मकर संक्रांति/ खिचड़ी

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    मकर संक्रांति/खिचड़ी
    मकर संक्रांति/खिचड़ी

    खिचड़ी खइला पर पेट के कवनो हानि ना उठावे के पड़ेला। एहीसे हलुक भोजन शायदे कुछु दोसर होई। ई एगो लोकप्रिय खाना ह जवना के दाल आ चाउर के एक्के साथे उबाल के पकावल जाला। औरतन सब स्वादानुसार अउरिओ आइटम डालें। ई खिचड़ी पेट के रोगी लोग खातिर विशेष रूप से उपयोगी ह। ई त एकर पाचकीय आ औषधीय गुण भइल बाकिर हमनी भोजपुरिया समाज के विराटता के दृष्टि से देखल जाव त ई एगो परब विशेष के पकवान विशेष ह। आज खिचड़ी के दिने छप्पन भोग एकरा सामने मात खा जाला।

    नेपाल के भोजपुरिया क्षेत्र समेत औरी क्षेत्रन में मकर संक्रान्ति के परब के खिचड़ी के नाम से जानल जाला एही तरे थारु समुदाय यी परब के आपन नाया साल के रूप मे माघी नाम से बड़ी धूम धाम से मनावे ले लोग । एह दिन खिचड़ी खइला के विशेष रूप से प्रचलन ह। वइसे त गाहे-बेगाहे लोग पता ना कवना-कवना प्रकार के खिचड़ी पकावेला लोग, जवना के राजनीति, कूटनीति, पारिवारिक ढाँचा, सामाजिक सोच आ वैश्विक संबंधन के साथओ सिद्ध कइल जा सकल जाता, बाकिर जब बात मकर संक्रांति के दिन के होखे त आज लोग खिचड़ी बनइबो करेला आ भगवान सूर्य देव के प्रसाद स्वरूप अर्पितो करेला। सूर्य देवो आजु के दिने अपना भक्तन से मिलल खिचड़ी के स्वाद बड़ा आनंद से लेलें। काहें कि आजु केदिन खिचड़ी बनावे आ प्रसाद स्वरूप देवाता लोग के अर्पित करे के परंपरा शुरू करे वाला भगवान शिव जे मानल जालें। रउरा साल भर में भले केतनों खिचड़ी खइले होखब बाकिर मकर संक्रांति के दिन जइसन खिचड़ी के स्वाद खाली आजुए मिल सकेला।

    एह परब-त्योहारन के सबसे सुखद आनन्द लइकाईं में आवे।  बाद में त ऊ सुखद पल खाली ईयादे रहि जाला। समय के बवण्डर में जीवन जीये खातिर पता ना आदमी के कवना-कवना घाट पर भटके के पड़ेला। आजु के दिने हमरा अपना लइकाईं के खिचड़ी, जे के मकर संक्रांतिओ कहल जाला, कई कारने ईयाद आ जाला। नहइला के कारने, खइला के कारने, पहिनला के कारने। भले जाड़ के कारने अउरी दिने ना नहाये के मन करे, बाकिर मकर संक्रांति के दिने आले सबेरे नींद खुल जाव। पानी गरम बा कि ना, बाबुजी के लाख डाँट आ माई के नौ निहोरा के पहलही नहाये के  मूड बन जाव। नहाते माई दौउरी में चाउर, भांटा आ लाई (धोंधा), तील के लड्डू, आलू मरीचा, नमक आदि छूये के ध दें।  हम लपक के ओहिजा पहुँची। छू के चढ़ावल खिचड़ी के चाउर के बनल  गरमागरम खिचड़ी खाईं आ फेर खेत से तुर के आइल गोभी, नकिया के निकालल गइले आलू के गरमागरम सब्जी के साथ लाई के स्वाद के तरे बिसारल जाव। ई त लइकाईं में खिचड़ी के दिन के भोगल यथार्थ के चित्र  ह, बाकिर एह खिचड़ी चाहे मकर संक्रांति के सामाजिक मान्यता आ लोक स्वीकृतिओ कम महत्त्वपूर्ण ना ह ।
    मानल जाला कि भारत के उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनावे के परंपरा के शुरूआत भइल रहे। एही कारने उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति के खिचड़ीओ पर्व कहल जाला। खिचड़ी बनावे के परंपरा के शुरू करे वाला बाबा गोरखनाथ रहलें। बाबा गोरखनाथ केे भगवान शिव के अंश मानल जाला। कथा ह कि खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगी लोग के खिलजी से संघर्ष करे कारन भोजन बनावेे के समय ना मिल पावे। एह कारनेे योगी लोग अक्सर भूखे रह जायें आ कमजोर होखे लागल लोग। ई समस्या के हल निकालने खातिर बाबा गोरखनाथ दाल, चावल आ सब्जीअन के एक्के साथे पकावे के सलाह दिहलें। ई व्यंजन बड़ा पौष्टिक आ स्वादिष्ट रहे।  ओहसे शरीर के तुरंते उर्जा मिले। नाथ योगी लोग के ई व्यंजन काफी पसंद आइल। बाबा गोरखनाथ एह व्यंजन के नाव खिचड़ी रखलें। झटपट बने वाली खिचड़ी से नाथयोगी लोग के  भोजन के समस्या के समाधान हो गइल आ खिलजी के आतंक के दूर करे में ऊ लोग सफल हो गइल। खिलजी से मुक्ति मिलला केे कारने गोरखपुर में मकर संक्रांति के विजय दर्शन पर्व के रूप में मनावल जाला।

    गोरखपुर स्थिति बाबा गोरखनाथ के मंदिर में मकर संक्रांति के दिने खिचड़ी मेला आरंभ होला। एह मेला में बाबा गोरखनाथ के खिचड़ी के भोग लगावल जाला आ प्रसाद के रूप में वितरित कइल जाला।
    शास्त्रानुसार, मकर संक्रांति के दिने सूर्य देव धनु राशि से निकलके मकर राशि में प्रवेश करेलें आ मकर राशि के स्वामी शनि देव हवें। शनि देव जी सूर्य देव के पुत्र भइलो पर सूर्य से शत्रु भाव राखेलें। एह से शनिदेव के घर में सूर्य के आगमन के बेरा शनि देव उनका के कष्ट ना दें, एहीसे तिल के दान आ सेवन मकर संक्रांति में कइल जाला। मान्यता त इहो ह कि माघ मास में जवन आदमी रोजो भगवान विष्णु के पूजा तिल से करेला, ओकर सगरो कष्ट दूर हो जाला। मान्यता त इहो ह कि आजु के दिने गंगा, यमुना आ सरस्वती के संगम प्रयाग में सब देवी-देवता आपन स्वरूप बदलके स्नान करे आवेलें। एही से आजु के दिने दान, तप, जप के विशेष महत्त्व ह।

    मकर संक्रांति में चावल, गुड़, उड़द, तिल आदि के खाना में मिलावल जाला, काहें कि ई सब पौष्टिक भइला के सथवे दे हके गरम राखे वाला ह।  आजु के दिन ब्राह्मण लोग के अनाज, कपड़ा, ऊनी कपड़े, फल आदि दान क के देही के व्याधि-कष्ट से मुक्ति पावल जाला। दीर्घायु आ निरोगी रहे खातिर रोगी के आजु के दिने औषधि, तेल, आहार दान करे के चाहीं। सुरुज-देव के उत्तरायण के राशि मकर में प्रवेश करे के साथवे देवता लोग के दिन आ पितर लोग के रात के शुभारंभ हो जाला। एकरा सथवे सब तरह के मांगलिक कार्य, यज्ञोपवीत, शादी-विवाह, गृहप्रवेश आदि आरंभ हो जाला। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश पृथ्वी वासियन खातिर वरदान ह। कहल जाला कि सब देवी-देवता, यक्ष, गंधर्व, नाग, किन्नर आदि एह अवधि में तीर्थराज प्रयाग में एकत्रित होके संगम तट पर स्नान करेलें। श्री तुलसीदास जी रामचरित मानस में लिखले बानी –
    ‘माघ मकर रबिगत जब होई।
    तीरथपति आवहिं सब कोई।।
    देव दनुज किन्नर नर श्रेंणी।
    सादर मज्जहिं सकल त्रिवेंणी।।’
    खैर, मन के नचावत, दउरावत ई त बुझाइए जाला कि लइकाईं के सब बात अनेरे ना ईयाद आवेला। जब जीवन के रास्ता पर अनुभव के उपहार आ ठोकर मिलेला तब लइकन खातिर भविष्य के कल्पना वाली बात ईयाद आ जाला आ ओही ईयाद में एक बेर फेर से दीदी-भैया के साथे थाल में आगे आइल खिचड़ी के देखके मन गावे लागेला –
    ‘खिचड़ी के खींचखाँच, फगुआ के बरी।
    नवमी के नौ रोटी, तब पेट भरी।।’

    केशव मोहन पाण्डेय

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