नितिन नीरा चन्द्रा

एह सवाल के पुछे से पहिले इ पुछे के चाही कि का कहानी, लिखल, सुनावल जरूरी बा ?बा त केकरा खातिर ? लिखेवाला खातिर के पढे भ सुनेवाला खातिर ? हजारन साल पहिले राम, सीता, रावण आ लछमन के कहानी बतावल गईल । का जरूरी रहे बतावल ? अर्जुन, कृष्ण के का कहलन कुरुछेत्र मे ? काहे जरूरी रहे बतावल गीता के रुपमे ? ईसा मसीह के होली ग्रेल के घटना का रहे ? बुद्ध कवन उ आठ बात कहले रहलन बेहतर जीवन खाती ? भिखारी ठाकुर काहे नाटक करत रहलन जेकरा मे पुरुष देस के कहानी आईल आ दोसरा ओरि भोजपुरिया छेत्र के गावन के ओह समय का हालत रहे, इहो पता चलल । कई बार इतिहास किवदंती के रूप ले लेवेला । आ किवदंती इसिहास हो जाले । ई बहस पुरान बा कि रामायण कहानी बा कि सांचो उ कुल भईल रहे । लेकिन हमार सवाल ई बा कि रामायण लिखे के का जरुरि रहे ?

अब आ जाईं सिनेमा के बात पर । देखल जाव कि हमनी के देस के पहिला फिलिम भी साहित्य पर आधारित बा । राजा हररिंद्र – 1911 मे बनल । रामायण भी 1987 मे टी वी खातिर बनल । महाभारत भी टी वी पर आ गईल । हमार एक ठो जान पहचान के लईका बा पटना के । एक दिन कहता कि बी० आर० चोपड़ा नु लिखें थे महाभारत  ? त हम कहनी कि फिर त रामायण रामानंद सागर लिखे होंगे । त कहता, हाँ । बाप रे हँसत – हँसत पेट बथा गईल रहे ओ दिनवा । अब दोसर सवाल बा कि  जब पन्ना पर लिखाईल रहे त टी वी सीरियल आ सिनेमा बनावे के का जरुरि बा ? इयाद होखी कि दीपिका आ अरुण गोविल के लोग पूजा करत रहे । ई ह ऑडीओ – विज़ुअल (audio – visual) के असर ।

हॉलीवुड मे पिछला कुछ साल मे एडाप्टेशन, मने किताब से फिल्म बानवे के चलन बढ़ल बा । पहिले त होत रहे कि किताब छपला के कई महिना दिन साल बाद फिलिम बनत रहे । अब त अइसन हो गइल बा कि किताब छापे से पहिले वोकर सिनेमा बानवेके अधिकार बिक जाला । देखी हैरी  पॉटर आ हंगर गेम्स दुन्नु सीरीज के इहे भईल । अईसन बहुत बाड़ी सन । अभी “अमेरिकन स्नाइपर” आईल रहे हमार पसंदीदा निर्देशक क्लिंट ईस्टवूड के । पिछला साल उपन्यास लिखाईल रहे, लेकिन एह साल वोपर फिल्म बन गईल । रउवा लोग सुनले होखब कि चेतन भगत के किताब “हाफ गर्लफ्रेंड” के फिल्म बनावे के राइट किताब आवे के पहिले एकता कपूर खरीद लेले रहली । तनि सोची कि अगर हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री बंद हो जाए त हिन्दी भाषा पर का असर पड़ी ? आज अगर लोग, आ खासकर सहरुवा लोग हिन्दी से जुडल बा त ओकरा पीछे सिनेमा के छोड़ीके कवनो दोसर अतना मजबूत माध्यम नईखे । आ धीरे धीरे छोट शहर जैसे पटना, इलाहाबाद, बोकारो, रांची मे भी ई चीज़ धीरे -धीरे ढुक गइल बा ।

हम  एक कोरोलरी भा थेओरी देबे के चाहब । हम चाहब कि केहू एकरा के गलत सिद्ध करे ताकि  हमनी  इ फेनोमेना के अवरी समझीं । “भाषा के भविष्य, सिनेमा  के हाथ मे सुरक्षित बा । भाषा उहे बाची जेकर सिनेमा होखी  आ जेकर साहित्य बररयार रही । सिनेमा ओकर बढ़िया होखी जवन समाज  आपन भाषा से दूर नइखे गईल । नया युग के साहित्य सिनेमा हटे  ।”

अब इ थियरी भोजपुरी सिनेमा पर लगाईं । साहित्य बा लेकिन समाज भाषा बोलत नईखे । त सिनेमा उजड़ गईल । Mass Communication के पढ़ाई मे एक चीज़ कहल जाला । “Media shapes society and society shapes Media”. मने ई कहल जा सकेला कि “सिनेमा समाज के आकार दिही आ समाज सिनेमा के” । सिनेमा एहीसे जरुरी बा  कि जवन जुग मे हमनी के बानी जा, इहां से उ जुग के सुरुआत भईल बा; जहां लोग “गांधी” आ “हिटलर” के ना पढ़ी ना देखी । जहां लोग भिखारी ठाकुर के जीवन पर लिखल “सूत्रधार” ना पढ़ी ना ओकरा ऊपर बनल सिनेमा देखी । छपरा के बहुत युवा के मालूम  भी नईखे कि भिखारी ठाकुर के रहलन, , लेकिन  एगो फिल्म छपरा के पंकज सिनेमा मे लग जाए त सब लोग जान जाई । पढ़े वाला लोग के संख्या दिन पर दिन घट रहल बा । साहित्य से सिनेमा आ सिनेमा से साहित्य निकलता लेकिन अब ई बात मान लिहीं कि नया साहित्य “सिनेमा” ह । रउवा ध्यान से देखीं, जवन लोग के साहित्य मजबूत रहे, उ लोग के सिनेमा भि मजबूत बा । मजबूत सिनेमा वाला सब राज्य कवनो ना कवनो तरीका से बिकसित बा । खासतौर पर जहां पर शुरु से भाषा आ साहित्य रहे । लेकिन उ राज्य जहां साहित्य रहे आ सिनेमा कमजोर पड़ गईल, उ राज्य आ समाज के विकास ना भईल । सीधा  बात बा कि  हम  बात  भोजपुरी के कर रहल बानी । भोजपुरी मे जईसन सिनेमा बनी ओकर पहचान वइसने होखी । बतावे के जरुरि नईखे कि का हालत बा । एक साल पहिले तक हम इहे सोचत रहनी कि युवा के भोजपुरी मे बात करे के चाहीं । माँ पिता के भोजपुरी मे बात करे के चाहीं । लेकिन काहे ? हमनी किहाँ सबसे पहिला सवाल इहे पुछल जाला कि बड़ होके का बनबs ? आ साँच बात बा कि  हमनी के कुछुओ बनी जा, चाहे हमनी के बच्चा बनिहन सन, ओकरा मे भोजपुरी के लेके कुछो बने के उमेद नईखे । त जनरल माता पिता इहे सोचेला कि बच्चा के भविस का होई । इहे हाल हम मैथली के देख के आ रहल बानी । लेकिन देस के कई राज्यन के सरकार ई बात समझ गईल बिया कि सिनेमा खाली कला आ मनोरंजन के साधने नईखे बल्कि बिजनेस के साथे संस्कृति आ राज्य के पहचान के माध्यम  भी बा ।

अगर बिहार सरकार के बात कईल जाव त उ लोग के तैयारी सुन्ना बटा सन्नाटा जोड़ कटहर बा । हम कई हाली बिहार सरकार के लोग से मिलल बानी 2011 से लेके आज तक । कई मंत्री अइलन गइलन लो, बाकिर सिनेमा ओहिजा के ओहिजे बा । हम बिहार सरकार के नीति देखनी हs । “बिहार राज्य फिल्म  प्रोत्साहन” नीति । लेकिन सच पूछीं त प्रोत्साहन नीति नईखे ई हतोत्साहन नीति बा । एकरा मे अभी भी ई लोग फिल्म नेगेटिव के बात करता | ई लोग के पता होखे के चाहीं कि देश के सब लैब अब बंद हो चुकल बा । बस एक ठो खुलल बा । नेगेटिव सप्लाई खासिर फुजी आ कोडेक आपन ऑफिस बंद क देले बिया । लेकिन अभी उ लोग एकरे पर चलता । सबसे बड़ बात कि ई लोग फ़िल्मकार के 10-12 प्रतिशत ब्याज पर पैसा दिही । उहो कुछो बनकी रख के । जेकर माथा खराब होखी उहे नु बिहार सरकार के गाईडलाईन मे फिल्म बनाई । उहो पइसा ब्याज पर लेके । माछियो के मुड़ी जतना अकिल रहित त कम से कम दोसरा राज्यन के नीति देख लेबे के चाहत रहे ई लोग के । उत्तर प्रदेश सीधा सीधा कहता कि हम 2 करोड़ देब 90 प्रसिशि शूटिंग होखी त । भोजपुरी बुंदेली अवधि के अतना देब आ बाकी लोग के वोतना । महाराष्ट्र सरकार मे मराठी बनावे वाला के 50 लाख रुपिया देबे के प्राबधान बा । कनााटक मे भी । हर राज्य मे सरकार स्थानीय सिनेमा खातिर बहुत कुछ करतिया , लेकिन हमनी किहा नेता सब के मालुमे नईखे कि करे के का बा ?

अगर 2025 के आगे भाषा के ले जाए के बा त इ काम खाली सिनेमा कर सकेला, काहे कि इहे नवका जुग के साहित्य बा । उपन्यास आ दोसर साहित्य पढ़े के ना त रूचि बाँचल बा ना समय । आ ई मय भाषा मे भईल बा । भोजपुरी के तनी मामीला इहो गड़बड़ बा कि लोग बोलबो कम करेला । एहिसे अवरी बरबादी भईल बा । आज हमनी के कतनो भोजपुरी के कागज़ पर लिखीं लेकिन उ सेलुलॉइड पर ना गईल त इ खाली कुछ लोग के शौक़ आ प्रेम बनके रह जाई । भोजपुरी के 100 साल दबावल गईल, तेपर भी हमनी के किताबी साहित्यसे शुरुवात नईखीं कर सकत । रोड पर बैलगाड़ी ना मोटर कार चाहीं । बढिया सिनेमा आई त भाषा के भी बल मिली ।

त आखीर मे  हम  इहे कहब कि  भोजपुरी से प्रेम करेवाला लोग के अच्छा सिनेमा खातिर सामने आवही के पड़ी । काहेकि दोसर कवनो रास्ता नईखे । चाहे कतनो उपन्यास लिखाए, सिनेमा ना होखी त चीज़ ना बदली । सिनेमा ना होखी त भाषा खत्म हो जाई । एकरा से बड़ अकाज का हो सकेला  ?

“We will have to repent in this generation not merely for the vitriolic words and actions of the bad people, but for the appalling silence of the good people. ” – MARTIN LUTHER KING.

डुिमरांव , बिहार के रहे वाला युवा निर्देशक, भोजपुरी सिनेमा में सकारात्मक चर्चा के सुरुवात करे वाला देसवा फिल्म के निर्देशक नितिन चन्द्र जी, भोजपुरी भाषा आ साहित्य खाती कलम से ही ना कैमरा से भी आपन शत प्रतिशत दे रहल बानी । एह घरी ईहा के मुंबई में बानी ।

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