होली/ होरी/ फगुवा परिचय औरी शुभकामना

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होली

होली/होरी/फगुवा

अशोक कुशवाहा

होली या होरी चाहे ठेठ भोजपुरी में बोली त फगुवा हमनी भोजपुरियन लोग के बहुते चाहिता औरी मजकुवा परब मानल जाला जवन परब बसन्त ऋतु में मनावल जाए वाला एगो महत्वपूर्ण परब ह । फगुवा परब हिन्दू पञ्चांग के हिसाब से फागुन मास के पूर्णिमा के दिन मनावल जाला । रंग औरी अबीर के परब के रूप में मानावल जाए वाला फगुवा परब पारम्परिक रूप से दू दिन मनावल जाला । पहिलका दिन होलिका जरावल जला जेकरा के होलिका दहन चाहे समध जरावल भी कहल जाला । दोसारका दिन धुरड्डी, धुरखेल चाहे धुरा उडावे के दिन भी कहल जाला । जवन दिन नीमन चिकन पकवान बनावल जाला ओकरा बाद खा पि के लोग एक दोसरा के ऊपर रंग, अबीर लगा के होली खेलेला लोग ।

इतिहास

होली परब अत्यंत प्राचीन एवम पुरान परब ह जवन होली, होरी, फगुवा, होलिका या होलाका नाम से मनावल जाला। वसंत  ऋतु में रंग अबीर के साथ बड़ी धूमधाम के साथ मनावला के कारण यी परब के वसंतोत्सव चाहे काम-महोत्सव भी कहल गईल बा। इतिहासकार लोग  के हिसाब से आर्यों काल में भी यी परब के प्रचलन रहे बाकिर अधिकतर यी परब पूर्वी भारत में ही मनावल जात रहे । फगुवा परब के वर्णन अनेकन पुरातन धार्मिक किताब में भी मिलेला । उदहारणरत  जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र औरी कथा गार्ह्य-सूत्र। नारद पुराण औरी भविष्य पुराण जइसन पुराण के प्राचीन हस्तलिपि औरी ग्रंथों में भी एह परब के उल्लेख कईल गईल बा । विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से ३०० वर्ष पुरान एक अभिलेख में भी फगुवा के वर्णन कईल गईल बा।

नेपाली सामाज संस्कृति औरी फगुवा

नेपाली  संस्कृति में परब त्यौहार के आदि काल से ही बहुत महत्व रहल बा । हमानी के संस्कृति के सबसे बडका विशेषता यी ह की ईहा मनावल जाए वाला हर परब त्यौहार समाज में मानवीय गुणों के स्थापित करके लोग में प्रेम, एकता एवं  सद्भावना के बढावा देवेला । नेपाल  में परब त्यौहार के  सम्बन्ध कौनो जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से ना होंके सद्भाव से होखेला । यिहा मनावल जाएवाला हर परब त्यौहार के उद्देश्य मानवीय गरिमा के समृद्धि प्रदान करके होखेला । एही कारण से देश में मनावेजाए वाला हर परब एवम त्यौहार सभी धर्म के लोग आदर के साथ मिलजुल के मनावेला लोग। होली नेपाली भोजपुरिया  समाज के एगो प्रमुख परब ह जवना परब में लोग एक दोसरा के रंग औरी अबीर लागा के औरी गले मिल के सत्रुता के भूला के मित्रता के साथ मनावेला लोग । यी एगो अईसन परब ह जेकरा के लोग बड़ी उत्सुकता के साथ हर बरिस प्रतीक्षा करेला लोग ।

होलिका दहन

फगुवा परब नेपाली भोजपुरिया  संस्कृति में बहुते पुराना परब में से एगो ह । हमनी के संस्कृति में होली के एतना महत्वपूर्ण स्थान के प्रमुख कारण  असत्य पर सत्य के बिजय  औरी दुराचार पर सदाचार के जित के उत्सव के रूपमें मनावल जाएवाला परब के नाम ही होली ह । एही से फगुवा मुख्यत : हंसी ख़ुशी एवम भाई चारा के परब मानल जाला । यी एगो लोक परब होखे के साथ साथ अच्छाई के बुराई ऊपर भईल जित, सदाचार के दुराचार पर जित एवम समाज में पसरल समस्त बुराई के अंत के प्रतिक भी मानल गईल बा । एही से फगुवा के दिने लोग आपन पुरान दुश्मनी  के भूल के एक दोसरा के गले मिलके दोस्त बन के मनावे लोग ।  

प्रभु भक्ति

फगुवा के एगो दोसर महत्व यी बा की प्राचीन समय में हिरण्यकश्यप नाम के एगो बहुते बलशाली एवम घमण्डी राक्षस अपने आप के भागवान मानत रहे । हिरण्यकश्यप आपन राज्य में भागवान के नाम लेला पर भी पाबन्दी लगा देहले रहले । हिरण्यकश्यप के आपन पुत्र ही भगवान के परम भक्त रहले जेकर नाम प्रहलाद रहे । हिरण्यकश्यप आपना पुत्र प्रहलाद के इश्वर भक्ति से रुष्ट होंके उनका के बहुते कठोर से कठोर सजा देहले रहले पर प्रहलाद आपन इश्वर भक्ति से पिच्छे ना हटले । हिरण्यकश्यप के बहिन होलिका के बरदान प्राप्त रहे की आग उनका के भष्म ना करे सकी । हिरण्यकश्यप के आदेश पर होलिका आपन भतीजा प्रहलाद के मारे के उदेश्य से आपना गोद में लेके आग्नि में बईठ गईली । आग्नि होलिका के भष्म कर देहली पर इश्वर भक्त प्रहलाद ना भष्म भईले । होली परब होलिका के बिनाश औरी प्रहलाद के अटूट प्रभु भक्ति एवम ईश्वरीय निष्ठां के प्रतिक भी मानल जाला ।

हर धरम के लोग फगुवा मनावेला लोग

 

 

सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी जी आपन एतिहासिक यात्रा के स्मरण में हिलिकोत्सव के बर्णन कईले बारन । भारत के आनेक मुस्लिम कबी लोग भी आपन अनेक रचना में फगुवा के उल्लेख कैईले बा लोग । होली परब केवल हिन्दू ही ना बल्कि मुसलमान लोग भी बहुते उत्सुकता के साथ माने ला लोग । सबसे प्रमाणिक इतिहास के तस्बीर औरी मुग़ल काल के किस्सा जाहा अकबर जोधाबाई के साथ औरी जहागीर  आपन नुरजाहा के साथ होली खेले के बरण कईल मिले ला । अलवर संग्रहालय के एगो तस्बीर  में जहागीर के होली खेलत देखावल गईल बा । शाहजहा के समय तक होली खेके मुगलिया अंदाज ही बदल गईल रहे  इतिहास में बर्णन  बा की शाहजहा  के जामाना में होली के ईद-ए-गुलबिया अब-ए-पाशी ( रंग के बरखा ) कहल जात रहे ।

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