रमजान मुबारक !

अशोक कुशवाहा

मुसलमान समुदाय के महान परव रमजान आजू से शुरु हो रहल बा । एक महिना तकले चलेवाला रमजान मे मुसलमान धर्मावलम्बी लोग उपवास करेला लोग । जेकरा के ‘रोजा’ कहल जाला । बियफे से सुरु होखे वाला रोजा पर आपन वीरगंज परिवार के तरफ से मुस्लिम भाइ-बन्धु लोग के पवित्र महिना रमजान के अवसर पर समूचे मुस्लिम माई-बहिन, भाई-बंधु लोग में  शुभकामना व्यक्त करत बा । रउआ के रमजान मुबारक !

इस्लामिक कैलेंडर में ९वा महिना रमजान के महिना होखेला । चाँद के आधार पर बनल ई कैलेंडर में २९ चाहे ३० दिन होखेला। एह हिसाब से अगर जोड घाटाव कइल जाला त अगला रमजान १० दिन कम होंके शुरू होखेला । इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से सन २ हिजरी में अल्लाह के हुकुम से इस्लाम धर्मी लोग खतिरा रोजा रखे के जरुरी अर्थात फर्ज कईल गईल । ईहे महिना में शब-ए-कदर में अल्लाह इस्लामी धर्मी लोग के कुरान अर्थात ज्ञान के भण्डार देहलन । तबे से हर इस्लाम धर्मी लोग ई महिना के रमजान के महिना मान के रोजा रखल शुरू कईलख लोग ।

इस्लाम धर्म के पांच गो फर्ज (नमाज, जकात, कलाम, हज औरी रोजा) में से एगो रोजा भी ह । पबित्र रमजान के महिना में हर इस्लाम धर्मी के अनिवार्य रूप से रोजा रहे के चाही । रमजान के महिना में रोजा राखल इस्लाम धर्मी लोग के बिच में आपसी सदभाव, भाईचारा, सुख शान्ति, औरी सब्र के एहसास करावेला । इस्लाम धर्म के मुताबिक रमजान के महिना अल्लाह के रहमत के महिना मानल जाला । रमजान के महिना हर इस्लाम धर्मी के ई सिख देवेला की ई संसार में इस्लाम धर्मी के जीवन के उदेश्य का ह ।

रमजान में एक महिना तक राखेवाला रोजा हर इस्लाम धर्मी के जरूरतमंद, भूखा आदमी के तकलीफ के एहसास करावेला । ई रामजान के महिना साल भर के जिनगी जिये के तरीका बहुत बढ़िया से समझा देवेला । साल में रमजान के महिना आवला के मतलब ई रहेला की कोई भी इस्लाम धर्मी आपन राह से गुमराह होखे से पहिले रमजान के महिना उनकरा के उनकर जिनगी के उदेश्य समझावत रहेला ।

रमजान के महिना में रोजा रखला के उदेश्य ई होला की रउवा एगो भूखा औरी गरीब के तकलीफ के समझी औरी अगर रउवा में कौनो बुराई बा त ओकरा के त्याग कर के दोसरा के बढ़िया गुण के आपनाई औरी गरीब चाहे भूखा के तकलीफ के समझ के रौउवो ओकर मददगार बनी । सायद एही से ह रमजान के महिना के १२ गो महिना में सब से सरदार मानल गईल बा । रमजान के महिना जरुरतमंद औरी गरीब के साथ हमदर्दी देखावेवाला महिना भी मानल जाला । इस्लाम धर्म के माने त रमजान के महिना में रोजादार आदमी के इफ्तार करावेवाला के हर गुनाह अल्लाह ताला माफ़ कर देवेलन ।

प्रस्तुत बा रमजान के बारेमे विकिपेडिया से लहल ई सामाग्री हिन्दी मे ।

माहे रमजान को नेकियों का मौसमे बहार कहा गया है। जिस तरह मौसमे बहार में हर तरफ सब्जा ही सब्जा नजर आता है। हर तरफ रंग-बिरंगे फूल नजर आते हैं। इसी तरह रमजान में भी नेकियों पर बहार आई होती है। जो शख्स आम दिनों में इबादतों से दूर होता है, वह भी रमजान में इबादतगुजार बन जाता है। यह सब्र का महीना है और सब्र का बदला जन्नात है।

यह महीना समाज के गरीब और जरूरतमंद बंदों के साथ हमदर्दी का महीना है। इस महीने में रोजादार को इफ्तार कराने वाले के गुनाह माफ हो जाते हैं। पैगम्बर मोहम्मद सल्ल. से आपके किसीसहाबी (साथी) ने पूछा- अगर हममें से किसी के पास इतनी गुंजाइश न हो तो एक खजूर या पानी से ही इफ्तार करा दिया जाए।

यह महीना मुस्तहिक लोगों की मदद करने का महीना है। रमजान के तअल्लुक से हमें बेशुमार हदीसें मिलती हैं और हम पढ़ते और सुनते रहते हैं लेकिन क्या हम इस पर अमल भी करते हैं। ईमानदारी के साथ हम अपना जायजा लें कि क्या वाकई हम लोग मोहताजों और नादार लोगों की वैसी ही मदद करते हैं जैसी करनी चाहिए? सिर्फ सदकए फित्र देकर हम यह समझते हैं कि हमने अपना हक अदा कर दिया है।

जब अल्लाह की राह में देने की बात आती है तो हमारी जेबों से सिर्फ चंद रुपए निकलते हैं, लेकिन जब हम अपनी शॉपिंग के लिए बाजार जाते हैं वहाँ हजारों खर्च कर देते हैं। कोई जरूरतमंद अगर हमारे पास आता है तो उस वक्त हमको अपनी कई जरूरतें याद आ जाती हैं। यह लेना है, वह लेना है, घर में इस चीज की कमी है। बस हमारी ख्वाहिशें खत्म होने का नाम ही नहीं लेती हैं।

खासतौर से हमारी बहनें ईद की शॉपिंग का जायजा लें कि वह अपने लिबास पर कितना कुछ खर्च करती हैं। जरा रुक कर सोचें हममें से कई जरूरतमंद लोग दुनिया में मौजूद हैं जिनके पास तन ढँकने के लिए कपड़ा मौजूद नहीं।

अगर इस महीने में हम अपनी जरूरतों और ख्वाहिशों को कुछ कम कर लें और यही रकम जरूरतमंदों को दें तो यह हमारे लिए बेहत अज्र और सिले का बाइस होगा। क्योंकि इस महीने में की गई एक नेकी का अज्र कई गुना बढ़ाकर अल्लाह की तरफ से अता होता है।

मोहम्मद सल्ल ने फरमाया है जो शख्स नमाज के रोजे ईमान और एहतेसाब (अपने जायजे के साथ) रखे उसके सब पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएँगे। रोजा हमें जब्ते नफ्स (खुद पर काबू रखने) की तरबियत देता है। हममें परहेजगारी पैदा करता है। लेकिन अब जैसे ही माहे रमजान आने वाला होता है, लोगों के जहन में तरह-तरह के चटपटे और मजेदार खाने का तसव्वुर आ जाता है।

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