लइकि कईसे करी पढाई शहर जा के …..

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लइकि कईसे करी पढाई शहर जा के …..

मिथिलेश चौरसिया

र्सा जिल्ला के पोखरिया के रहनियार सोनम यादव (बदलाइल नाम ) कक्षा १२ के पढ़ाई वीरगंज से पूरा कईला के बाद मेडिकल के पढाई करेके चाहत रहली । एकरा खातिर उनका कॉम्पीटिशन के इम्तिहान (entrance exam) देवेके रहे । एकर तैयारी करे खातिर सोनम के कोचिंग करे काठमांडू जा के उहे शहर मे ही कवनो किराया पर रूम ले के रहेके रहे । कोचिंग के फीस के आलावा सोनम के काठमांडू में रहे खाए के खर्च ही ८ से १० हजार रुपैया हर महिना परे ।

सोनम के पिताजी प्राइवेट नौकरी करत रहले । उनका लगे एतना पैसा त ना रहे, बाकीर आपन बेटी के जइसहु पढावे के चाहत रहले । ऊ ई ना चाहत रहले की बेटी भविष्य में ई कहस की उनकरा कवनों मौका ना दिहल गइल । सोनम के पिताजी उनकरा से कहनी ‘बेटी, हम तोहार खर्च कवनो भी हालत में उठावे के तैयार बानी । बस तू मेहनत से पढाई करत रह ।’

सोनम आपन पिताजी के बात के समझली आ पूरा मेहनत से पढाई कईली आ शिक्षा मंत्रालय के इम्तिहान दिहली । सौभाग्य से पहिलके प्रयास में ही उ बीडीएस (दाँत के डॉक्टरी) में उनकरा धरान मेडिकल कलेज में दाखिला मिल गइल उ भी खुला छात्रवृति में ।

काठमांडू में कोचिंग करे बखत सोनम के बहुत तरह के दोस्त मिलल रहे । कुछ पढ़ाई के नाम पर केवल मौजमस्ती करेवाली भी रहली आ कुछ घर के हालत के समझ के पढ़ाई पर ध्यान भी देहत रहली । इम्तिहान के तैयारी के बखत ही सोनम के पता चलल की कुछ लड्कियन के घर वाला त फीस के पैसा देवे खातिर कर्जा तकले लेके काम चलावत बाटे लोग । ई देख के सोनम के आपना पिताजी पर बहुत गर्व भइल । ऊ पूरा मेहनत कईली आ सोचली की आगे के पढ़ाई करे खातिर ऊ बैंक से एजुकेशन लोन ले लिहें । आ आखिरकर उनकर बीड़िस के पढ़ाई खातिर एजुकेशन लोन भी मिल गइल जेसे उन्करा आपन पढाई के खर्च पूरा करे मे बहूत आसानी भइल । ओहीसे ऊ आपना तरफ से पूरा मेहनत साथे आपन पढाई पूरा कईली । आजु उ काठमांडू में ही अच्छा नोकरी करत बाड़ी । आजु सोनाम के परिवार के उनकरा पर गर्व बा ।

बाक़िर हर लइकी सोनम जइसन समझदार ना होली । काठमांडू में ही सोनम के साथे वीरगंज के ही स्वाति श्रेष्ठ (बदलल नाम ) भी पढ़त रहली । ऊ एगो आजाद ख्याल के लइकी रहली आ नयाँ शहर में आजाद पंछी नियन उड़े लगली । ऊ समय पर कोचिंग भी ना जात रहली । ऊ आपन पढ़ाई भी ठीक से ना करत रहली आ शहर में घुमे आ मौजमस्ती मात्र करत रहली । उनकर दोस्त सभन भी ओइसने रहले लोग, दिन भर घूमफिर मौजमस्ती करेवाला । जब पैसा कम पडत रहे त स्वाति कोचिंग के पैसा भी उड़ा देत रहली । ऊ घर से किताब कोपी के नाम पर पैसा लेती अउरी ऐयासी मे खर्च कर देती । स्वाति अब पूरा तरह से बदल गईल रहली । ऊ आपना घर-परिवार से झुठ बोलत रहली । जब इम्तिहान के नतीजा आइल, त उनकर झुठ के पोल खुल गइल । ऊ लगातार हरेक परीक्षा में मेरिट लिस्ट में आवेके के त दूर के बात, पास लिस्ट में भी ना आवत रहली । स्वाति के अब घरे गइल भी मुमकिन ना रह गइल रहे । आखिरकर घर के लोग उनकर पढ़ाई छोड़ा दिहल आ बदनामी से बचे खातिर जलदिहे उनकर वियाह करा दिहल लोग ।

जरुरी बा पढाई …..

आजु के दौर में ज्यादातर माई-बाबू अपना बेटी के पढावे खातिर शहर भेजे के पुरा आ पुख्ता इन्ताजाम करे के चाहत बा लोग । कुछ लइकीयन शहर में पढाई पूरा करके आपन भबिष्य के सपना के पंख लगावे मे सक्षम हो जाली लोग । बाक़िर कुछ लइकी बिगड़ भी जालि । अइसन मे माई-बाबू के ई ना सोचेके चाही की शहर जा के पढाई करेवाली हर लइकी आपन भविष्य सवार ही लीहन । शहर जा के पढाई करेवाली आपन लड़की के सुबिधा सब देला के बाद भी उनकर पढाई पर भी ध्यान देवे के चाही । समय-समय पर लइकी के साथ रहे वाली संघतिया, उनकर शिक्षक से भेट केरे के चाही । बच्चियन के होखेवाला परीक्षा आ ओमे हो रहल प्रगति  के भी निगरानी करत रहेके चाही ।

कोचिंग क्लास में तक़रीबन हर महीना बच्चा लोग के टेस्ट होखेला । एमें उनकर रिजल्ट कइसन बा ई भी देखेके चाहि । कही लइकी झूठ त नैखी बोलत । बच्चा लोग झूठ तबे बोलल शुरु करेला जब ऊ कुछ गलत काम कइल शुरू करेला । शहर में पढाई करेके समय होस्टल भा रिश्तेदार इहा रहे के व्यस्था कइल उचित रहेला । होस्टल में रहे वाली लइकी के समय बेसमय बाहर आइला गइला पर होस्टल चलावेवाला लोग टोका-टाकी करत रहेला । अगर लइकी बाहर कमरा लेके रहत बाड़ी त उनका आवश्यकता से जादा आजादी मिल जाला । केतना बेर उ आपन संघतिया सब से घर वाला से बात कराके उनका के बहकावे के काम करेली । जरुरी बा की समय-समय पर बेटी से मिले लाए सहर जाई ।

बेटी पर राखी भरोसा …

कुछ लइकियन पढ़ाई करे ली सँ त कुछ बिगड़ भी जाली सँ । जरुरी बा की बेटी पर भरोसा राखी । उनका के समझदार बनाई । लइकी के ई समझाई की उ हर बात के सही-सही माता-पिता के बतावस । सही बात कइला से उनकर बात के समझल जा सकत बा ई भरोसा जताई । हर लइकी बिगड़ल ना होखेली, आज के समय में बेटी केहु से कम ना होली । एसे ऊंकरा के पढ़ाई करे लाए शहर जाए के मौका दिही । अइसन नइखे की खालि दोसर शहर जा के ही लइकि बिगड़ जाली, केतना बेर लइकि आपन घर भा आपन गाँव/शहर में रहला के बादों बिगड़ जाली । एसे ई डर मन से निकाल दि की शहर जाके पढ़े वाली लइकी बिगड़ जाली । केतना बेर ई देखल जाला की शहर जाके पढेवाली लइकी दोसर लइकी से जादा आत्मविश्वासी हो जाली । ऊ बाहर के लोग के साथ कइसन बर्ताव कइल जाव ई सब भी सिख लेवेली । आत्मविश्वासी लईकी घरपरिवार खातिर मदतगार साबित होखेली लोग । बेटी पर भरोसा राखके ओकरा के शहर पढ़ाई करे भेजी । बाक़िर उनका पर आवश्यकता अनुसार तनि-मनी ध्यान भी देहत रही । उनकर जरुरत के समझी अउरी उनकरा के समझा के राखल करी जेसे उ गलत काम करे से पहिलही एक बेर जरूर सोचस । केतना बेर त संघतिया के चक्कर में पड़ला के कारण मात्र से ही लइकी बिगड़ जाली ।

बेटी पढ़ावे खातिर जरूरी बात जेपर देवे के चाही ध्यान  …

  • बेटा बेटी में फर्क ना समझी । आज के जमाना मे बेटी, बेटा से कम नइखी ।
  • बेटी के बेहतर भविष्य खातिर बेटी सबके भी भेजी शहर में पढाई करे ।
  • बेटी कहा रहत बाड़ी एकर खुद देखि आ समझी, बेटी के राय के भी दिही अहमियत ।
  • जब बेटी के खर्च बढे लागे त बेटी से पूछताछ करे से झिझकी मत ।
  • समय-समय पर बेटीसे मिले जाई त आपन पत्नी के भी जरुर ले जाई काहेकी माई बेटीके जादा अच्छा से समझ सकत बाड़ी ।
  • बेटी के शिक्षक, होस्टल में रहेवाली रूममेट अउरी होस्टल संचालक से बात करके उनकरा बारे मे जानकारी लेत रही ।
  • बेटी के पढ़ाई मे प्रगति होत बा की ना एकर भी समय-समय पर जाच-बूझ करे से जन हिचकिचाई ।
  • सबसे महत्वपूर्ण बात बा की बेटी के आत्मविश्वास मे कबों कमी ना होखे दि आ उनकर हर परिस्थिति मे गार्जियन के रुपमे उनका पूरा परिवार के साथ बा कहके भरोसा दिलाई ।

 

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