सरस्वती पूजा के उदेश्य : अज्ञानता दुर करत सतज्ञान

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लेखक – बलदेव उपाध्याय “निर्मल”
लेखक – बलदेव उपाध्याय “निर्मल” – मुर्ली बगैचा–१२, वीरगंज

विद्या के मतलब सतज्ञान ह । अर्थात जीवन के सार्थक बनावेवाला ज्ञान । ओहिसे जिनगी के हर क्षेत्र में सफलता पावे आ जीवन के उदेश्य पूर्ण बनावे खातिर सतज्ञान के जरुरत होला ।

खाली पढलिख के शिक्षित भईल मात्र आ डिग्री प्राप्त करत विद्धान बनत बडका–बडका पद में आसिन होत धन सम्पत्ति आर्जन खातिर पढाई कइल बात मात्र विद्या के उदेश्य ना ह ।

एकर खास उदेश्य आ महत्व पढलिख के रोजी रोटी खातिर सांसारिक ज्ञान सहित “सर्वे भवन्तु सुखिनः” मुताविक के सिद्धान्त अनुरुप आत्मज्ञान जागृत करावत नैतिक आ आत्मज्ञान द्वारा साथे साथ चलत सतकार्ज में जुटत लागल रहेके ह । जउना विद्या से मानव मुल्य के बोध करे करावे में सहजोगी होखी ।

विद्या के महत्व एवं महिमा के बारे में अनेकन ग्रन्थसब में वर्णन रहल मिलेला । जेमें रहल वर्णन से भी विद्या के महत्व उजागर होला । ई कहनाम श्लोक वर्णन “विद्या धन सर्व धन प्रधानम” (प्रदानम्) आ “विद्या ददाती विनयम्” । उपरोक्त श्लोक भाव से भी ज्ञात होला की सतज्ञान (विद्या) सम्पूर्ण धन में सब से प्रमुख धन हउवे । अर्थात जे सम्पूर्ण धन प्रदान करेला । “विद्या” विनयशिल, विचारवान बनावेला । विनम्रशिल ज्ञानी व्यक्ति के सम्पूर्ण विश्व में आदर सम्मान होला ।

ईहवाँ बुझेवाला बात ई रहल बा की धन प्राप्ती के मतलब सांसारिक वैभव ऐश्वर्य मात्र धन ना ह । भौतिक सम्पत्ति के साथे आत्मज्ञान द्धारा प्राप्त होखेवाला विनम्रता, दया, करुणा, क्षमा, सहनशिलता, अनुशासन, सत्य, सदभाव जइसन अनेकन धनरुपी महत्वपूर्ण तत्वज्ञान प्राप्त करे आ होखेमें आवेके हउवे । अतः हरेक कर्मशिल हमनी आदमी से आपन आपन कर्म क्षेत्र में आपन काम कर्तव्य सफलता साथ पूर्ण करे खातिर उपरोक्त मुताविक चलला पर ही सफलता मिलेके भइला से उ मुताविक चलल जरुरी बा । जउना ज्ञान, ज्ञानदायिनी, बुद्धि प्रदायिनि विद्या आ ज्ञान के श्रोत देवी सरस्वती के शुद्ध भाव से अर्चना उपाशना कइला पर प्राप्ति होला ।

ईहे उदेश्य प्राप्ति खातिर माघ शुक्ल पंचमी के दिन सरस्वती जयन्ति के रुपमें विशेष किसिम से हर्षोलास के साथ देवी सरस्वती के पूजा वंदना उपाशना करत सरस्वती पूजा महोत्सव के रुपमें मनावल जाला । संसार में अज्ञानी आ शिक्षित ना भइल आदमी अनपढ भा मुर्ख कहाला । ओइसन आदमी के कतहुँ भी कदर ना होला । ओहिसे सब कुछ जाने खातिर भी शिक्षित भा विद्या प्राप्त कइल जरुरी होला । जउना सम्पूर्ण ज्ञान विद्याके श्रोत देवी सरस्वती हि बानी ।

ज्ञान, विणा, कला, संगीत, साहित्य, न्याय–कानून, दण्ड–पुरस्कार, प्रशासन, निर्माण, प्रविधि, उद्योग –व्यपार, वाणी बोली उच्चारण अर्थात वाकशक्ति, बुद्धि विवेक ईत्यादी संसार के हर क्षेत्र में उनकर बाहुल्यता रहेके साथे विश्व प्रशासिका के रुपमें रहत सम्पूर्ण विश्व के संचालन देवी सरस्वती द्धारा होखेला । उनकर कृपा बिना वाकशब्द (बोली) आवाज प्रस्फूरण एवं उच्चारण होखे ना सकि । सरस्वती के कृपा भइला पर ही बोली के उच्चारण हो सकेके साथे साथ ज्ञान आ बुद्धिविवेक प्राप्ती होखेके कारण हर क्षेत्र में सफलता खातिर उनकर कृपा जरुरी होखेला ।

माघ शुक्ल पंचमी तिथि देवी सरस्वती के प्रादुभाव (उदय) भईल दिन के रुपमें रहल मानल जाए के भइला से एह दिन के सरस्वती जयन्ति के रुपमें श्रद्धा भक्ति से मनावे के धार्मिक परम्परा रहते आईल बा । ओहिसे एहदिन के “सरस्वती जयन्ति”, “सरस्वती पूजा”, “श्रीपंचमी” आ “वसन्त पंचमी” नाम से भी सम्बोधन कइल जाला । एहदिन सरस्वती के विशेष पूजा आराधना करेके भइला से एहदिन के “सरस्वती पूजा” कहाला । साथे इहे दिन से प्रकृति में वसन्त के आगमन के आभाष होखेके साथे धार्मिक विधि मुताविक सरकारी स्तर से भी वसन्त पूजा महोत्सव सहित बसन्त राग बजावत सुनावे के कारण भी “वसन्त पंचमी” कहल बात बुझल जा सकता । साथे दोसर ओरी सत्ज्ञान आ विद्या बुद्धि विवेक द्धारा सतकर्म करत धन सम्पति ऐश्वर्य प्राप्ती कर सकल जाला । धन, श्री सम्पति भा ऐश्वर्य लक्ष्मी समान मानल जाले । ओहिसे लक्ष्मी जी के “श्री” शब्द नाम से भी पुकारे के भइला से जउना विद्या ज्ञान द्धारा ऐश्वर्य प्राप्ती में सहजोग होखेके कारण से भी ई पर्व उत्सव के “श्री पंचमी” भी कहल जाला ।

देवी सरस्वती के अनेक नाम रहल बा । जउनः सरस्वती, शारदा, हंस वाहिनी, भारती, ईला, वाग्देवी, ज्ञान दायिनि ईत्यादी । जाडा के शरदऋतु में उनकर उदय होखेके कारण उनका “शारदा” नाम से पुकारल जाला त हाँस के वाहन रहला से “हंस वाहिनी” कहल जाला । ज्ञान विवेक प्रदान करत सतमार्ग में चले खातिर हमनी के प्रेरित करेवाली भइला से उनका “ज्ञान” भा “विद्या” दायिनी नाम से भी सम्बोधन कइल जाला । देवी सरस्वती नदी के रुपमें भी रहल भइला से उनका वागदेवी भी कहल जाला । जे नदी के रुपमें रहके बहत पृथ्वीवासी हमनी मानव जन के देह के मईल जल के माध्यमद्धारा धो के हटावत देह शुद्ध आ चुस्त स्फूर्त निरोग बनावे में सहजोग करिने । साथे पृथ्वी में जलद्धारा सिंचित करत प्राणी मात्र के जीवन रक्षा में भी सहजोगी भुमिका प्रदान करिने । दोसर ओरी ज्ञान प्रदान करत हमनी के मन के भितर रहेवाला मईल रुपी कुबिचार खराब भावना के ज्ञान के माध्यम द्धारा प्रकाश रुपी सुभावना जागृह करा के हटावत विवेकशिल बने बनावे में भी प्रेरणा प्रदान करिनें ।

एहतरे “जल” आउरी “ज्ञान” के माध्यमद्धारा बाहिरी एवं भितरी अन्तर मन के दुनु तरफ के मईल खँगार के हमनी के शुद्ध बनाईने । साथे देवी सरस्वती द्धारा धारण कइल गईल उजर सफेद वस्त्र, उजर माला, विणा वाद्य यन्त्र आ किताब, हाँस के वाहन जइसन वस्तु के प्रयोग के भी आपन भिरती अर्थ भाव महत्व रहल बा । सफेद शुद्धता के प्रतिक ह त किताब ज्ञान के प्रतिक ह । ओहितरे विणा एगो सुमधुर वाद्य यन्त्र हउवे । दोसर ओरी हाँस में सहित गलत अर्थात दुध के दुध पानी के पानी छुटयावत अलग कर सकेके क्षमता रहेला । जे सबके समग्रभाव अर्थ ई ह की हमनी मानवजन द्धारा भी सदा शुद्ध सोंच भावना बिचार रखत, सदा सत्य आ मधुर बोली वचन द्धारा सबके मन जितत, सहि गलत बात छुटयावत नम्र आ सभ्य बन के सही बुद्धि विवेक के खातिर सदज्ञान जागृत आ प्राप्ती सहित सतकर्म करत जिनगी के सहिमार्ग में चलावत सफल जिनगी खातिर सबदिन प्रयत्नरत रहेके चाहिं कहेवाला बात के बोध करावेला ।

एहतरे समग्र में देखल जाँव त “सरस्वती जयन्ति” भा “सरस्वती पूजा” पर्व मनावे के मुख्य उदेश्य अज्ञाता मिटावत सतज्ञान जागृत करावे के भा प्राप्त करेके बात मुख्य रहल बा । जेसे जिनगी के सबदिन सुख शान्ति आउरी सफलता प्राप्ती हो सके । अतः सरस्वती पूजा के इहे उपरोक्त शन्देश रहल मिलेला । देवी सरस्वती सबजन के विद्या बुद्धि प्रदान करस । इहे देवी सरस्वती से कामना बा । सरस्वती जयन्ति के पावन अवसर में सबजन में हार्दिक शुभकामना ।

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