समतामूलक समाज के प्रतिविंब छठ पर्व

गोपाल ठाकुर

खुशी आ गम के एक–दोसरा से साझेदारी कके जीअल मध्यदेशीय संस्कृति ह । मध्यदेश के एगो लमहर हिस्सा भोजपुरी समुदाय ओकर अव्वल दर्जा के उदाहरण बनल बा । उत्सव आ दुःख–पीड़ा के समाज में एक–दोसरा से पैंच–पालट कके मनावे के परंपरा रहल बा । ओहू में छठ त समानता, सामाजिक समन्वय आ अलदबदल प्रणाली से ही शुरू भइल देखल जाला । छठ पर्व के ऋतु, समय, मनावे के तरिका आ ओह में उपयोग होखेवाला सामग्रियन पर विचार कइला पर ई पर्व आदिम काल से ही शुरू भइल अनुमान कइल जा सकेला ।

अध्यात्मवाद अनेक देवी–देवतन के सृजना करत सुविकसित राजशाहियन के सुदृढ करे खातिर बहुदेववाद से एकेश्वरवाद के स्थापना त जरूर कइलख बाँकिर अब तक ना ओकर बनावल कौनो देवी–देवता के भौतिक रूप में देखल गइल बा, ना त एकेश्वरवाद के सर्वशक्तिमान ईश्वर ही आज तक आपन अस्तित्व सिद्ध करे सकल बा । बाकिर भौतिकवाद भी एह भूमण्डल के अस्तित्व सूर्य पर टिकल बात सिद्ध कर चुकल बा । एह अवस्था में विशेष पूजा के रूप में एह पर्व के शुरूवात भइल तत्कालीन समाज के अनभिज्ञता मात्र ही ना कहल जा सकेला । वर्षोवर्ष के अनुभव से ऊर्जा के श्रोत आ तत्कालीन पशुपालन आ कृषि प्रणाली में सूर्य के प्रत्यक्ष प्रभाव पर विचार कके एह पर्व के मनावल शुरू भइल होखेके चाहीं । एकरा अलावा हमनी के वेद सब में सृजना कइल देवी–देवतन के कौनो ना कौनो प्राकृतिक श्रोत के अधिष्ठात्री–अधिष्ठाता के रूप में खड़ा कइल देखल जाला । उदाहरण खातिर जल देवता के वरुण, वायु देवता के पवनदेव, आग के देवता के अग्निदेव, आदि के खुश करे खातिर आराधना करे के परंपरा वैदिक काल से ही शुरू भइल देखल जाला ।

एही क्रम में एह संपूर्ण देवी देवतन का सङही पृथ्वी के ही आदि श्रोत मानल सूर्य के पूजा–आराधना काहे ना कइल जाओ कहके एह पर्व के शुरूवात भइल होखेके चाहीं । उदाहरण खातिर छठीमाई कहके कौनो देवी के जनावल आ शिरशोप्ता कहल कौनो देवता के कल्पना कइल देखला के बावजूद मूल रूप में सूर्य के अर्घ देके ही एह पर्व के आरंभ आ विसर्जन होखेके भइला से एकरा के संस्कृत में सूर्यषष्टी भी कहल गइल बा ।

बाँकिर अब पर्व मनावल जाओ त कौन अवसर पर ? ई प्रश्न महìवपूर्ण बा । निश्चित रूप में आजो खूद आर्थिक रूप से सबल ना भइल अवस्था में शायदे कौनो अनुष्ठान के आयोजना कइल देखल जाला । इहाँ तक कि आपन भखौती अनुसार के बलिपूजा भी आर्थिक विपन्नता से कए–कए महिना आ कए–कए बरीस पछुआइल उदाहरण अपना समाज में पावल जा सकेला । ओहीसुके सूर्य के आराधना भी एगो निश्चित अवधि में कइल उपयुक्त होई कहके समय के खोजी कइला पर तत्कालीन कृषि समाज में जादा से जादा लोग के घर में कातिक में धान आ चइत में रबि बाली घर में आवेके भइला से छठ पर्व भी साल में दू बेर क्रमशः एही दूनू महिना में मनावे के परंपरा शुरू भइल होखेके चाहीं ।

ई. पर्व आदिम काल से शुरू भइल बात भी फिलहाल समाज में जातीय छुआछुत के भेदभाव एह पर्व में लागू ना भइल अवस्था से प्रमाणित होला । हिंदू वर्णव्यवस्था ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र कके चार वर्ण में समाज के विभाजन मात्र ना कके एह चारू वर्ण के का करेके आ का ना करेके विधिविधानो बनइलख । ब्राह्मण के दान लेवे–देवेके, शिक्षा लेवे–देवेके आ यज्ञ करे–करावेके; क्षत्रिय के दान देवेके, शिक्षा लेवेके, यज्ञ करेके आ भूमि के रक्षा करेके; वैश्य के दान देवेके, ज्ञानगुण के बात सुनेके, यज्ञ आ खेती–व्यापार करेके आ शूद्र के एह तीनू वर्ण के सेवा मात्र कके रहेके विधान हिंदू वर्णव्यवस्था स्थापित कइलख । एह तरे बिना कौनो जोखिम उठइले समूचा क्षेत्र के मानसिक शासक के रूप में ब्राह्मण, भौतिक शासक के रूप में क्षत्रिय, एह लोग के जरूरतमंद समूचा धनराशि के श्रोत के रूप में वैश्य आ एह समूचे लोग के दास के रूप में शूद्र के वर्गीकृत कइलख । बाँकिर एह छठ पर्व में पबनी सौंपे के अवस्था के अलावा आउर समय पर ब्राह्मण–पुरोहित के उपस्थिति नइखे । इहो परंपरा बाद में आइल होखेके चाहीं । एही तरे ई पर्व कौनो अमूक जातीय समुदाय के मात्र मनावेके चाहीं कहके सीमित नइखे । एह में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र कके समूचा श्रद्धालु लोग के एके जगे जमा होके मनावल देखल जाला । अतः ई पर्व आदिम काल से ही शुरू भइल ह कहके विश्वस्त होखेके प्रशस्त आधार बा । एह तरे ई पर्व समाना के प्रतीक भी ह ।

एही तरे ई पर्व मनावत बेरा सामाजिक समन्वय के झलक भी मिलेला । एह पर्व में व्रतालु लोग के घर–परिवार के सदस्य लोग त साजसज्जा आ घर से लेके शिरशोप्ताघाट तक के सरसफाई में लगबे करेलन, पूजा सामग्री के जोरचेत कइल कठिन भइल परिवारजन के व्रतालु ना भइल घर–परिवार भी सहयोग करेला । एह अवसर पर आपन खेतबारी में उत्पादित बहुत अइसन पूजा सामग्री निःशुल्क बाँटे के परंपरा भी रहल बा । वर्षा का बेरा बिगड़ल–ढहल रास्ता–पैंड़ा आ खास कके जलाशय के अगलबगल रहल शिरशोप्ताघाट सब के सामाजिक समन्वय के आधार पर ही मरम्मत–संभार कइल जाला ।
एकरा साथे ई पर्व अदलबदल अर्थव्यवस्था के परिचायक भी बा । आपन–आपन खेतबारी में उब्जल सामग्री एह अवसर पर आजो अदलबदल कइल जाला । उदाहरण खातिर साठी धान, आउर कृषि उपज आ ओहू में छठ पर्व खातिर जरूरतमंद आउर कृषि सामग्री से अदलबदल कइल जाला । ओही तरे अपना खेत में फरल तरकारी सब जइसे एह पर्व खातिर उत्तम मानल गइल लौका, कोंहड़ा आदि एक–दोसर के बीच अदलबदल कइल जाला । एही तरे घरेलु प्रविधि से तैयार कइल गइल आउर सामग्री सब भी एह अवसर पर अदलबदल कइल जाला । नीचा के गीत एह बात के पुष्टि करेला ः–

छोटीमोटी डोमिन गे बिटिया तोरा भ’इयाँ लोटे हो केस
दउरा लेले अइहे गे डोमीन अरकवा का हो बेर
स’पली लेले अइहे गे डोमीन अरकवा का हो बेर
छोटीमोटी हलखोरिन गे बिटिया तोरा भ’इयाँ लोटे हो केस
डगड़ा लेले अइहे हलखोरिन अरकवा का हो बेर
छोटीमोटी क’म्हइन गे बिटिया तोरा भ’इयाँ लोटे हो केस
कलसा लेले अइहे गे क’म्हइन अरकवा का हो बेर
चौम’ख लेले अइहे गे क’म्हइन अरकवा का हो बेर
छोटीमोटी कोइरिन गे बिटिया तोरा भ’इयाँ लोटे हो केस
आदि लेले अइहे गे कोइरिन अरकवा का हो बेर
बोड़ी लेले अइहे गे कोइरिन अरकवा का हो बेर
छोटीमोटी तेलिन गे बिटिया तोरा भ’इयाँ लोटे हो केस
तेल लेले अइहे गे तेलिन अरकवा का हो बेर
छोटीमोटी पैसारिन गे बिटिया तोरा भ’इयाँ लोटे हो केस
अरकपात लेले अइहे पैसारिन अरकवा का हो बेर
छोटीमोटी मालिन गे बिटिया तोरा भ’इयाँ लोटे हो केस
प“mल लेले अइहे गे मालिन अरकवा का हो बेर

ऊपर उद्धृत गीत से स्पष्ट होला कि सामंती प्रणाली के तहत बनल हिंदू वर्णव्यवस्था के भी ई पर्व चुनौती देले बा । काहेकि डोम तक के जाति सब के भी एह पर्व में नेवतल जाला आ ओहू लोग के इलिम के एह पर्व में उपयोग होला । सामग्री के उपयोग मात्र ना होके कौनो जाति एह पर्व के कर सकेला । बाँकिर अब ई पर्व हिंदू वर्णव्यवस्था के जाति लोग में मात्र सीमित ना होके गैर–हिंदू लोग के बीच भी लोकप्रिय हो रहल बा । उदाहरण खातिर मुस्लिम लोग में भी ई व्रत करेके परंपरा बा । बल्कि अर्घ देवे खातिर केहू हिंदू परिवार के व्रतालु के ऊ लोग अनुरोध करेलन । बाँकिर आज के अवस्था में अन्य धर्मावलंबी लोग भी समान रूप में एह पर्व के हर अवसर पर शामिल करावल उपयुक्त होई । एही परिप्रेक्ष्य में नेपाल में ई पर्व कुछ बरीस पहिले तक मधेशी समुदाय में मात्र लोकप्रिय रहे बाँकिर अभीन गैर मधेशी यानी पाहाड़ी समुदाय भी अब एह पर्व के मना रहल बा । अतः ई सांप्रदायिक समन्वय के एगो निमन नमूना के रूप में उभर रहल बा ।

एकरा बादो सामान के आधुनिकीकरण आ पारंपरिक निरंतरता के नाम पर कुछ विकृति सब भी एह में जरूरे पइसल बा । षष्टी के दिन सूर्यास्त के बाद व्रतालु लोग घरे लौटके अपने–अपने घर में भखौती अनुसार के कोसिया–कुँड़वार भरत रहे, जवन अब शिरशोप्ता घाट पर ही रहे के प्रबंध कके ओतहें कोसिया–कुँड़वार भरल जा रहल बा । एकरा के सकारात्मक रूप में लेहल जा सकेला बाँकिर एक–दोसर व्रतालु समूह के बीच में भड़कीला सजावट के प्रतिस्पर्धा से अब ई पर्व बहुत खर्चिला हो रहल बा । ओही तरे एह अवसर पर प्रयोग होखेवाला मनोरंजन के साधन सब भी सांस्कृतिक अपचलन शुरू कइले बा । पारंपरिक निरंतरता के नाम पर जलाशय में ही जाके ई पर्व मनावे के क्रम में खास कके शहरी क्षेत्र में प्रदूषित नदी–तालाव के किनार पर जाके ई पर्व मनावे के बाध्यता के भी समय–सापेक्ष हिसाब से परिमार्जन कइल जरूरी हो गइल बा । काहेकि पवित्रता ही एह पर्व के मूल उद्देश्य रहला से प्रदूषित जगह पर ई पर्व मनावल केतना उपयुक्त होई, सोचनीय बा ।

लेखक के ठेगाना – वाणस्थली, चंद्रागिरी–१०, काठमाड़ो ।

advertisement

राउर टिप्पणी

राउर टिप्पणी लिखी
Please enter your name here