतना ही नहीं, अठजाम आदि यज्ञ में फिर कुछ जाति को ना खटाने या मंच पर कथित नीच जाति के होने से कलाकार को जूता पहनकर ना जानेदेने जैसे प्रचलन भी इसके लिए जिम्मेदार रहे हैं ।

६.१.५ सामाजिक पूर्वाग्रह

खासकर नाचगाना में लगे लोगों के सन्दर्भ में सामाजिक पूर्वाग्रह भी है । अगर महिला लगती है तब तो वह बदचलन करार कर ही दी जाती है, किंतु पुरुष भी लागता तो उसे चरित्रहीन समझने का सामाजिक पूर्वाग्रह रहा है । उदाहरण के लिए अगर कोई लवंडा हो गया तो उसे मउमेहर ही समझने और उसके साथ हर समय इसी तरह का व्यवहार करने की चाहना भी देखी गई है । इसके साथ साथ समारोह में उन लोगों के साथ सौतेला व्यवहार भी देखा गया है । बरात में बरातियों का आदर सम्मान के साथ और नचनिया-बजनिया लोगों को लात से बहारकर बँचाखुँचा खिलाते भी देखा जाता है ।

६.१.६ मुफ्त मनोरंजन

सबकुछ खरीदकर किंतु गानाबजाना बिना मूल्य देखने की परंपरा भी भोजपुरी लोकगायन के लोपोन्मुख होने का कारण है । फिल्म के टिकट खरीदेंगे, टिभी खरीदेंगे, डेक खरीदेंगे, किंतु नाच-गाना के लिए गवैया-नचनिया का भार सामूहिक ना होकर कोई धनी धरवइया का मूह लोग ताकते रहेंगे । इससे अगर कोई कुछ करना भी चाहता तो उसके सशुल्क श्रोता और दर्शक नहीं मिलते । इसलिए बहुतो नाच के गिरोह जोतनेवालों को दिवालिया होते भी देखा गया है ।

६.२ बाहरी कारण

भोजपुरी लोकगायन के लोप होने का बाहरी कारण भी कम जिम्मेवार नहीं है । ऐसे कुछ कारणों पर भी चर्चा करना उचित होगा ।

६.२.१ बहुभाषी देश :  एकभाषी राज्य

नेपाल की अवस्था आदिम काल से ही बहुभाषिक, बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक रही है । किंतु वर्तमान नेपाल की शुरूवात से लेकर आज तक राज्य का चरित्र एकभाषी, एकधार्मिक, एक सांस्कृतिक है । समग्र रूप में खस भाषा, गोर्खाली संस्कृति, खसकृत हिन्दू धर्म नेपालीत्व के पर्याय बनकर रह गए हैं । राज्य नियन्त्रित शिक्षा और संचार आज तक नेपाली बनही नहीं पाए हैं । इस अवस्था में खसेतर भाषा, संस्कृति और धर्म के आज के संघीय लोकतान्त्रिक गणतंत्र नेपाल में भी उत्थान के लिए कोई ठोस नीति बनी नहीं है । अगर कुछ नीतिगत प्रयास भी किया गया तो वह व्यवहार शुन्य है । इस कारण खसेतर समुदाय के लोग निर्णायक अवस्था में राज्य के निकायों में नहीं हैं । उसके चल्ते भोजपुरी लोकगायन भी लोपोन्मुख हो गया है ।

६.२.२ आधुनिकता

अपनी परंपरा से अलग हटना आज आधुनिकता की परिभाषा हो गई है । ये निश्चित बात है कि परंपरा के तहत लकीर का फकीर बनने से तरक्की नहीं होगी । किंतु इतिहास की नीव पर वर्तमान खड़ा होकर सुखद भविष्य का मार्गचित्र तैयार करता है । किंतु आधुनिकता के नाम पर नेपाल के इतिहास खस-विजय इतिहास बनकर रह गया है । खसेतर इतिहास को आज तक पाना में भी नहीं समीटा गया है । इसलिए हमारी हालत गिद्ध जैसा हो गया है । उसके आगे अस्सी कोस दूर तक दिखता है किंतु अपनी पूँछ से लिपटी उलझन नहीं सुझती । हमें काठमांडू से वाशिंगटन तक दिखता है किंतु गौर, कलैया, वीरगंज, भैरहवा नहीं दिखते । कारण ये है कि हम अगर इधर देखते हैं तो गवाँर कहे जाते और उधर देखते तो देखते ही रह जाते हैं । इसकी शुरुवात गाँव के स्कूले से ही हो रही है ।   

६.२.३ भूमंडलीकरण

भूमंडलीकरण आज सब से अधिक संभाव्यता लेकर आया दिखता तो है परंतु बहु-सांस्कृतिकता के खातिर सब से बड़का प्रलय बनकर । इसके तहत प्रतिलिपि अधिकार से हम पूरा के पूरा बेखबर रहते हैं तब तक हमारी धरोहर या तो समाप्त हो जाता है या इसका स्वामित्व कोई और के नाम होकर रह जाता है । आज इस भूमंडलीकरण का असर है कि हम बॉलीउड से हॉलीउड तक की फिल्में या सिरियल पर कला के कारण तो नहीं, बरन् उस पर हुई लगानी के कारण अनाहक आकर्षित हो रहे हैं । अपनी जीन्दगी में ‘लड़ाइलऽ अँखिया हो लवंडे राजा’ से ‘लवंडा बदनाम हुआ’ और अब ‘मुन्नी बदनाम हुई’ तक सुन चुके हैं । ‘लड़ाइलऽ अँखिया हो लवंडे राजा’ बहुत कम लोग सुनत रहे ‘किंतु मुन्नी बदनाम हुई’ धुम मचा रही है । आज शोभनयका बंजारा किसी को याद है या नहीं, किंतु टाइटानिक सभी बच्चों की जुबान पर है ।

६.२.४ अश्लीलता

भोजपुरी लोकगीतों को गर्त में मिलाने के लिए सब से अधिक जिम्मेवार है अश्लीलता । भारतीय संगीत उद्योग से निकले भोजपुरी गीत या फिल्म में रही अश्लीलता के चल्ते अभी गीतनृत्य के क्षेत्र में भोजपुरी अश्लीलता के पर्याय बनकर रह गई है । पारिवारिक वातावरण में बैठकर सुनने और देखने में आए संकोच के साथ हमार अपनी सांगीतिक सामग्री अभी दिनोदिन हाथ से निकलती जा रही है । सवाल करने पर उस में लागे लोगों की ओर से जवाब आता है कि लगानी उठाने के लिए इसके अलावा कोई उपाय नहीं है ।

६.२.५ विरान शैक्षिक वातावरण

घर से निकलते ही भोजपुरी समाज, क्षेत्र, संस्कृति के बारे में एक लब्ज भी ना रही शैक्षिक सामग्री के माध्यम से शिक्षा दी जा रही है । कैट, मैट, सैट जेतना जल्दी बच्चे बोलते हैं ओतने योग्य माने जाने लगे हैं । ऐसे विरान शैक्षिक वातावरण में भोजपुरी लोकगायन का संरक्षण कैसे संभव होगा ?

६.२.६ विकृत और विक्षिप्त साहित्य सृजन

आधुनिक साहित्य सृजन में भी समस्या देखी जा रही है । भोजपुरी और गैरभोजपुरी दोनो तरह के साहित्य में भोजपुरी संस्कृति के विकृत रूप की प्रस्तुति रही भी देखी गई है । 

७. समाधान का उपाय

सब से पहला सवाल है :  क्या वर्तमान अवस्था में भोजपुरी के लोकगायन का संरक्षण और पुनर्स्थापन करना जरूरी है । इस सवाल के पीछे भी कुछ तर्क है । खासकर ये संसार परिवर्तनशील है । जहाँ उत्पत्ति है वहाँ विनाश भी । आज तक नजाने कितनी ऐसी भाषा और संस्कृति उगी होगी उर डूब भी । आखिर काम चलता ही आ रहा है । तो क्यों बँचाई जाय ? हो सकता है उत्तर आने की जरूरत नहीं । किंतु जीवन में जिस तरह खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने में विविधता चाहिए, वैसेही अग्रगामी सोच के लिए भी पहिले अपनी जगह से सोचने के लिए जीवन का सरस होना जरूरी है और उसके लिए सांस्कृतिक विविधता का रसास्वादन भी करना जरूरी है । उस हिसाब से भोजपुरी संस्कृति अपनेआप में विविधता से भरी पड़ी है । अगर इसे नहीं बँचाई गई तो यह भी संभावना है कि विविधता को समाप्त करेनेवाला पश्चिमी जगत कल हम से ये सशुल्क सीखे पर मुहताज कर दें । आज एकल-लयात्मक जीवन से वे लोग तंग हो रहे हैं । अगर हम भी अपने जीवन को एकल-लयात्मक बना लेंगे तो सब से उत्तम प्राणी के रूप में रहा मानव समाज भी संकट में पड़ सकता है । इसके साथ साथ कहा जाता है, जहाँ दुःख वहाँ दवा और जहाँ इच्छा वहाँ उपाय । त भोजपुरी लोकगायन को बँचाने का उपाय भी ढूंढना कैसे संभव नहीं होगा । इसलिए हमें अपनी सांस्कृतिक धरोहर जो लुप्त हो गई है उसे खोजना पड़ा, जो लोप होने जा रही है उसे बँचाना पड़ा और समग्र में पुनर्स्थापन करते जाना पड़ा ।

जैसे ऊपर भोजपुरी लोकगायन की वर्तमान लोपोन्मुख अवस्था के कारणों सब पर विचार किया गया वैसे ही संरक्षण और पुनर्स्थापन के सवाल पर भी उसी तरह से विचार करना पड़ेगा । यानी संरक्षण और पुनर्स्थापन के भी आन्तरिक और बाह्य दो तरह के उपाय अपनाना जरूरी है ।

७.१ आन्तरिक उपाय

भोजपुरी लोकगायन के संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए आंतरिक उपाय को इस तरह से लिया जा सकता है : 

६.१.१ गरिमाबोध

पहिले अपनी जाति, उपाधि सहित की पहचान बताना लोग बेठीक समझते थे । किंतु नेपाल के संदर्भ में मयलपोश लगाकर देखा गया, खसभाषा और गोर्खाली संस्कृति मानकर भी देखा गया, नेपालीय विश्वविद्यालय से उपाधि हासिल करके भी देखा गया । खसेतर समुदाय आज तक नेपाली नहीं बन सके । मधेशी आखिरकार मधेशी ही बनकर रह गये । तब तो एकही परिणाम आया, दुबिधा में दोनो गये ना हरि मिला ना आराम । खुदको तो बिसर ही गए, दूसरों को अपनाने की कोशीस भी नाकाम रही । इसलिए अपना इतिहास, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा पर गर्व करते हुए भोजपुरियों सहित सभी भाषाभाषियों के लिए ये पहली शर्त है कि हम अपना लोकगीत गाते-सुनते देखत गरिमाबोध करें ।

६.१.द्द सांदर्भिकता

सामयिक परिवर्तन के कारण ओझल हुए संदर्भ को वर्तमान से जोड़कर देखना शुरू करें । इस अर्थ में हमारी विराशत में आए लोकगीतों को सांदर्भिक बनाते जाने का प्रयत्‍न भी करें । इस संबंध में एक बात को स्पष्ट करना जरूरी है । वो ये कि आज के दिन में राजनीतिक-अर्थशास्त्रीय मान्यता में परिवर्तन की आवश्यकता है । हो सकता है आज के लोकतंत्र, गणतंत्र, साम्यवाद में विगत की दासप्रथा से सामंती अर्थ-राजनीतिक परिवेश में निर्मित ये लोक-सांस्कृतिक धरोहर मूल्यहीन लगती हो । किंतु दार्शनिक हिसाब से आदर्शवादी लोगों को शतप्रतिशत निकृष्ट और भौतिकवादी लोगों को शतप्रतिशत उत्कृष्ट मानना भी जल्दबाजी होगी । श्रीमद्भागवत में सुशीला की अर्थ-राजनीतिक मान्यता के बराबर भी आज के साम्यवादी नेतृत्व ईमान्दार नहीं बन सका है । इस यथार्थ से मूह मोड़ा नहीं जा सकता । कुछ दिन के पश्चिमी अभ्यास के बाद बहुत हद तक पूर्वीय मान्यता अनुसार अन्तर-पुस्ता संयुक्त परिवार को सारे विश्व में फिर से स्थापित करने की आवश्यकता महशुस हो रही है । अतः हमारी लोक-संस्कृति के तहत भोजपुरी सहित अन्य भाषाओं के लोकगीतों का संदर्भ समाप्त नहीं हुआ है ।

७.१.३ लैंगिक समानता

कहना नहीं पड़ैगा पुरुष और नारी की सहभागिता अगर वंशवृद्धि के लिए बराबरी में है तो महिलाओं को मनोरंजन में सर्जक, प्रस्तोता, दर्शक और श्रोता हर भूमिका में बराबर का हिस्सेदार बनाएँ । नहीं तो विकलांग समाज की तरक्की संभव नहीं है ।

७.१.४ जातीय संगति

भोजपुरी लोकगायन को जातीय कारण से सीमित नहीं करें । इसके खातिर जो आगे बढ़ता है उसे सहयोग करें, प्रोत्साहित करें । कम से कम निरुत्साहित नहीं करें ।

७.१.५ सामाजिक सम्मान

संस्कृतिकर्मियों को सामाजिक रूप में सम्मानित दृष्टि से देखने के साथ साथ उनके प्रति मर्यादित व्यवहार करें ।

७.१.६ सशुल्क मनोरंजन

मनोरंजन के हरेक साधन को जब आप सशुल्क प्रयोग करते हैं तो लोकगायन की प्रस्तुति का भी सामूहिक रूप से सशुल्क आयोजन करें ।  

७.२ बाह्य उपाय

भोजपुरी लोकगायन के संरक्षण और पुनर्स्थापन के बाह्य उपायों का और सशक्त बनाना जरूरी है । ऐसे कुछ उपायों पर भी चर्चा होनी चाहिए ।

७.२.१ बहुभाषी देश :  बहुभाषी राज्य

बहुभाषी देश में राज्य को भी बहुभाषी बनने के अलावा और कोई चारा नहीं । अतः भाषा-संस्कृति के संरक्षण के लिए राज्य-प्रायोजित संस्थाओं में विभिन्न भाषाभाषी विज्ञों का समानुपातिक-समावेशी प्रतिनिधित्व कराना होगा तो उनके आयोजन में होनेवाला कार्यक्रमों को भी समानुपातिक समावेशी होना पड़ेगा ।

७.२.२ क्रमबद्ध आधुनिकता

परंपरा के सकरात्मक पक्ष के संरक्षण के साथ क्रमबद्ध रूप में आधुनिकता की ओर समाज को ले जाने के लिए राज्य को ठोस नीति बनाकर लागू करना होगा । इस तरह सम्बन्धित भाषाभाषी समाज के लिए भी लोकसंस्कृति के सकारात्मक पक्ष की नीव पर आधुनिक संस्कृति निर्माण की ओर राजनीतिक नेतृत्व की ओर से मार्गचित्र बनना आवश्यक है ।

७.२.३ स्थानीयकरण से अंतरराष्टीयकरण की यात्रा

भूमंडलीकरण की यात्रा त्रिशंकु होकर सफल होना संभव नहीं है । इसके खातिर राज्य की ओर से संस्कृति के क्षेत्र में स्थानीयकरण पर पहले जोड़ देकर उसके बाद राष्ट्रीयकरण और अन्तरराष्ट्रीयकरण करते भूमंडलीकरण की ओर आगे बढ़ना पड़ा । इससे सूक्ष्म पहचान और बृहत पहचान के बीच में तादात्म्य बनेगा और हरेक व्यक्ति को उसकी अन्य संपत्ति की तरह सांस्कृतिक संपत्ति को भी अन्तरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने का मौका मिलेगा ।

७.२.४ सलीलता

सलीलता और अश्लीलता का सीमांकन करने की ओर राज्य को आगे आना होगा । इसके खातिर लैंगिक समानता के आधार पर महिला और पुरुष की समान सहभागिता रही सांस्कृतिक सामग्री निर्माण को राज्य की ओर से प्रोत्साहन देना पड़ेगा । राजनीतिक नेतृत्व को भी इस विषय को प्राथमिकता में रखना होगा ।

७.२.५ घरेलु शैक्षिक वातावरण

मातृभाषा और स्थानीय शैक्षिक सामग्री के प्रयोग पर आधारित बहुभाषी शिक्षा से स्कूल शुरू कराने के लिए राज्य को नीति बनानी होगी जहाँ अपनी स्थानीय सांस्कृतिक सामग्री से सब से पहिले नया पुस्ता परिचित हो सके । ये वातावारण सांस्कृतिक धरोहर को पुस्तांतरित करता जाएगा ।

७.२.६ स्वस्थ साहित्य सृजन

साहित्य अगर विकृत हो गया तो उसका परिणाम विग्रह के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता । अतः मातृभाषी स्रष्टा से हों या अन्य से, किसी भाषा में सिर्जित साहित्य में किसी समुदाय की संस्कृति को तोड़मरोड़कर विकृत दिखाने के दुस्प्रयास से बँचना बुद्धिमानी होगी ।

८. उपसंहार

ऊपर के समाधान के उपायों को दो तरह से देखा जा सकता है :  तत्कालीन और दीर्घकालीन । तत्कालीन उपाय के रूप में आज के कार्यक्रम जैसे कार्यक्रमों की स्थानीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय रूप में निरंतरता आवश्यक होगी । इन में भी सब सानो के डेढ़ो सेर ना करके, मिहीन रूप में अलग अलग विधा के अलग अलग विषय पर बहस-विमर्श की शुरूवात जरूरी है । उसी तरह दीर्घकालीन उपाय के तौर पर राज्य की पंचवर्षीय योजना में भाषागत, क्षेत्रगत और सांस्कृतिक समुदाय की पहचान को ऊपर उठाने के हिसाब से लोक-संस्कृति उत्थान की दीर्घकालीन योजना समावेश कराने के लिए योजना आयोग में संस्कृतिविद् और संस्कृतिकर्मी की सीधी पहुँच को सहज करना होगा ।

रही बात इस कार्यपत्र के संबंध में, तो ऊपर प्रस्तुत लोकगीत और लोकनृत्य की हरेक अलग अलग विधा पर ऐसा अलग अलग कार्यपत्र बनाकर अन्तरक्रिया कराई जा सकती है । इसके साथ साथ ये कार्यपत्र हिन्दू वर्णव्यवस्था में रहे भोजपुरी समाज में मिली सामग्रियों को ही अति संक्षेप में कुछ दृष्टांत के साथ तैयार किया गया है । भोजपुरी समाज के मुस्लिम, बौद्ध और इसाई जैसे अन्य धर्मावलम्बियों के बीच भी ऐसी अनगिनत सामग्रियाँ ओझल पड़ी हो सकती हैं । इसलिए भोजपुरी लोकसंस्कृति के अथाह सागर से अपने दुर्बल सामर्थ्य के करण एक लोटा पानी के रूप में कुछ सामग्री निकालकर भोजपुरी लोकगायन पर ये अति संक्षिप्त चर्चा करने का प्रयास है । इस कार्यपत्र पर टिप्पणीकर्ता सहित गोष्ठी में शामिल अपने सभी लोगों की सलाह और सुझाव इस प्रयास को और समृद्ध करेंगे ।

एक और बात कि अब लोक संस्कृति के सबल हिस्से के रूप में रहा लोकगायन को श्रव्य-दृश्य वैज्ञानिक प्रविधि के जरिए संरक्षण और पुनर्स्थापन करना सब से उत्तम विकल्प है । इस ओर समूचे संचार माध्यमों का अभी से ही जुटना श्रेयष्कर होगा ।

अन्त में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, हिन्दी विभाग द्वाया आयोजित इस समारोह के लिए विश्वविद्यालय, विभाग और खासकर इस कार्यक्रम के संयोजन की जिम्मेदारी में रहे प्राध्यापक वशिष्ठ द्विवेदी, हमारे अग्रज अरुणेश नीरन के साथ साथ सभी आयोजक मित्रों के प्रति आभार प्रकट करते हुए धन्यवाद देना चाहता हूँ ।

संदर्भ सामग्री : 

  • अश्क, गोपाल (वि. सं. २०६२) भोजपुरी जनजीवन र संस्कारगीत, नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठान द्वारा २०६२/२/३ में आयोजित गोष्ठी में प्रस्तुत कार्यपत्र ।
  • कुमार, अशोक (२०११), भोजपुरी लोकगीत, कविता कोश, www.kavitakosh.org ।
  • ठाकुर, गोपाल (वि. सं. २०६२) भोजपुरी जनजीवन र संस्कारगीत :  एक संक्षिप्त टिप्पणी, नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठान द्वारा २०६२/२/३ में आयोजित गोष्ठी में श्री गोपाल अश्क द्वारा प्रस्तुत कार्यपत्र पर टिप्पणी ।
  • तिवारी, हंसकुमार और राधावल्लभ शर्मा (१९७७) भोजपुरी संस्कार-गीत, पटना, बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद ।
  • दीक्षित, अक्षयवर (१९९१) भोजपुरी-निबन्ध, सीवान, भोजपुरी विकास मण्डल ।
  • दीक्षित, अक्षयवर (१९९४) भोजपुरी लोकगीत के भुलात-विसरत अंश :  पचरा, डुमरी कतेक दूर (सं. अक्षयवर दीक्षित और डॉ. तैयब हुसैन पीड़ित), सीवान, अखिल भारतीय भोजपुरी भाषा सम्मेलन ।
  • शांडिल्य, राजेश्वरी (१९९९) भोजपुरी गीतों का मर्म तथा अन्य निबंध, लखनऊ, अखिल भारतीय भोजपुरी परिषद् (उ. प्र.) ।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग द्वारा जनवरी ३०/३१, २०१४ को आयोजित “लोक संकृति : सामर्थ्य और चुनौतिया” विषयक संगोष्ठी मे  प्रस्तुत कार्यपत्र ।

 

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